महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1283, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिसंधेरजिह्मत्वाच्छुद्धे धर्मस्य गौरवात् । एतत् कृत्वा तु पापेभ्यो न दोषं प्राप्नुयुः क्वचित् ॥ यदि उद्देश्य कुटिलतापूर्ण न हो, अपितु धर्मके गौरवसे शुद्ध हो तो पापियोंके प्रति ऐसा व्यवहार करके भी कहीं दोषकी प्राप्ति नहीं होती ॥
उमोवाच
चतुर्विधानां जन्तूनां कथं ज्ञानमिह स्मृतम् । कृत्रिमं तत्स्वभावं वा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने पूछा—**इस जगत्में रहनेवाले चार प्रकारके प्राणियोंको कैसे ज्ञान प्राप्त होता है! वह कृत्रिम है या स्वाभाविक? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
स्थावरं जङ्गमं चेति जगद् द्विविधमुच्यते । चतस्रो योनयस्तत्र प्रजानां क्रमशो यथा ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! यह जगत् स्थावर और जंगमके भेदसे दो प्रकारका पाया जाता है! इसमें प्रजाकी क्रमशः चार योनियाँ हैं—जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज ॥
तेषामुद्भिदजा वृक्षा लतावल्ल्यश्च वीरुधः । दंशयूकादयश्चान्ये स्वेदजाः कृमिजातयः ॥ इनमेंसे वृक्ष, लता, वल्ली और तृण आदि उद्भिज्ज कहलाते हैं। डाँस और जूँ आदि कीट जातिके प्राणी स्वेदज कहे गये हैं ॥
पक्षिणश्छिद्रकर्णाश्च प्राणिनस्त्वण्डजा मताः । मृगव्यालमनुष्यांश्च विद्धि तेषां जरायुजान् ॥ जिनके पंख होते हैं और कानके स्थानमें एक छिद्र मात्र होता है, ऐसे प्राणी अण्डज माने गये हैं। पशु, व्याल (हिंसक जन्तु बाघ, चीते आदि) और मनुष्य—इनको जरायुज समझो ॥
एवं चतुर्विधां जातिमात्मा संसृत्य तिष्ठति ॥ इस तरह आत्मा इन चार प्रकारकी जातियोंका आश्रय लेकर रहता है ॥
तथा भूम्यम्बुसंयोगाद् भवन्त्युद्भिदजाः प्रिये । शीतोष्णयोस्तु संयोगाज्जायन्ते स्वेदजाः प्रिये ॥ प्रिये! पृथ्वी और जलके संयोगसे उद्भिज्ज प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है तथा स्वेदज जीव सर्दी और गर्मीके संयोगसे जीवन ग्रहण करते हैं ॥
अण्डजाश्चापि जायन्ते संयोगात् क्लेदबीजयोः । शुक्लशोणितसंयोगात् सम्भवन्ति जरायुजाः ॥