महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1279, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर स्त्री-भावनासे युक्त पुरुष तदनुरूप कर्म करके उस कर्मके अनुसार स्त्री हो सकता है॥
उमोवाच
भगवन् सर्वलोकेश कर्मात्मा न करोति चेत्।
कोऽन्यः कर्मकरो देहे तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि॥
उमाने पूछा— भगवन्! सर्वलोकेश्वर! यदि आत्मा कर्म नहीं करता तो शरीरमें दूसरा कौन कर्म करनेवाला है? यह मुझे बताइये॥
श्रीमहेश्वर उवाच
शृणु भामिनि कर्तारमात्मा हि न च कर्मकृत्।
प्रकृत्या गुणयुक्तेन क्रियते कर्म नित्यशः॥
श्रीमहेश्वरने कहा— भामिनि! कर्ता कौन है? यह सुनो। आत्मा कर्म नहीं करता है। प्रकृतिके गुणोंसे युक्त प्राणीद्वारा ही सदा कर्म किया जाता है॥
शरीरं प्राणिनां लोके यथा पित्तकफानिलैः।
व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्दोषैस्तथा व्याप्तं त्रिभिर्गुणैः॥
जगत्में प्राणियोंका शरीर जैसे वात, पित्त और कफ—इन तीन दोषोंसे व्याप्त रहता है, इसी प्रकार प्राणी सत्त्व, रज और तम—इन गुणोंसे व्याप्त होता है॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्वेते शरीरिणः।
प्रकाशात्मकमेतेषां सत्त्वं सततमिष्यते॥
रजो दुःखात्मकं तत्र तमो मोहात्मकं स्मृतम्।
त्रिभिरेतैर्गुणैर्युक्तं लोके कर्म प्रवर्तते॥
सत्त्व, रज और तम—ये तीनों शरीरधारीके गुण हैं। इनमेंसे सत्त्व सदा प्रकाशस्वरूप माना गया है। रजोगुण दुःखरूप और तमोगुण मोहरूप बताया गया है। लोकमें इन तीनों गुणोंसे युक्त कर्मकी प्रवृत्ति होती है॥
सत्यं प्राणिदया शौचं श्रेयः प्रीतिः क्षमा दमः।
एवमादि तथान्यच्च कर्म सात्त्विकमुच्यते॥
सत्यभाषण, प्राणियोंपर दया, शौच, श्रेय, प्रीति, क्षमा और इन्द्रिय-संयम—ये तथा ऐसे ही अन्य कर्म भी सात्त्विक कहलाते हैं॥
दाक्ष्यं कर्मपरत्वं च लोभो मोहो विधिं प्रति।
कलत्रसङ्गो माधुर्यं नित्यमैश्वर्यलुब्धता॥
रजसश्चोद्भवं चैतत् कर्म नानाविधं सदा॥
दक्षता, कर्मपरायणता, लोभ, विधिके प्रति मोह, स्त्री-संग, माधुर्य तथा सदा ऐश्वर्यका लोभ—ये नाना प्रकारके भाव और कर्म रजोगुणसे प्रकट होते हैं॥