महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1240, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशोभने! राज्य-विध्वंसका निवारण करने, दुर्भिक्षके समय काम आने, बड़े-बड़े रोगोंसे छुटकारा पाने, बुढ़ापेमें जीवन-निर्वाह करने, साहस और अमर्षपूर्वक शत्रुओंसे बदला लेने, विदेश-यात्रा करने तथा सब प्रकारकी आपत्तियोंसे छुटकारा पाने आदिके उद्देश्यसे अपने धनको अपने निकट बचाये रखना चाहिये ।। सुखमर्थवतां लोके कृच्छ्राणां विप्रमोक्षणम् । धन संकटोंसे छुड़ानेवाला है, इसलिये इस जगत्में धनवानोंको सुख होता है ।। धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं च परमं यशः । त्रिवर्गो हि वशे युक्तः सर्वेषां शं विधीयते ।। तथा संवर्तमानास्तु लोकयोर्हितमाप्नुयुः ।। वह धन यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। इतना ही नहीं, वह परम यशस्वरूप है। धर्म, अर्थ और काम यह त्रिवर्ग कहलाता है। वह जिनके वशमें होता है, उन सबके लिये कल्याणकारी होता है। ऐसा बर्ताव करनेवाले लोग उभय लोकमें अपना हित साधन करते हैं ।। काल्योत्थानं च शौचं च देवब्राह्मणभक्तितः । गुरूणामेव शुश्रूषा ब्राह्मणेष्वाभिवादनम् ।। प्रत्युत्थानं च वृद्धानां देवस्थानप्रणामनम् । आभिमुख्यं पुरस्कृत्य अतिथीनां च पूजनम् ।। वृद्धोपदेशकरणं श्रवणं हितपथ्ययोः । पोषणं भृत्यवर्गस्य सान्त्वदानपरिग्रहैः ।। न्यायतः कर्मकरणमन्यायाहितवर्जितम् । सम्यग्वृत्तं स्वदारेषु दोषाणां प्रतिषेधनम् ।। पुत्राणां विनयं कुर्यात् तत्तत्कार्यनियोजनम् । वर्जनं चाशुभार्थानां शुभानां जोषणं तथा ।। कुलोचितानां धर्माणां यथावत् परिपालनम् । कुलसंधारणं चैव पौरुषेणैव सर्वशः । एवमादि शुभं सर्वं तस्य वृत्तमिति स्थितम् ।। प्रातःकाल उठना, शौच-स्नान करके शुद्ध होना, देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखते हुए गुरुजनोंकी सेवा तथा ब्राह्मण-वर्गको प्रणाम करना, बड़े-बूढ़ोंके आनेपर उठकर उनका स्वागत करना, देवस्थानमें मस्तक झुकाना, अतिथियोंके सम्मुख होकर उनका उचित आदर-सत्कार करना, बड़े-बूढ़ोंके उपदेशको मानना और आचरणमें लाना, उनके हितकर और लाभदायक वचनोंको सुनना, भृत्यवर्गको सान्त्वना और अभीष्ट वस्तुका दान देकर अपनाते हुए उसका पालन-पोषण करना, न्याययुक्त कर्म करना, अन्याय और अहितकर कार्यको त्याग देना, अपनी स्त्रीके साथ अच्छा बर्ताव करना, दोषोंका निवारण करना,