महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ
पृष्ठ 1281, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1281
शरीर क्षीण होता है, आत्मा नहीं। वह वेदनाओंसे भी विचलित नहीं होता। जबतक कर्मफल शेष रहता है, तबतक जीवात्मा इस शरीरमें स्थित रहता है और कर्मोंका क्षय होनेपर पुनः चला जाता है ।।
आदिप्रभृति लोकेऽस्मिन्नेवमात्मगतिः स्मृता ।
एतत् ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।।
आदिकालसे ही इस जगत्में आत्माकी ऐसी ही गति मानी गयी है। देवि! यह सब विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)