महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउमोवाच
मूर्खा लोके प्रदृश्यन्ते दृढमूला विचेतसः ।
ज्ञानविज्ञानरहिताः समृद्धाश्च समन्ततः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
**उमाने पूछा—**भगवन्! इस जगत्में मूर्ख, अचेत तथा ज्ञान-विज्ञानसे रहित मनुष्य भी सब ओरसे समृद्धिशाली और दृढ़मूल दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि बालिशा अपि सर्वतः ।
समाचरन्ति दानानि दीनानुग्रहकारणात् ॥
अबुद्धिपूर्वं वा दानं ददत्येव ततस्ततः ।
ते पुनर्जन्मनि शुभे प्राप्नुवन्त्येव तत् तथा ॥
पण्डितोऽपण्डितो वापि भुङ्क्ते दानफलं नरः ।
बुद्ध्याऽनपेक्षितं दानं सर्वथा तत् फलत्युत ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! जो मनुष्य पहले मूर्ख होनेपर भी सब ओर दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करके उन्हें दान देते रहे हैं, जो पहलेसे दानके महत्त्वको न समझकर भी जहाँ-तहाँ दान देते ही रहे हैं, शुभे! वे मनुष्य पुनर्जन्म प्राप्त होनेपर वैसी अवस्थाको प्राप्त होते ही हैं। कोई मूर्ख हो या पण्डित, प्रत्येक मनुष्य दानका फल भोगता है। बुद्धिसे अनपेक्षित दान भी सर्वथा फल देता ही है ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश मानुषेषु च केचन ।
मेधाविनः श्रुतिधरा भवन्ति विशदाक्षराः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
**उमाने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े मेधावी, किसी बातको एक बार सुनकर ही उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि गुरुशुश्रूषका भृशम् ।
ज्ञानार्थं ते तु संगृह्य तीर्थं ते विधिपूर्वकम् ॥
विधिनेव परांश्चैव ग्राहयन्ति च नान्यथा ।
अश्लाघमाना ज्ञानेन प्रशान्ता यतवाचकाः ॥