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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1262, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1262

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले क्रोध और लोभके वशीभूत होकर देवताके स्थानको अपने पैरोंसे भ्रष्ट करते, घुटनों और एड़ियोंसे मारकर प्राणियोंकी हिंसा करते हैं; शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्म लेनेपर श्वपद आदि नाना प्रकारके पाद-रोगोंसे पीड़ित होते हैं।।

उमोवाच भगवन् मानुषाः केचिद् दृश्यन्ते बहवो भुवि । वातजैः पित्तजै रोगैर्युगपत् संनिपातजैः ।। रोगैर्बहुविधैर्देव क्लिश्यमानाः सुदुःखिताः । उमाने पूछा— भगवन्! देव! इस भूतलपर कुछ ऐसे लोगोंकी बहुत बड़ी संख्या दिखायी देती है, जो वात, पित्त और कफजनित रोगोंसे तथा एक ही साथ इन तीनोंके संनिपातसे तथा दूसरे-दूसरे अनेक रोगोंसे कष्ट पाते हुए बहुत दुःखी रहते हैं ।। असमस्तैः समस्तैश्च आढ्या वा दुर्गतास्तथा ।। केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।। वे धनी हों या दरिद्र, पूर्वोक्त रोगोंमेंसे कुछके द्वारा अथवा समस्त रोगोंके द्वारा कष्ट पाते रहते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।। ये पुरा मनुजा देवि त्वासुरं भावमाश्रिताः । स्ववशाः कोपनपरा गुरुविद्वेषिणस्तथा ।। परेषां दुःखजनका मनोवाक्कायकर्मभिः । छिन्दन् भिन्दंस्तुदन्नेव नित्यं प्राणिषु निर्दयाः ।। एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । यदि वै मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः ।। श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! इसका कारण मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो। देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्ममें असुरभावका आश्रय ले स्वच्छन्दचारी, क्रोधी और गुरुद्रोही हो जाते हैं, मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा दूसरोंको दुःख देते हैं, काटते, विदीर्ण करते और पीड़ा देते हुए सदा ही प्राणियोंके प्रति निर्दयता दिखाते हैं। शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्मके समय यदि मनुष्य-जन्म पाते हैं तो वे वैसे ही होते हैं ।। तत्र ते बहुभिर्घोरैस्तप्यन्ते व्याधिभिः प्रिये ।। केचिच्च छर्दिसंयुक्ताः केचित्काससमन्विताः । ज्वरातिसारतृष्णाभिः पीड्यमानास्तथा परे ।। पादगुल्मैश्च बहुभिः श्लेष्मदोषसमन्विताः ।

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