भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1241, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1241

पुत्रोंको विनय सिखाना, उन्हें भिन्न-भिन्न आवश्यक कार्योंमें लगाना, अशुभ पदार्थोंको त्याग देना, शुभ पदार्थोंका सेवन करना, कुलोचित धर्मोंका यथावत् रूपसे पालन करना और अपने ही पुरुषार्थसे सर्वथा अपने कुलकी रक्षा करना इत्यादि सारे शुभ व्यवहार वृत्त कहे गये हैं ।।

वृद्धसेवी भवेन्नित्यं हितार्थं ज्ञानकाङ्क्षया ।
परार्थं नाहरेद् द्रव्यमनामन्त्र्य तु सर्वदा ॥
प्रतिदिन अपने हितके लिये और ज्ञान-प्राप्तिकी इच्छासे वृद्ध पुरुषोंका सेवन करे। दूसरेके द्रव्यको उससे पूछे बिना कदापि न ले ।।

न याचेत परान् धीरः स्वबाहुबलमाश्रयेत् ।।
स्वशरीरं सदा रक्षेदाहाराचारयोरपि ।
हितं पथ्यं सदाहारं जीर्णं भुञ्जीत मात्रया ॥
धीर पुरुष दूसरेसे याचना न करे। अपने बाहुबलका भरोसा रखे। आहार और आचार-व्यवहारमें भी सदा अपने शरीरकी रक्षा करे। जो भोजन हितकर एवं लाभदायक हो तथा अच्छी तरह पक गया हो, उसीको नियत मात्रामें ग्रहण करे ।।

देवतातिथिसत्कारं कृत्वा सर्वं यथाविधि ।
शेषं भुञ्जेच्छुचिर्भूत्वा न च भाषेत विप्रियम् ।।
देवताओं और अतिथियोंको पूर्णरूपसे विधिपूर्वक सत्कार करके शेष अन्नका पवित्र होकर भोजन करे और कभी किसीसे अप्रिय वचन न बोले ।।

प्रतिश्रयं च पानीयं बलिं भिक्षां च सर्वतः ।
गृहस्थवासी व्रतवान् दद्याद् गाश्चैव पोषयेत् ।।
गृहस्थ पुरुष धर्मपालनका व्रत लेकर अतिथिके लिये ठहरनेका स्थान, जल, उपहार और भिक्षा दे तथा गौओंका पालन-पोषण करे ।।

बहिर्निष्क्रमणं चैव कुर्यात् कारणतोऽपि वा ।
मध्याह्ने वार्धरात्रे वा गमनं नैव रोचयेत् ।।
वह किसी विशेष कारणसे बाहरकी यात्रा भी कर सकता है, परंतु दोपहर या आधी रातके समय उसे प्रस्थान करनेका विचार नहीं करना चाहिये ।।

विषयान् नावगाहेत स्वशक्त्या तु समाचरेत् ।
यथाऽऽयव्ययता लोके गृहस्थानां प्रपूजिता ।।
विषयोंमें डूबा न रहे। अपनी शक्तिके अनुसार धर्माचरण करे। गृहस्थ पुरुषकी जैसी आय हो, उसके अनुसार ही यदि उसका व्यय हो तो लोकमें उसकी प्रशंसा की जाती है ।।

अयशस्करमर्थघ्नं कर्म यत् परपीडनम् ।
भयाद् वा यदि वा लोभान्न कुर्वीत कदाचन ।।