भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1269, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1269

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।।
ये पुरा मनुजा देवि परेषां वित्तहारकाः ।।
ऋणवृद्धिकरं क्रौर्यान्न्यासदत्तं तथैव च ।
निक्षेपकारणाद् दत्तपरद्रव्यापहारिणः ।।
प्रमादाद् विस्मृतं नष्टं परेषां धनहारकाः ।
वधबन्धपरिक्लेशैर्दासत्वं कुर्वते परान् ।।
तादृशा मरणं प्राप्ता दण्डिता यमशासनैः ।
कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते देवि सर्वथा ।।
दासभूता भविष्यन्ति जन्मप्रभृति मानवाः ।।
तेषां कर्माणि कुर्वन्ति येषां ते धनहारकाः ।
आसमाप्तेः स्वपापस्य कुर्वन्तीति विनिश्चयः ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**कल्याणि! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो। देवि! जो मनुष्य पहले दूसरोंके धनका अपहरण करते हैं, जो क्रूरतावश किसीके ऐसे धनको हड़प लेते हैं, जिसके कारण उसके ऊपर ऋण बढ़ जाता है, जो रखनेके लिये दिये हुए या धरोहरके तौरपर रखे हुए पराये धनको दबा लेते हैं अथवा प्रमादवश दूसरोंके भूले या खोये हुए धनको हर लेते हैं, दूसरोंको वध-बन्धन और क्लेशमें डालकर उनसे अपनी दासता कराते हैं; देवि! ऐसे लोग मृत्युको प्राप्त हो यमदण्डसे दण्डित होकर जब किसी तरह मनुष्य-योनिमें जन्म लेते हैं, तब जन्मसे ही दास होते हैं और उन्हींकी सेवा करते हैं, जिनका धन उन्होंने पूर्वजन्ममें हर लिया है। जबतक उनके पापका भोग समाप्त नहीं हो जाता, तबतक वे दासकर्म ही करते रहते हैं, यही शास्त्रका निश्चय है ।।
पशुभूतास्तथा चान्ये भवन्ति धनहारकाः ।
तत् तथा क्षीयते कर्म तेषां पूर्वापराधजम् ।।
पराये धनका अपहरण करनेवाले दूसरे लोग पशु होकर भी धनीकी सेवा करते हैं। ऐसा करनेसे उनका पूर्वापराधजनित कर्म क्षीण होता है ।।
किंतु मोक्षविधिस्तेषां सर्वथा तत्प्रसादनम् ।
अयथावन्मोक्षकामः पुनर्जन्मनि चेष्यते ।।
सब प्रकारसे उस धनके स्वामीको प्रसन्न कर लेना ही उसके ऋणसे छुटकारा पानेका उपाय है, किंतु जो यथावत् रूपसे उस ऋणसे छूटना नहीं चाहता, उसे पुनर्जन्म लेकर उसकी सेवा करनी पड़ती है ।।
मोक्षकामी यथान्यायं कुर्वन् कर्माणि सर्वशः ।
भर्तुः प्रसादमाकांक्षेदायासान् सर्वथा सहन् ।।
जो उस बन्धनसे छूटना चाहता हो, वह यथोचित रूपसे सारे काम करता और परिश्रमको सर्वथा सहता हुआ स्वामीको प्रसन्न करनेकी आकांक्षा रखे ।।