महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1280, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनृतं चैव पारुष्यं धृतिर्विद्वेषिता भृषम् ।
हिंसासत्यं च नास्तिक्यं निद्रालस्यभयानि च ॥
तमसश्चोद्भवं चैतत् कर्म पापयुतं तथा ॥
असत्यभाषण, रूखापन, अत्यन्त अधीरता, हिंसा, असत्य, नास्तिकता, निद्रा, आलस्य और भय—ये तथा पापयुक्त कर्म तमोगुणसे प्रकट होते हैं ।।
तस्माद् गुणमयः सर्वः कार्यारम्भः शुभाशुभः ।
तस्मादात्मानमव्यग्रं विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
इसलिये समस्त शुभाशुभ कार्यारम्भ गुणमय है, अतः आत्माको व्यग्रतारहित, अकर्ता और अविनाशी समझो ।।
सात्त्विकाः पुण्यलोकेषु राजसा मानुषे पदे ।
तिर्यग्योनौ च नरके तिष्ठेयुस्तामसा नराः ॥
सात्त्विक मनुष्य पुण्यलोकोंमें जाते हैं। राजस जीव मनुष्यलोकमें स्थित होते हैं तथा तमोगुणी मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिमें और नरकमें स्थित होते हैं ।।
उमोवाच
किमर्थमात्मा भिन्नेऽस्मिन् देहे शस्त्रेण वा हते ।
स्वयं प्रयास्यति तदा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा—इस शरीरके भेदनसे अथवा शस्त्रद्वारा मारे जानेसे आत्मा स्वयं ही क्यों चला जाता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।
एतन्नैर्मापिकैश्चापि मुह्यन्ते सूक्ष्मबुद्धिभिः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा—कल्याणि! इसका कारण मैं बताता हूँ, सुनो। इस विषयमें सूक्ष्म बुद्धिवाले विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं ।।
कर्मक्षये तु सम्प्राप्ते प्राणिनां जन्मधारिणाम् ।
उपद्रवो भवेद् देहे येन केनापि हेतुना ॥
तन्निमित्तं शरीरी तु शरीरं प्राप्य संक्षयम् ।
अपयाति परित्यज्य ततः कर्मवशेन सः ॥
जन्मधारी प्राणियोंके कर्मोंका क्षय हो जानेपर इस देहमें जिस किसी भी कारणसे उपद्रव होने लगता है। उसके कारण शरीरका क्षय हो जानेपर देहाभिमानी जीव कर्मके अधीन हो उस शरीरको त्यागकर चला जाता है ।।
देहः क्षयति नैवात्मा वेदनाभिर्न चाल्यते ।
तिष्ठेत् कर्मफलं यावद् व्रजेत् कर्मक्षये पुनः ॥