महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1282, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश कर्मणैव शुभाशुभम् ।
यथायोगं फलं जन्तुः प्राप्नोतीति विनिश्चयः ॥
**उमाने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! जीव अपने कर्मसे यथायोग्य शुभाशुभ फल पाता है—यह निश्चय हुआ ॥
परेषां विप्रियं कुर्वन् यथा सम्प्राप्नुयाच्छुभम् ।
यदेतदस्मिंश्चेद् देहे तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
दूसरोंका अप्रिय करके भी इस शरीरमें स्थित हुआ जीवात्मा किस प्रकार शुभ फल पाता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तदप्यस्ति महाभागे अभिसंधिबलान्नृणाम् ।
हितार्थं दुःखमन्येषां कृत्वा सुखमवाप्नुयात् ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! ऐसा भी होता है कि शुभ संकल्पके बलसे मनुष्योंके हितके लिये उन्हें दुःख देकर भी पुरुष सुख प्राप्त कर सके ॥
दण्डयन् भर्त्सयन् राजा प्रजाः पुण्यमवाप्नुयात् ।
गुरुः संतर्जयन् शिष्यान् भर्ता भृत्यजनान् स्वकान् ॥
राजा प्रजाको अपराधके कारण दण्ड देता और फटकारता है तो भी वह पुण्यका ही भागी होता है। गुरु अपने शिष्योंको और स्वामी अपने सेवकोंको उनके सुधारके लिये यदि डाँटता-फटकारता है तो इससे सुखका ही भागी होता है ॥
उन्मार्गप्रतिपन्नांश्च शास्ता धर्मफलं लभेत् ॥
चिकित्सकश्च दुःखानि जनयन् हितमाप्नुयात् ।
जो कुमार्गपर चल रहे हों, उनका शासन करनेवाला राजा धर्मका फल पाता है। चिकित्सक रोगीकी चिकित्सा करते समय उसे कष्ट ही देता है तथापि रोग मिटानेका प्रयत्न करनेके कारण वह हितका ही भागी होता है ॥
एवमन्ये सुमनसो हिंसकाः स्वर्गमाप्नुयुः ॥
एकस्मिन् निहते भद्रे बहवः सुखमाप्नुयुः ।
तस्मिन् हते भवेद् धर्मः कुत एव तु पातकम् ॥
इस प्रकार दूसरे लोग भी यदि शुद्ध हृदयसे किसीको कष्ट पहुँचाते हैं तो स्वर्गलोकमें जाते हैं। भद्रे! जहाँ किसी एक दुष्टके मारे जानेपर बहुत-से सत्पुरुषोंको सुख प्राप्त होता हो तो उसके मारनेपर पातक क्या लगेगा, उलटे धर्म होता है ॥