महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1263, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपादरोगैश्च विविधैर्व्रणकुष्ठभगन्दरैः ॥ आढ्या वा दुर्गता वापि दृश्यन्ते व्याधिपीडिताः ॥ प्रिये! उस शरीरमें वे बहुतेरे भयंकर रोगोंसे संतप्त होते हैं। किसीको उलटी होती है तो कोई खाँसीसे कष्ट पाते हैं। दूसरे बहुत-से मनुष्य ज्वर, अतिसार और तृष्णासे पीड़ित रहते हैं। किन्हींको अनेक प्रकारके पादगुल्म सताते हैं। कुछ लोग कफदोषसे पीड़ित होते हैं। कितने ही नाना प्रकारके पादरोग, व्रणकुष्ठ और भगन्दर रोगोंसे रुग्ण रहते हैं। वे धनी हों या दरिद्र सब लोग रोगोंसे पीड़ित दिखायी देते हैं ॥ एवमात्मकृतं कर्म भुञ्जते तत्र तत्र ते । ग्रहीतुं न च शक्यं हि केनचिद्ध्यकृतं फलम् ॥ इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥ इस प्रकार उन-उन शरीरोंमें वे अपने किये हुए कर्मका ही फल भोगते हैं। कोई भी बिना किये हुए कर्मके फलको नहीं पा सकता। देवि! इस प्रकार यह विषय मैंने तुम्हें बताया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥
उमोवाच भगवन् देवदेवेश भूतपाल नमोऽस्तु ते । ह्रस्वाङ्गाश्चैव वक्राङ्गा कुब्जा वामनकास्तथा ॥ अपरे मानुषा देव दृश्यन्ते कुणिबाहवः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! भूतनाथ! आपको नमस्कार है। देव! दूसरे मनुष्य छोटे शरीरवाले, टेढ़े-मेढ़े अंगोंवाले, कुबड़े, बौने और लूले दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच ये पुरा मनुजा देवि लोभमोहसमन्विताः । धान्यमानान् विकुर्वन्ति क्रयविक्रयकारणात् ॥ तुलादोषं तदा देवि धृतमानेषु नित्यशः । अर्धापकर्षणाच्चैव सर्वेषां क्रयविक्रये ॥ अङ्गदोषकरा ये तु परेषां कोपकारणात् । मांसादाश्चैव ये मूर्खा अयथावत्प्रथाः सदा ॥ एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । ह्रस्वाङ्गा वामनाश्चैव कुब्जाश्चैव भवन्ति ते ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे युक्त हो खरीद-बिक्रीके लिये अनाज तौलनेके बाटोंको तोड़-फोड़कर छोटे कर देते हैं, तराजूमें भी कुछ दोष रख