भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1252, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1252

विद्यास्थानानि ये लोके स्थापयन्ति च यत्नतः । तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ॥ मेधाविनः श्रुतिधरा भवन्ति विशदाक्षराः । श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले गुरुकी अत्यन्त सेवा करनेवाले रहे हैं और ज्ञानके लिये विधिपूर्वक गुरुका आश्रय लेकर स्वयं भी दूसरोंको विधिसे ही अपनी विद्या ग्रहण कराते रहे हैं, अविधिसे नहीं। अपने ज्ञानके द्वारा जो कभी अपनी झूठी बड़ाई नहीं करते रहे हैं, अपितु शान्त और मौन रहे हैं तथा जो जगत्‌में यत्नपूर्वक विद्यालयोंकी स्थापना करते रहे हैं, शोभने! ऐसे पुरुष जब मृत्युको प्राप्त होकर पुनर्जन्म लेते हैं, तब मेधावी, किसी बातको एक बार ही सुनकर उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं ।।

उमोवाच

अपरे मानुषा देव यतन्तोऽपि यतस्ततः । बहिष्कृताः प्रदृश्यन्ते श्रुतविज्ञानबुद्धितः ॥ केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने पूछा— देव! दूसरे मनुष्य यत्न करनेपर भी जहाँ-तहाँ शास्त्रज्ञान और बुद्धिसे बहिष्कृत दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि ज्ञानदर्पसमन्विताः । श्लाघमानाश्च तत् प्राप्य ज्ञानाहङ्कारमोहिताः ॥ वदन्ति ये परान् नित्यं ज्ञानाधिक्येन दर्पिताः । ज्ञानादसूयां कुर्वन्ति न सहन्ते हि चापरान् ॥ तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने । मानुष्यं सुचिरात् प्राप्य तत्र बोधविवर्जिताः ॥ भवन्ति सततं देवि यतन्तो हीनमेधसः ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य ज्ञानके घमंडमें आकर अपनी झूठी प्रशंसा करते हैं और ज्ञान पाकर उसके अहंकारसे मोहित हो दूसरोंपर आक्षेप करते हैं, जिन्हें सदा अपने अधिक ज्ञानका गर्व रहता है, जो ज्ञानसे दूसरोंके दोष प्रकट किया करते हैं और दूसरे ज्ञानियोंको नहीं सहन कर पाते हैं, शोभने! ऐसे मनुष्य मृत्युके पश्चात् पुनर्जन्म लेनेपर चिरकालके बाद मनुष्य-योनि पाते हैं। देवि! उस जन्ममें वे सदा यत्न करनेपर भी बोधहीन और बुद्धिरहित होते हैं ।।

उमोवाच