महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अभिसंधेरजिह्मत्वाच्छुद्धे धर्मस्य गौरवात् । एतत् कृत्वा तु पापेभ्यो न दोषं प्राप्नुयुः क्वचित् ॥ यदि उद्देश्य कुटिलतापूर्ण न हो, अपितु धर्मके गौरवसे शुद्ध हो तो पापियोंके प्रति ऐसा व्यवहार करके भी कहीं दोषकी प्राप्ति नहीं होती ॥
उमोवाच
चतुर्विधानां जन्तूनां कथं ज्ञानमिह स्मृतम् । कृत्रिमं तत्स्वभावं वा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने पूछा—**इस जगत्में रहनेवाले चार प्रकारके प्राणियोंको कैसे ज्ञान प्राप्त होता है! वह कृत्रिम है या स्वाभाविक? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
स्थावरं जङ्गमं चेति जगद् द्विविधमुच्यते । चतस्रो योनयस्तत्र प्रजानां क्रमशो यथा ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! यह जगत् स्थावर और जंगमके भेदसे दो प्रकारका पाया जाता है! इसमें प्रजाकी क्रमशः चार योनियाँ हैं—जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज ॥
तेषामुद्भिदजा वृक्षा लतावल्ल्यश्च वीरुधः । दंशयूकादयश्चान्ये स्वेदजाः कृमिजातयः ॥ इनमेंसे वृक्ष, लता, वल्ली और तृण आदि उद्भिज्ज कहलाते हैं। डाँस और जूँ आदि कीट जातिके प्राणी स्वेदज कहे गये हैं ॥
पक्षिणश्छिद्रकर्णाश्च प्राणिनस्त्वण्डजा मताः । मृगव्यालमनुष्यांश्च विद्धि तेषां जरायुजान् ॥ जिनके पंख होते हैं और कानके स्थानमें एक छिद्र मात्र होता है, ऐसे प्राणी अण्डज माने गये हैं। पशु, व्याल (हिंसक जन्तु बाघ, चीते आदि) और मनुष्य—इनको जरायुज समझो ॥
एवं चतुर्विधां जातिमात्मा संसृत्य तिष्ठति ॥ इस तरह आत्मा इन चार प्रकारकी जातियोंका आश्रय लेकर रहता है ॥
तथा भूम्यम्बुसंयोगाद् भवन्त्युद्भिदजाः प्रिये । शीतोष्णयोस्तु संयोगाज्जायन्ते स्वेदजाः प्रिये ॥ प्रिये! पृथ्वी और जलके संयोगसे उद्भिज्ज प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है तथा स्वेदज जीव सर्दी और गर्मीके संयोगसे जीवन ग्रहण करते हैं ॥
अण्डजाश्चापि जायन्ते संयोगात् क्लेदबीजयोः । शुक्लशोणितसंयोगात् सम्भवन्ति जरायुजाः ॥
जरायुजानां सर्वेषां मानुषं पदमुत्तमम् ।। क्लेद और बीजके संयोगसे अण्डज प्राणियोंका जन्म होता है और जरायुज प्राणी रज-वीर्यके संयोगसे उत्पन्न होते हैं। समस्त जरायुजोंमें मनुष्यका स्थान सबसे ऊँचा है ।।
अतः परं तमोत्पत्तिं शृणु देवि समाहिता । द्विविधं हि तमो लोके शार्वरं देहजं तथा ।। देवि! अब एकाग्रचित्त होकर तमकी उत्पत्ति सुनो। लोकमें दो प्रकारका तम बताया गया है—रात्रिका और देहजनित ।।
ज्योतिर्भिश्श्च तमो लोके नाशं गच्छति शार्वरम् । देहजं तु तमो लोके तैः समस्तैर्न शाम्यति ।। लोकमें ज्योति या तेजके द्वारा रात्रिका अन्धकार नष्ट हो जाता है; परंतु जो देहजनित तम है, वह सम्पूर्ण ज्योतियोंके प्रकाशित होनेपर भी नहीं शान्त होता ।।
तमसस्तस्य नाशार्थं नोपायमधिजग्मिवान् । तपश्चचार विपुलं लोककर्ता पितामहः ।। लोककर्ता पितामह ब्रह्माजीको जब उस तमका नाश करनेके लिये कोई उपाय नहीं सूझा, तब वे बड़ी भारी तपस्या करने लगे ।।
चरतस्तु समुद्भूता वेदाः साङ्गाः सहोत्तराः । ताँल्लब्ध्वा मुमुदे ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ।। देहजं तत् तमो घोरं वेदैरेव विनाशितम् ।। तपस्या करते समय उनके मुखसे छहों अंगों और उपनिषदोंसहित चारों वेद प्रकट हुए। उन्हें पाकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने लोकोंके हितकी कामनासे वेदोंके ज्ञानद्वारा ही उस देहजनित घोर तमका नाश किया ।।
कार्याकार्यमिदं चेति वाच्यावाच्यमिदं त्विति । यदि चेन्न भवेल्लोके श्रुतं चारित्रदैशिकम् ।। पशुभिर्निर्विशेषं तु चेष्टन्ते मानुषा अपि ।। यह वेदज्ञान कर्तव्य और अकर्तव्यकी शिक्षा देनेवाला है, वाच्य और अवाच्यका बोध करानेवाला है। यदि संसारमें सदाचारकी शिक्षा देनेवाली श्रुति न हो तो मनुष्य भी पशुओंके समान ही मनमानी चेष्टा करने लगें ।।
यज्ञादीनां समारम्भः श्रुतेनैव विधीयते । यज्ञस्य फलयोगेन देवलोकः समृद्ध्यते ।। वेदोंके द्वारा ही यज्ञ आदि कर्मोंका आरम्भ किया जाता है। यज्ञफलके संयोगसे देवलोककी समृद्धि बढ़ती है ।।
प्रीतियुक्ताः पुनर्देवा मानुषाणां भवन्त्युत । एवं नित्यं प्रवर्धेते रोदसी च परस्परम् ।।
इससे देवता मनुष्योंपर प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार पृथ्वी और स्वर्गलोक दोनों एक-दूसरेकी उन्नतिमें सदा सहयोगी होते हैं।।
लोकसंधारणं तस्माच्छ्रुतमित्यवधारय।
ज्ञानाद् विशिष्टं जन्तूनां नास्ति लोकत्रयेऽपि च।।
अतः तुम यह अच्छी तरह समझ लो कि वेद ही धर्मकी प्रवृत्तिद्वारा सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाला है। जीवोंके लिये इस त्रिलोकीमें ज्ञानसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है।।
सम्प्रगृह्य श्रुतं सर्वं कृतकृत्यो भवत्युत।
उपर्युपरि मर्त्यानां देववत् सम्प्रकाशते।।
सम्पूर्ण वेदोंका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके द्विज कृतकृत्य हो जाता है और साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा ऊँची स्थितिमें पहुँचकर देवताके समान प्रकाशित होने लगता है।।
कामं क्रोधं भयं दर्पमज्ञानं चैव बुद्धिजम्।
तच्छ्रुतं नुदति क्षिप्रं यथा वायुर्बलाहकान्।।
जैसे हवा बादलोंको उड़ाकर छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार वेदशास्त्रजनित ज्ञान काम, क्रोध, भय, दर्प और बौद्धिक अज्ञानको भी शीघ्र ही दूर कर देता है।।
अल्पमात्रं कृतो धर्मो भवेज्ज्ञानवता महान्।
महानपि कृतो धर्मो ह्यज्ञानान्निष्फलो भवेत्।।
ज्ञानवान् पुरुषके द्वारा किया हुआ थोड़ा-सा धर्म भी महान् बन जाता है और अज्ञानपूर्वक किया हुआ महान् धर्म भी निष्फल हो जाता है।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिज्जातिस्मरणसंयुताः।
किमर्थमभिजायन्ते जानन्तः पौर्वदैहिकम्।।
उमाने पूछा— भगवन्! कुछ मनुष्योंको पूर्वजन्म-की बातोंका स्मरण होता है। वे किसलिये पूर्व शरीरके वृत्तान्तको जानते हुए जन्म लेते हैं?।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता।।
ये मृताः सहसा मर्त्या जायन्ते सहसा पुनः।
तेषां पौराणिकोऽभ्यासः कंचिद् कालं हि तिष्ठति।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं तुम्हें तत्त्वकी बात बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। जो मनुष्य सहसा मृत्युको प्राप्त होकर फिर कहीं सहसा जन्म ले लेते हैं, उनका पुराना अभ्यास या संस्कार कुछ कालतक बना रहता है।।
तस्माज्जातिस्मरा लोके जायन्ते बोधसंयुताः।
तेषां विवर्धतां संज्ञा स्वप्नवत् सा प्रणश्यति ।।
परलोकस्य चास्तित्वे मूढानां कारणं त्विदम् ।।
इसलिये वे लोकमें पूर्वजन्मकी बातोंके ज्ञानसे युक्त होकर जन्म लेते हैं और जातिस्मर (पूर्वजन्मका स्मरण करनेवाले) कहलाते हैं। फिर ज्यों-ज्यों वे बढ़ने लगते हैं, त्यों-त्यों उनकी स्वप्न-जैसी वह पुरानी स्मृति नष्ट होने लगती है। ऐसी घटनाएँ मूर्ख मनुष्योंको परलोककी सत्तापर विश्वास करानेमें कारण बनती हैं ।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिन्मृता भूत्वापि सम्प्रति ।
निवर्तमाना दृश्यन्ते देहेष्वेव पुनर्नराः ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! कई मनुष्य मरनेके बाद भी फिर उसी शरीरमें लौटते देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि कारणं शृणु शोभने ।।
प्राणैर्वियुज्यमानानां बहुत्वात् प्राणिनां क्षये ।
तथैव नामसामान्याद् यमदूता नृणां प्रति ।।
वहन्ति ते क्वचिन्मोहादन्यं मर्त्यं तु धार्मिकाः ।
निर्विकारं हि तत् सर्वं यमो वेद कृताकृतम् ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**शोभने! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो। प्राणी बहुत हैं और मृत्युकाल आनेपर सभीका अपने प्राणोंसे वियोग हो जाता है। धार्मिक यमदूत कभी-कभी कई मनुष्योंके एक ही नाम होनेके कारण मोहवश एकके बदले दूसरेको पकड़ ले जाते हैं, परंतु यमराज निर्विकार भावसे दूतोंके द्वारा किये गये और नहीं किये गये, सभी कार्योंको जानते हैं ।।
तस्मात् संयमनीं प्राप्य यमेनैकेन मोक्षिताः ।
पुनरेवं निवर्तन्ते शेषं भोक्तुं स्वकर्मणः ।।
स्वकर्मण्यसमाप्ते तु निवर्तन्ते हि मानवाः ।।
अतः संयमनीपुरीमें जानेपर भूलसे गये हुए मनुष्यको एकमात्र यमराज फिर छोड़ देते हैं; अतः वे अपने प्रारब्ध कर्मका शेष भाग भोगनेके लिये पुनः लौट आते हैं। वे ही मनुष्य लौटते हैं, जिनका कर्म-भोग समाप्त नहीं हुआ होता है ।।
उमोवाच
भगवन् सुप्तमात्रेण प्राणिनां स्वप्नदर्शनम् ।
किं तत् स्वभावमन्यद् वा तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! सोनेमात्रसे प्राणियोंको स्वप्नका दर्शन होने लगता है। यह उनका स्वभाव है, या और कोई बात है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें॥
श्रीमहेश्वर उवाच
सुप्तानां तु मनश्चेष्टा स्वप्न इत्यभिधीयते ।
अनागतमतिक्रान्तं पश्यते संचरन्मनः ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! सोये हुए प्राणियोंके मनकी जो चेष्टा है, उसीको स्वप्न कहते हैं। स्वप्नमें विचरता हुआ मन भूत और भविष्यकी घटनाओंको देखता है॥
निमित्तं च भवेत् तस्मात् प्राणिनां स्वप्नदर्शनम् ।
एतत् ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
अतः उन घटनाओंके देखनेमें प्राणियोंके लिये स्वप्नदर्शन निमित्त बनता है। देवि! तुम्हें स्वप्नका विषय बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो?॥
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश लोके कर्मक्रियापथे ।
दैवात् प्रवर्तते सर्वमिति केचिद् व्यवस्थिताः ॥
**उमाने कहा—**भगवन्! सर्वभूतेश्वर! जगत्में दैवकी प्रेरणासे ही सबकी कर्ममार्गमें प्रवृत्ति होती है। ऐसी कुछ लोगोंकी मान्यता है॥
अपरे चेष्टया चेति दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः क्रियाम् ।
पक्षभेदे द्विधा चास्मिन् संशयस्थं मनो मम ॥
तत्त्वं वद महादेव श्रोतुं कौतूहलं हि मे ॥
दूसरे लोग क्रियाको प्रत्यक्ष देखकर ऐसा मानते हैं कि चेष्टासे ही सबकी प्रवृत्ति होती है, दैवसे नहीं। ये दो पक्ष हैं। इनमें मेरा मन संशयमें पड़ जाता है; अतः महादेव! यथार्थ बात बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! मैं तुम्हें तत्त्वकी बात बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो॥
लक्ष्यते द्विविधं कर्म मानुषेष्वेव तच्छृणु ।
पुराकृतं तयोरेकमैहिकं त्वितरत् तथा ॥
मनुष्योंमें दो प्रकारका कर्म देखा जाता है, उसे सुनो। इनमें एक तो पूर्वकृत कर्म है और दूसरा इहलोकमें किया गया है॥
लौकिकं तु प्रवक्ष्यामि दैवमानुषनिर्मितम् ।
कृषौ तु दृश्यते कर्म कर्षणं वपनं तथा ॥
रोपणं चैव लवनं यच्चान्यत् पौरुषं स्मृतम् । दैवादसिद्धिंश्च भवेद् दुष्कृतं चास्ति पौरुषे ।। अब मैं देव और मनुष्य दोनोंसे सम्पादित होनेवाले लौकिक कर्मका वर्णन करता हूँ। कृषिमें जो जुताई, बोवाई, रोपनी, कटनी तथा ऐसे ही और भी जो कार्य देखे जाते हैं, वे सब मानुष कहे गये हैं। दैवसे उस कर्ममें सफलता और असफलता होती है। मानुष कर्ममें बुराई भी सम्भव है ।।
सुयत्नाल्लभ्यते कीर्तिर्दुर्यत्नादयशस्तथा । एवं लोकगतिर्देवि आदिप्रभृति वर्तते ।। उत्तम प्रयत्न करनेसे कीर्ति प्राप्त होती है और बुरे उपायोंके अवलम्बनसे अपयश। देवि! आदिकालसे ही जगत्की ऐसी ही अवस्था है ।।
रोपणं चैव लवनं यच्चान्यत् पौरुषं स्मृतम् ।। काले वृष्टिः सुवापं च प्ररोहः पंक्तिरेव च । एवमादि तु यच्चान्यत् तद् दैवतमिति स्मृतम् ।। बीजका रोपना और काटना आदि मनुष्यका काम है; परंतु समयपर वर्षा होना, बोवाईका सुन्दर परिणाम निकलना, बीजमें अंकुर उत्पन्न होना और शस्यका श्रेणीबद्ध होकर प्रकट होना इत्यादि कार्य देवसम्बन्धी बताये गये हैं। दैवकी अनुकूलतासे ही इन कार्योंका सम्पादन होता है ।।
पञ्चभूतस्थितिश्चैव ज्योतिशामयनं तथा । अबुद्धिगम्यं यन्मर्त्यैर्हेतुभिर्वा न विद्यते ।। तादृशं कारणं दैवं शुभं वा यदि वेतरत् । यादृशं चात्मना शक्यं तत् पौरुषमिति स्मृतम् ।। पंचभूतोंकी स्थिति, ग्रहनक्षत्रोंका चलना-फिरना तथा जहाँ मनुष्योंकी बुद्धि न पहुँच सके अथवा किन्हीं कारणों या युक्तियोंसे भी समझमें न आ सके—ऐसा कर्म शुभ हो या अशुभ दैव माना जाता है और जिस बातको मनुष्य स्वयं कर सके, उसे पौरुष कहा गया है ।।
केवलं फलनिष्पत्तिरेकेन तु न शक्यते । पौरुषेणैव दैवेन युगपद् ग्रथितं प्रिये ।। केवल दैव या पुरुषार्थसे फलकी सिद्धि नहीं होती। प्रिये! प्रत्येक वस्तु या कार्य एक ही साथ पुरुषार्थ और दैव दोनोंसे ही गुँथा हुआ है ।।
तयोः समाहितं कर्म शीतोष्णं युगपत् तथा । पौरुषं तु तयोः पूर्वमारब्धव्यं विजानता ।। आत्मना तु न शक्यं हि तथा कीर्तिमवाप्नुयात् ।।
दैव और पुरुषार्थ दोनोंके समानकालिक सहयोगसे कर्म सम्पन्न होता है। जैसे एक ही कालमें सर्दी और गर्मी दोनों होती हैं, उसी प्रकार एक ही समय दैव और पुरुषार्थ दोनों काम करते हैं। इन दोनोंमें जो पुरुषार्थ है, उसका आरम्भ विज्ञ पुरुषको पहले करना चाहिये। जो अपने-आप होना सम्भव नहीं है, उसको आरम्भ करनेसे मनुष्य कीर्तिका भागी होता है ।।
खननान्मथनाल्लोके जलाग्निप्रापणं तथा ।
तथा पुरुषकारे तु दैवसम्पत् समाहिता ।।
जैसे लोकमें भूमि खोदनेसे जल तथा काष्ठका मन्थन करनेसे अग्निकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार पुरुषार्थ करनेपर दैवका सहयोग स्वतः प्राप्त हो जाता है ।।
नरस्याकुर्वतः कर्म दैवसम्पन्न लभ्यते ।
तस्मात् सर्वसमारम्भो दैवमानुषनिर्मितः ।।
जो मनुष्य कर्म नहीं करता, उसको दैवी सहायता नहीं प्राप्त होती; अतः समस्त कार्योंका आरम्भ दैव और पुरुषार्थ दोनोंपर निर्भर है ।।
उमोवाच
भगवन् सर्वलोकेश लोकनाथ वृषध्वज ।
नास्त्यात्मा कर्मभोक्तेति मृतो जन्तुर्न जायते ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! सर्वलोकेश्वर! लोकनाथ! वृषध्वज! कर्मोंका फल भतोनेवाले जीवात्मा नामक किसी द्रव्यकी सत्ता नहीं है; इसलिये मरा हुआ जीव फिर जन्म नहीं लेता है ।।
स्वभावाज्जायते सर्वं यथा वृक्षफलं तथा ।
यथोर्मयः सम्भवन्ति तथैव जगदाकृतिः ।।
जैसे वृक्षसे फल पैदा होता है, उसी प्रकार स्वभावसे ही सब कुछ उत्पन्न होता है और जैसे समुद्रसे लहरें प्रकट होती हैं, उसी प्रकार स्वभावसे ही जगत्की आकृति प्रकट होती है ।।
तपोदानानि यत् कर्म तत्र तद् दृश्यते वृथा ।
नास्ति पौनर्भवं जन्म इति केचिद् व्यवस्थिताः ।।
तप और दान आदि जो कर्म हैं, वे सब व्यर्थ दिखायी देते हैं, किंतु जीवात्माका पुनर्जन्म नहीं होता है। ऐसी कुछ लोगोंकी मान्यता है ।।
परोक्षवचनं श्रुत्वा न प्रत्यक्षस्य दर्शनात् ।
तत् सर्वं नास्ति नास्तीति संशयस्थास्तथा परे ।।
पक्षभेदान्तरे चास्मिंस्तत्त्वं मे वक्तुमर्हसि ।
उक्तं भगवता यत् तु तत् तु लोकस्य संस्थितिः ।।
शास्त्रोंके परोक्षवादी वचन सुनकर और प्रत्यक्ष दर्शन न होनेसे कितने ही लोग इस संशयमें पड़े रहते हैं कि वह सब (परलोक) नहीं है, नहीं है। इस पक्षभेदके भीतर यथार्थवाद क्या है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। भगवन्! आपने जो कुछ बताया है, वही लोककी स्थिति है॥
नारद उवाच
प्रश्नमेतत् तु पृच्छन्त्या रुद्राण्या परिषत् तदा।
कौतूहलयुता श्रोतुं समाहितमनाभवत्॥
**नारदजी कहते हैं—**रुद्राणीके यह प्रश्न उपस्थित करनेपर सारी मुनिमण्डली एकाग्रचित्त होकर इसका उत्तर सुननेके लिये उत्कण्ठित हो गयी॥
श्रीमहेश्वर उवाच
नैतदस्ति महाभागे यद् वदन्तीह नास्तिकाः।
एतदेवाभिशस्तानां श्रुतविद्वेषिणां मतम्॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! इस विषयमें नास्तिक लोग जो कुछ कहते हैं, वह ठीक नहीं है। यह तो कलंकित शास्त्रद्रोही पुरुषोंका मत है॥
सर्वमर्थं श्रुतं दृष्टं यत् प्रागुक्तं मया तव।
तदाप्रभृति मर्त्यानां श्रुतमाश्रित्य पण्डिताः॥
कामान् संछिद्य परिघान् धृत्या वै परमासनाः।
अभियान्त्येव ते स्वर्गं पश्यन्तः कर्मणः फलम्॥
मैंने पहले तुमसे जो कुछ कहा है, वह सारा विषय शास्त्रसम्मत तथा अनुभूत है। तभीसे मनुष्योंमें जो विद्वान् पुरुष हैं, वे वेद-शास्त्रका आश्रय ले परिघ-जैसी कामनाओंका उच्छेद करके धैर्यपूर्वक उत्तम आसन लगाये ध्यानमग्न रहते हैं, वे कर्मोंका फल प्रत्यक्ष देखते हुए स्वर्ग (ब्रह्म) लोकको ही जाते हैं॥
एवं श्रद्धाभवं लोके परतः सुमहत् फलम्।
बुद्धिः श्रद्धा च विनयः करणानि हितैषिणाम्॥
इस प्रकार परलोकमें श्रद्धाजनित महान् फलकी प्राप्ति होती है। जो अपना हित चाहते हैं, उन पुरुषोंके लिये बुद्धि, श्रद्धा और विनय—ये कारण (उन्नतिके साधन) हैं॥
तस्मात् स्वर्गाभिगन्तारः कतिचित् त्वभवन् नराः।
अन्ये करणहीनत्वान्नास्तिक्यं भावमाश्रिताः॥
अतः कुछ ही लोग उक्त साधनसे सम्पन्न होनेके कारण स्वर्ग आदि पुण्यलोकोंमें जाते हैं। दूसरे लोग उन साधनोंसे हीन होनेके कारण नास्तिकभावका अवलम्बन लेते हैं॥
श्रुतविद्वेषिणो मूर्खा नास्तिकादृढनिश्चयाः।
निष्क्रियास्तु निरन्नादाः पतन्त्येवाधमां गतिम्॥
वेदविद्वेषी मूर्ख, नास्तिक, अदृढनिश्चयवाले, क्रियाहीन तथा अन्नार्थियोंको बिना कुछ दिये ही घरसे निकाल देनेवाले पापी मनुष्य अधम गतिको प्राप्त होते हैं ।।
नास्त्यस्तीति पुनर्जन्म कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
नाधिगच्छन्ति तन्नित्यं हेतुवादशतैरपि ॥
पुनर्जन्म नहीं होता है या होता है, इस विषयमें बड़े-बड़े विद्वान् मोहित हो जाते हैं। वे सैकड़ों युक्तिवादोंद्वारा भी उसे सर्वथा नहीं समझ पाते हैं ।।
एषा ब्रह्मकृता माया दुर्विज्ञेया सुरासुरैः ।
किं पुनर्मानवैर्लोके ज्ञातुकामैः कुबुद्धिभिः ॥
यह ब्रह्माजीके द्वारा रची माया है, जिसे देवता और असुर भी बड़ी कठिनाईसे समझ पाते हैं; फिर दूषित बुद्धिवाले मानव यदि लोकमें इस विषयको जानना चाहें तो कैसे जान सकते हैं ।।
केवलं श्रद्धया देवि श्रुतिमात्रनिविष्टया ।
ततोऽस्तीत्येव मन्तव्यं तथा हितमवाप्नुयात् ॥
देवि! केवल वेदमें पूर्णतः श्रद्धा करके 'परलोक एवं पुनर्जन्म होता है' ऐसा मानना चाहिये। इससे आस्तिक मनुष्यका हित होता है ।।
दैवगुह्येषु चान्येषु हेतुर्देवि निरर्थकः ।
बधिरान्धवदेवात्र वर्तितव्यं हितैषिणा ॥
एतत् ते कथितं देवि ऋषिगुह्यं प्रजाहितम् ॥
देवि! देवसम्बन्धी जो दूसरे-दूसरे गुह्य विषय हैं, उनमें युक्तिवाद काम नहीं देता। जो अपना हित चाहनेवाले हैं, उन्हें इस विषयमें अन्धे और बहरेके समान बर्ताव करना चाहिये। अर्थात् नास्तिकोंकी ओर न तो देखे और न उनकी बातें ही सुने। देवि! यह ऋषियोंके लिये गोपनीय तथा प्रजाके लिये हितकर विषय तुम्हें बताया गया है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[यमलोक तथा वहाँके मार्गोंका वर्णन, पापियोंकी नरकयातनाओं तथा कर्मानुसार विभिन्न योनियोंमें उनके जन्मका उल्लेख]
[यमलोक तथा वहाँके मार्गोंका वर्णन, पापियोंकी नरकयातनाओं तथा कर्मानुसार विभिन्न योनियोंमें उनके जन्मका उल्लेख]
उमोवाच
भगवन् सर्वलोकेश त्रिपुरार्दन शंकर ।
कीदृशा यमदण्डास्ते कीदृशाः परिचारकाः ॥
उमाने पूछा— भगवन्! सर्वलोकेश्वर! त्रिपुरनाशन! शंकर! यमदण्ड कैसे होते हैं? तथा यमराजके सेवक किस तरहके होते हैं? ।।
कथं मृतास्ते गच्छन्ति प्राणिनो यमसादनम् ।
कीदृशं भवनं तस्य कथं दण्डयति प्रजाः ॥
एतत् सर्वं महादेव श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
मृत प्राणी यमलोकको कैसे जाते हैं? यमराजका भवन कैसा है? तथा वे प्रजावर्गको किस तरह दण्ड देते हैं? प्रभो! महादेव! मैं यह सब सुनना चाहती हूँ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
शृणु कल्याणि तत् सर्वं यत् ते देवि मनःप्रियम् ।
दक्षिणस्यां दिशि शुभे यमस्य सदनं महत् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! देवि! तुम्हारे मनमें जो-जो पूछने योग्य बातें हैं, उन सबका उत्तर सुनो। शुभे! दक्षिणदिशामें यमराजका विशाल भवन है ।।
विचित्रं रमणीयं च नानाभावसमन्वितम् ।
पितृभिः प्रेतसंघैश्च यमदूतैश्च संततम् ॥
वह बहुत ही विचित्र, रमणीय एवं नाना प्रकारके भावोंसे युक्त है। पितरों, प्रेतों और यमदूतोंसे व्याप्त है ।।
प्राणिसंघैश्च बहुभिः कर्मवश्यैश्च पूरितम् ।
तत्रास्ते दण्डयन् नित्यं यमो लोकहिते रतः ॥
कर्मोंके अधीन हुए बहुत-से प्राणियोंके समुदाय उस यमलोकको भरे हुए हैं। वहाँ लोकहितमें तत्पर रहनेवाले यम पापियोंको सदा दण्ड देते हुए निवास करते हैं ।।
मायया सततं वेत्ति प्राणिनां यच्छुभाशुभम् ।
मायया संहरंस्तत्र प्राणिसङ्घान् यतस्ततः ॥
वे अपनी मायाशक्तिसे ही सदा प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मको जानते हैं और मायाद्वारा ही जहाँ-तहाँसे प्राणि-समुदायका संहार कर लाते हैं ।।
तस्य मायामयाः पाशा न वेद्यन्ते सुरासुरैः ।
को हि मानुषमात्रस्तु देवस्य चरितं महत् ॥
उनके मायामय पाश हैं, जिन्हें न देवता जानते हैं, न असुर। फिर मनुष्योंमें कौन ऐसा
है, जो उन यमदेवके महान् चरित्रको जान सके ।।
एवं संवसतस्तस्य यमस्य परिचारकाः ।
गृहीत्वा संनयन्त्येव प्राणिनः क्षीणकर्मणः ॥
इस प्रकार यमलोकमें निवास करते हुए यमराजके दूत जिनके प्रारब्धकर्म क्षीण हो गये
हैं, उन प्राणियोंको पकड़कर उनके पास ले जाते हैं ।।
येन केनापदेशेन त्वपदेशस्तदुद्भवः ।
कर्मणा प्राणिनो लोके उत्तमाधममध्यमाः ॥
यथार्हं तान् समादाय नयन्ति यमसादनम् ।
जिस किसी निमित्तसे वे प्राणियोंको ले जाते हैं, वह निमित्त वे स्वयं बना लेते हैं।
जगत्में कर्मानुसार उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके प्राणी होते हैं। यथायोग्य उन
सभी प्राणियोंको लेकर वे यमलोकमें पहुँचाते हैं ।।
धार्मिकानुत्तमान् विद्धि स्वर्गिणस्ते यथामराः ॥
नृषु जन्म लभन्ते ये कर्मणा मध्यमाः स्मृताः ।
धार्मिक पुरुषोंको उत्तम समझो। वे देवताओंके समान स्वर्गके अधिकारी होते हैं। जो
अपने कर्मके अनुसार मनुष्योंमें जन्म लेते हैं, वे मध्यम माने गये हैं ।।
तिर्यङ्नरकगन्तारो ह्यधमास्ते नराधमाः ॥
पन्थानस्त्रिविधा दृष्टाः सर्वेषां गतजीविनाम् ।
रमणीयं निराबाधं दुर्दर्शमिति नामतः ॥
जो नराधम पशु-पक्षियोंकी योनि तथा नरकमें जानेवाले हैं, वे अधमकोटिके अन्तर्गत
हैं। सभी मरे हुए प्राणियोंके लिये तीन प्रकारके मार्ग देखे गये हैं—एक रमणीय, दूसरा
निराबाध और तीसरा दुर्दर्श ।।
रमणीयं तु यन्मार्ग पताकाध्वजसंकुलम् ।
धूपितं सिक्तसम्मूष्टं पुष्पमालाभिसंकुलम् ॥
मनोहरं सुखस्पर्शं गच्छतामेव तद् भवेत् ।
निराबाधं यथालोकं सुप्रशस्तं कृतं भवेत् ।।
जो रमणीय मार्ग है, वह ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित और फूलोंकी मालाओंसे
अलंकृत है। उसे झाड़-बुहारकर उसके ऊपर जलका छिड़काव किया गया होता है। वहाँ
धूपकी सुगन्ध छायी रहती है। उसका स्पर्श चलनेवालोंके लिये सुखद और मनोहर होता है।
निराबाध वह मार्ग है, जो लौकिक मार्गोंके समान सुन्दर एवं प्रशस्त बनाया गया है। वहाँ
किसी प्रकारकी बाधा नहीं होती ।।
तृतीयं यत् तु दुर्दर्श दुर्गन्धितमसावृतम् ।
परुषं शर्कराकीर्णं श्वदंष्ट्राबहुलं भृशम् ॥
कृमिकीटसमाकीर्णं भजतामतिदुर्गमम् । जो तीसरा मार्ग है, वह देखनेमें भी दुःखद होनेके कारण दुर्दर्श कहलाता है। वह दुर्गन्धयुक्त एवं अन्धकार-से आच्छन्न है। कंकड़-पत्थरोंसे व्याप्त और कठोर जान पड़ता है। वहाँ कुत्ते और दाढ़ोंवाले हिंसक जन्तु अधिक रहते हैं। कृमि और कीट सब ओर छाये रहते हैं। उस मार्गसे चलनेवालोंको वह अत्यन्त दुर्गम प्रतीत होता है ।।
मागैंरैवं त्रिभिर्नित्यमुत्तमाधममध्यमान् ।। संनयन्ति यथा काले तन्मे शृणु शुचिस्मिते । शुचिस्मिते! इस प्रकार तीन मार्गोंद्वारा वे सदा यथासमय उत्तम, मध्यम और अधम पुरुषोंको जिस प्रकार ले जाते हैं, वह मुझसे सुनो ।।
उत्तमानन्तकाले तु यमदूताः सुसंवृताः । नयन्ति सुखमादाय रमणीयपथेन वै ।। उत्तम पुरुषोंको अन्तके समय ले जानेके लिये जो यमदूत आते हैं, वे सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित होते हैं और उन पुरुषोंको साथ ले रमणीय मार्गद्वारा सुखपूर्वक ले जाते हैं ।।
मध्यमान् योधवेषेण मध्यमेन पथा तथा ।। चण्डालवेषास्त्वधमान् गृहीत्वा भर्त्संतर्जनैः । आकर्षन्तस्तथा पाशैर्दुर्दर्शेन नयन्ति तान् ।। त्रिविधानेवमादाय नयन्ति यमसादनम् ।। मध्यमकोटिके प्राणियोंको मध्यम मार्गके द्वारा योद्धाका वेष धारण किये हुए यमदूत अपने साथ ले जाते हैं तथा चाण्डालका वेष धारण करके अधमकोटिके प्राणियोंको पकड़कर उन्हें डाँटते-फटकारते तथा पाशोंद्वारा बाँधकर घसीटते हुए दुर्दर्श नामक मार्गसे ले जाते हैं। इस प्रकार त्रिविध प्राणियोंको लेकर वे उन्हें यमलोकमें पहुँचाते हैं ।।
धर्मासनगतं दक्षं भ्राजमानं स्वतेजसा । लोकपालं सभाध्यक्षं तथैव परिषदगतम् ।। दर्शयन्ति महाभागे यामिकास्तं निवेद्य ते । महाभागे! वहाँ धर्मके आसनपर अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए अपनी सभाके सभापतिके रूपमें चतुर लोकपाल यम बैठे होते हैं। यमदूत उन्हें सूचना देकर अपने साथ लाये हुए प्राणीको दिखाते हैं ।।
पूजयन् दण्डयन् कांश्चित् तेषां शृण्वन् शुभाशुभम् । व्यावृतो बहुसाहस्रैस्तत्रास्ते सततं यमः ।। यमराज कई सहस्र सदस्योंसे घिरे हुए अपनी सभामें विराजमान होते हैं। वे वहाँ आये हुए प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मोंका ब्यौरेवार वर्णन सुनकर उनमेंसे किन्हींका आदर करते हैं और किन्हींको दण्ड देते हैं ।।
गतानां तु यमस्तेषामुत्तमानभिपूजयेत् । अभिसंगृह्य विधिवत् पृष्ट्वा स्वागतकौशलम् ॥ यमलोकमें गये हुए प्राणियोंमेंसे जो उत्तम होते हैं, उन्हें विधिपूर्वक अपनाकर स्वागतपूर्वक उनका कुशल-समाचार पूछकर यमराज उनकी पूजा करते हैं ॥ प्रस्तुत्य तत् कृतं तेषां लोकं संदिशते यमः । यमेनैवमनुज्ञाता यान्ति पश्चात् त्रिविष्टपम् ॥ उनके सत्कर्मोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके यमराज उन्हें यह संदेश देते हैं कि ‘आपको अमुक पुण्य लोकमें जाना है।’ यमराजकी ऐसी आज्ञा पानेके पश्चात् वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ मध्यमानां यमस्तेषां श्रुत्वा कर्म यथातथम् । जायन्तां मानुषेष्वेव इति संदिशते च तान् ॥ मध्यम कोटिके पुरुषोंके कर्मोंका यथावत् वर्णन सुनकर यमराज उनके लिये यह आज्ञा देते हैं कि ‘ये लोग फिर मनुष्योंमें ही जन्म लें’ ॥ अधमान् पाशसंयुक्तान् यमो नावेक्षते गतान् । यमस्य पुरुषा घोराश्चण्डालसमदर्शनाः ॥ यातनाः प्रापयन्त्येताँल्लोकपालस्य शासनात् ॥ पाशोंमें बँधे हुए जो अधम कोटिके प्राणी आते हैं, यमराज उनकी ओर आँख उठाकर देखते तक नहीं हैं। चाण्डालके समान दिखायी देनेवाले भयंकर यमदूत ही लोकपाल यमकी आज्ञासे उन पापियोंको यातनाके स्थानोंमें ले जाते हैं ॥ भिन्दन्तश्च तुदन्तश्च प्रकर्षन्तो यतस्ततः । क्रोशन्तः पातयन्त्येतान् मिथो गर्तेष्ववाङ्मुखान् ॥ वे उन्हें विदीर्ण किये डालते हैं, भाँति-भाँतिकी पीड़ाएँ देते हैं, जहाँ-तहाँ घसीटकर ले जाते हैं तथा उन्हें कोसते हुए नीचे मुँह करके नरकके गड्ढोंमें गिरा देते हैं ॥ संयामिनयः शिलाश्चैषां पतन्ति शिरसि प्रिये । अयोमुखाः कङ्कबला भक्षयन्ति सुदारुणाः ॥ प्रिये! फिर उनके सिरपर ऊपरसे संयामिनी शिलाएँ गिरायी जाती हैं तथा लोहेकी-सी चोंचवाले अत्यन्त भयंकर कौए और बगुले उन्हें नोच खाते हैं ॥ असिपत्रवने घोरे चारयन्ति तथा परान् । तीक्ष्णदंष्ट्रास्तथा श्वानः कांश्चित् तत्र ह्यदन्ति वै ॥ दूसरे पापियोंको यमदूत घोर असिपत्रवनमें घुमाते हैं। वहाँ तीखी दाढ़ोंवाले कुत्ते कुछ पापियोंको काट खाते हैं ॥ तत्र वैतरणी नाम नदी ग्राहसमाकुला । दुष्प्रवेशा च घोरा च मूत्रशोणितवाहिनी ॥
यमलोकमें वैतरणी नामवाली एक नदी है, जो पानीकी जगह मूत और रक्त बहाती है। ग्राहोंसे भरी होनेके कारण वह बड़ी भयंकर जान पड़ती है। उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है ।।
तस्यां सम्मज्जयन्त्येते तृषितान् पाययन्ति तान् ।
आरोपयन्ति वै कांश्चित् तत्र कण्टकशाल्मलीम् ।।
यमदूत इन पापियोंको उसी नदीमें डुबो देते हैं। प्यासे प्राणियोंको उस वैतरणीका ही जल पिलाते हैं। वहाँ कितने ही काँटेदार सेमलके वृक्ष हैं। यमदूत कुछ पापियोंको उन्हीं वृक्षोंपर चढ़ाते हैं ।।
यन्त्रचक्रेषु तिलवत् पीड्यन्ते तत्र केचन ।
अङ्गारेषु च दह्यन्ते तथा दुष्कृतकारिणः ।।
जैसे कोल्हूमें तिल पेरे जाते हैं, उसी प्रकार कितने ही पापी मशीनके चक्कोंमें पेरे जाते हैं। कितने ही अंगारोंमें डालकर जलाये जाते हैं ।।
कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते पच्यन्ते सिकतासु वै ।
पाट्यन्ते तरुवच्छस्त्रैः पापिनः क्रकचादिभिः ।।
कुछ कुम्भीपाकोंमें पकाये जाते हैं, कुछ तपी हुई बालुकाओंमें भूने जाते हैं और कितने ही पापी आरे आदि शस्त्रोंद्वारा वृक्षकी भाँति चीरे जाते हैं ।।
भिद्यन्ते भागशः शूलैस्तुद्यन्ते सूक्ष्मसूचिभिः ।।
एवं त्वया कृतो दोषस्तदर्थं दण्डनं त्विति ।
वाचैवं घोषयन्ति स्म दण्डमानाः समन्ततः ।।
कितनोंके शूलोंद्वारा टुकड़े-टुकड़े कर दिये जाते हैं। कुछ पापियोंके शरीरोंमें महीन सूइयाँ चुभोयी जाती हैं। दण्ड देनेवाले यमदूत अपनी वाणीद्वारा सब ओर यह घोषित करते रहते हैं कि तूने अमुक पाप किया है, जिसके लिये यह दण्ड तुझे मिल रहा है ।।
एवं ते यातनां प्राप्य शरीरैर्यातनाशयैः ।
प्रसहन्तश्च तद् दुःखं स्मरन्तः स्वापराधजम् ।।
क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च न मुच्यन्ते कथंचन ।
स्मरन्तस्तत्र तप्यन्ते पापमात्मकृतं भृशम् ।।
इस प्रकार यातनाधीन शरीरोंद्वारा यातना पाकर नारकी जीव उसके दुःखको सहते और अपने पापको स्मरण करते हुए चीखते-चिल्लाते एवं रोते रहते हैं, किंतु किसी तरह उस यातनासे छुटकारा नहीं पाते हैं। अपने किये हुए पापको याद करके वे अत्यन्त संतप्त हो उठते हैं ।।
एवं बहुविधा दण्डा भुज्यन्ते पापकारिभिः ।
यातनाभिश्च पच्यन्ते नरकेषु पुनः पुनः ।।
इस प्रकार पापाचारी प्राणियोंको नाना प्रकारके दण्ड भोगने पड़ते हैं। वे बारंबार नरकोंमें विविध यातनाओंद्वारा पकाये जाते हैं॥ अपरे यातना भुक्त्वा मुच्यन्ते तत्र किल्बिषात् ।। पापदोषक्षयकरा यातना संस्मृता नृणाम् । बहु तप्तं यथा लोहममलं तत् तथा भवेत् ॥ दूसरे लोग वहाँ यातनाएँ भोगकर उस पापसे मुक्त हो जाते हैं। जैसे अधिक तपाया हुआ लोहा निर्मल एवं शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्योंको जो नरकोंमें यातनाएँ प्राप्त होती हैं, वे उनके पाप-दोषका विनाश करनेवाली मानी गयी हैं॥
उमोवाच
भगवंस्ते कथं तत्र दण्ड्यन्ते नरकेषु वै । कति ते नरका घोराः कीदृशास्ते महेश्वर ॥ उमाने पूछा— भगवन्! महेश्वर! नरकोंमें पापियोंको किस प्रकार दण्ड दिया जाता है? वे भयानक नरक कितने और कैसे हैं? ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
शृणु भामिनि तत् सर्वं पञ्चैते नरकाः स्मृताः । भूमेरधस्ताद् विहिता घोरा दुष्कृतकर्मणाम् ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— भामिनि! तुमने जो पूछा है, वह सब सुनो। पापाचारी प्राणियोंके लिये भूमिके नीचे जो भयानक नरक बनाये गये हैं, वे मुख्यतः पाँच माने गये हैं॥ प्रथमं रौरवं नाम शतयोजनमायतम् । तावत्प्रमाणविस्तीर्णं तामसं पापपीडितम् ॥ उनमें पहला रौरव नामक नरक है, जिसकी लंबाई सौ योजन है। उसकी चौड़ाई भी उतनी ही है। वह तमोमय नरक पापके कारण प्राप्त होनेवाली पीड़ाओंसे परिपूर्ण है॥ भृशं दुर्गन्धि परुषं कृमिभिर्दारुणैर्युतम् । अतिघोरमनिर्देश्यं प्रतिकूलं ततस्ततः ॥ उससे बड़ी दुर्गन्ध निकलती है, वह कठोर नरक क्रूर स्वभाववाले कीटोंसे भरा हुआ है। वह अत्यन्त घोर, अवर्णनीय और सर्वथा प्रतिकूल है॥ ते चिरं तत्र तिष्ठन्ति न तत्र शयनासने । कृमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च विष्ठागन्धसमायुताः ॥ वे पापी उस नरकमें सुदीर्घकालतक खड़े रहते हैं। वहाँ सोने और बैठनेकी सुविधा नहीं है। विष्ठाकी दुर्गन्धमें सने हुए उन पापियोंको वहाँके कीड़े खाते रहते हैं॥ एवं प्रमाणमुद्विग्ना यावत् तिष्ठन्ति तत्र ते । यातनाभ्यो दशगुणं नरके दुःखमिष्यते ॥
ऐसे विशाल नरकमें वे जबतक रहते हैं, उद्विग्न भावसे खड़े रहते हैं। साधारण यातनाओंकी अपेक्षा नरकमें दसगुना दुःख होता है ।। तत्र चात्यन्तिकं दुःखमिष्यते च शुभेक्षणे । क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च वेदनास्तत्र भुञ्जते ।। शुभेक्षणे! वहाँ आत्यन्तिक दुःखकी प्राप्ति होती है। पापी जीव चीखते-चिल्लाते और रोते हुए वहाँकी यातनाएँ भोगते हैं ।। भ्रमन्ति दुःखमोक्षार्थं ज्ञाता कश्चिन्न विद्यते । दुःखस्यान्तरमात्रं तु ज्ञानं वा न च लभ्यते ।। वे दुःखोंसे छुटकारा पानेके लिये चारों ओर चक्कर काटते हैं; परंतु कोई भी उन्हें जाननेवाला वहाँ नहीं होता। उस दुःखमें तनिक भी अन्तर नहीं होता और न उसे छुड़ानेवाला ज्ञान ही उपलब्ध होता है ।। महारौरवसंज्ञं तु द्वितीयं नरकं प्रिये । तस्माद् द्विगुणितं विद्धि माने दुःखे च रौरवात् ।। प्रिये! दूसरे नरकका नाम है महारौरव। वह लंबाई, चौड़ाई और दुःखमें रौरवसे दूना बड़ा है ।। तृतीयं नरकं तत्र कण्टकावनसंज्ञितम् । ततो द्विगुणितं तच्च पूर्वाभ्यां दुःखमानयोः ।। महापातकसंयुक्ता घोरास्तस्मिन् विशन्ति हि ।। वहाँ तीसरा नरक है कण्टकावन, जो दुःख और लंबाई-चौड़ाईमें पहलेके दोनों नरकोंसे दुगुना बड़ा है। उसमें घोर महापातकयुक्त प्राणी प्रवेश करते हैं ।। अग्निकुण्डमिति ख्यातं चतुर्थं नरकं प्रिये । एतद् द्विगुणितं तस्माद् यथानिष्टसुखं तथा ।। ततो दुःखं हि सुमहदमानुषमिति स्मृतम् । भुञ्जते तत्र तत्रैव दुःखं दुष्कृतकारिणः ।। प्रिये! चौथा नरक अग्निकुण्डके नामसे विख्यात है। यह पहलेकी अपेक्षा दूना दुःख देनेवाला है। वहाँ महान् अमानुषिक दुःख भोगने पड़ते हैं। उन सभीमें पापाचारी प्राणी दुःख भोगते हैं ।। पञ्चकष्टमिति ख्यातं नरकं पञ्चमं प्रिये । तत्र दुःखमनिर्देश्यं महाघोरं यथातथम् ।। प्रिये! पाँचवें नरकका नाम पंचकष्ट है। वहाँ जो महाघोर दुःख प्राप्त होता है, उसका यथावत् वर्णन नहीं किया जा सकता ।। पञ्चेन्द्रियैरसह्यत्वात् पञ्चकष्टमिति स्मृतम् । भुञ्जते तत्र तत्रैवं दुःखं दुष्कृतकारिणः ।।
पाँचों इन्द्रियोंसे असह्य होनेके कारण उसका नाम 'पंचकष्ट' है। पापी पुरुष उन-उन नरकोंमें महान् दुःख भोगते हैं ।।
अमानुषार्हजं दुःखं महाभूतैश्च भुज्यते ।
अतिघोरं चिरं कृत्वा महाभूतानि यान्ति तम् ।।
वहाँ बड़े-बड़े जीव चिरकालतक अत्यन्त घोर अमानुषिक दुःख भोगते हैं और महान् भूतोंके समुदाय उस पापी पुरुषका अनुसरण करते हैं ।।
पञ्चकष्टेन हि समं नास्ति दुःखं तथा परम् ।
दुःखस्थानमिति प्राहुः पञ्चकष्टमिति प्रिये ।।
प्रिये! पंचकष्टके समान या उससे बढ़कर दुःख कोई नहीं है। पंचकष्टको समस्त दुःखोंका निवासस्थान बताया गया है ।।
एवं त्वेतेषु तिष्ठन्ति प्राणिनो दुःखभागिनः ।
अन्ये च नरकाः सन्त्यवीचिप्रमुखाः प्रिये ।।
इस प्रकार इन नरकोंमें दुःख भोगनेवाले प्राणी निवास करते हैं। प्रिये! इन नरकोंके सिवा और भी बहुत-से अवीचि आदि नरक हैं।
क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च वेदनार्ता भृशातुराः ।
केचिद् भ्रमन्तश्चेष्टन्ते केचिद् धावन्ति चातुराः ।।
वेदनासे पीड़ित हो अत्यन्त आतुर हुए नरकनिवासी जीव रोते-चिल्लाते रहते हैं। कोई चारों ओर चक्कर काटते हैं, कोई पृथ्वीपर पड़े-पड़े छटपटाते हैं और कोई आतुर होकर दौड़ते रहते हैं ।।
आधावन्तो निवार्यन्ते शूलहस्तैर्यतस्ततः ।
रुजार्दितास्तृषायुक्ताः प्राणिनः पापकारिणः ।।
कोई दौड़ते हुए प्राणी हाथमें त्रिशूल लिये हुए यमदूतोंद्वारा जहाँ-तहाँ रोके जाते हैं। वहाँ पापाचारी जीव रोगोंसे व्यथित और प्याससे पीड़ित रहते हैं ।।
यावत् पूर्वकृतं तावन्न मुच्यन्ते कथंचन ।
कृमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च वेदनार्तास्तृषान्विताः ।।
जबतक पूर्वकृत पापका भोग शेष है, तबतक किसी तरह उन्हें नरकोंसे छुटकारा नहीं मिलता है। उनको कीड़े काटते रहते हैं तथा वे वेदनासे पीड़ित और प्याससे व्याकुल होते हैं ।।
संस्मरन्तः स्वकं पापं कृतमात्मापराधजम् ।
शोचन्तस्तत्र तिष्ठन्ति यावत् पापक्षयं प्रिये ।।
एवं भुक्त्वा तु नरकं मुच्यन्ते पापसंक्षयात् ।।
प्रिये! जबतक सारे पापोंका क्षय नहीं हो जाता तबतक वे अपने ही किये हुए अपराधजनित पापको याद करके वहाँ शोकमग्न होते रहते हैं। इस प्रकार नरक भोगकर
पापोंका नाश करनेके पश्चात् वे उस कष्टसे मुक्त हो जाते हैं ।।
उमोवाच
भगवन् कति कालं ते तिष्ठन्ति नरकेषु वै ।
एतद् वेदितुमिच्छामि तन्मे ब्रूहि महेश्वर ।।
उमाने पूछा— भगवन्! महेश्वर! पापी जीव कितने समयतक नरकोंमें रहते हैं, यह मैं जानना चाहती हूँ? अतः मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
शतवर्षसहस्राणामादिं कृत्वा हि जन्तवः ।
तिष्ठन्ति नरकावासाः प्रलयान्तमिति स्थितिः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— प्राणी अपने पापोंके अनुसार एक लाख वर्षोंसे लेकर महाप्रलयकालतक नरकोंमें निवास करते हैं, ऐसा शास्त्रोंका निश्चय है ।।
उमोवाच
भगवंस्तेषु के तत्र तिष्ठन्तीति वद प्रभो ।।
उमाने पूछा— भगवन्! प्रभो! उन नरकोंमें किस-किस तरहके पापी निवास करते हैं? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
रौरवे शतसाहस्रं वर्षाणामिति संस्थितिः ।
मानुषघ्नाः कृतघ्नाश्च तथैवानृतवादिनः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— रौरव नरकमें एक लाख वर्षोंतक रहनेका नियम है। उसमें मनुष्योंकी हत्या करनेवाले, कृतघ्न तथा असत्यवादी मनुष्य जाते हैं ।।
द्वितीये द्विगुणं कालं पच्यन्ते तादृशा नराः ।
महापातकयुक्तास्तु तृतीये दुःखमाप्नुयुः ।।
दूसरे नरक (महारौरव)-में वैसे ही पापी मनुष्य दूने काल (दो लाख वर्ष) तक पकाये जाते हैं। तीसरे (कण्टकावन)-में महापातकी मनुष्य कष्ट भोगते हैं ।।
चतुर्थे परितप्यन्ते यावद् युगविपर्ययः ।।
चौथे नरकमें पापी लोग तबतक संतप्त होते हैं, जबतक कि महाप्रलय नहीं हो जाता ।।
सहन्तस्तादृशं घोरं पञ्चकष्टे तु यादृशम् ।
तत्रास्य चिरदुःखस्य ह्यधोऽन्यान् विद्धि मानुषान् ।।
पंचकष्ट नरकमें जैसा घोर दुःख होता है, उसको भी यहाँ सहन करते हैं। दीर्घकालतक दुःख देनेवाले इस घोर नरकसे नीचे मानवसम्बन्धी अन्य नरकोंकी स्थिति समझो ।।
एवं ते नरकान् भुक्त्वा तत्र क्षपितकल्मषाः ।
नरकेभ्यो विमुक्ताश्च जायन्ते कृमिजातियु ।।
इस प्रकार नरकोंका कष्ट भोग लेनेके बाद पाप कट जानेपर मनुष्य उन नरकोंसे छूटकर कीटयोनिमें जन्म लेते हैं ।।
उद्भिदजेषु वा केचिदत्रापि क्षीणकल्मषाः ।
पुनरेव प्रजायन्ते मृगपक्षिषु शोभने ।।
मृगपक्षिषु तद् भुक्त्वा लभन्ते मानुषं पदम् ।।
शोभने! अथवा कोई-कोई उद्भिज्ज योनिमें जन्म लेते हैं। उसमें भी कुछ पापोंका क्षय होनेके बाद वे पुनः पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म पाते हैं। वहाँ कर्मफल भोग लेनेपर उन्हें मनुष्यशरीरकी प्राप्ति होती है ।।
उमोवाच
नानाजातिषु केनैव जायन्ते पापकारिणः ।।
उमाने पूछा—प्रभो! पापाचारी मनुष्य किस प्रकारसे नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेते हैं? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि यत् त्वमिच्छसि शोभने ।
सर्वदाऽऽत्मा कर्मवशो नानाजातिषु जायते ।।
श्रीमहेश्वरने कहा—शोभने! तुम जो चाहती हो, उसे बता रहा हूँ। जीवात्मा सदा कर्मके अधीन होकर नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेता है ।।
यश्च मांसप्रियो नित्यं काकगृध्रान् स संस्पृशेत् ।
सुरापः सततं मर्त्यः सूकरत्वं व्रजेद् ध्रुवम् ।।
जो प्रतिदिन मांसके लिये लालायित रहता है, वह कौओं और गीधोंकी योनिमें जन्म लेता है। सदा शराब पीनेवाला मनुष्य निश्चय ही सूअर होता है ।।
अभक्ष्यभक्षणो मर्त्यः काकजातिषु जायते ।
आत्मघ्नो यो नरः कोपात् प्रेतजातिषु तिष्ठति ।।
अभक्ष्य भक्षण करनेवाला मनुष्य कौएके कुलमें उत्पन्न होता है तथा क्रोधपूर्वक आत्महत्या करनेवाला पुरुष प्रेतयोनिमें पड़ा रहता है ।।
पैशुन्यात् परिवादाच्च कुक्कुटत्वमवाप्नुयात् ।
नास्तिकश्चैव यो मूर्खो मृगजातिं स गच्छति ।।
दूसरोंकी चुगली और निन्दा करनेसे मुर्गेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। जो मूर्ख नास्तिक होता है, वह मृगजातिमें जन्म ग्रहण करता है ।।
हिंसाविहारस्तु नरः कृमिकीटेषु जायते ।
अतिमानयुतो नित्यं प्रेत्य गर्दभतां व्रजेत् ।।
हिंसा या शिकारके लिये भ्रमण करनेवाला मानव कीड़ोंकी योनिमें जन्म लेता है। अत्यन्त अभिमानयुक्त पुरुष सदा मृत्युके पश्चात् गदहेकी योनिमें जन्म पाता है ।।
अगम्यागमनाच्चैव परदारनिषेवणात् ।
मूषिकत्वं व्रजेन्मर्त्यो नास्ति तत्र विचारणा ।।
अगम्या-गमन और परस्त्रीसेवन करनेसे मनुष्य चूहा होता है, इसमें शंका करनेकी आवश्यकता नहीं है ।।
कृतघ्नो मित्रघाती च शृगालवृकजातिषु ।
कृतघ्नः पुत्रघाती च स्थावरेष्वथ तिष्ठति ।।
कृतघ्न और मित्रघाती मनुष्य सियार और भेड़ियोंकी योनिमें जन्म लेता है। दूसरोंके किये हुए उपकारको न माननेवाला और पुत्रघाती मनुष्य स्थावरयोनिमें जन्म लेता है ।।
एवमाद्यशुभं कृत्वा नरा निरयगामिनः ।
तां तां योनिं प्रपद्यन्ते स्वकृतस्यैव कारणात् ।।
इत्यादि प्रकारके अशुभ कर्म करके मनुष्य नरकगामी होते हैं और अपनी ही करनीके कारण पूर्वोक्त भिन्न-भिन्न योनिमें जन्म ग्रहण करते हैं ।।
एवं जातिषु निर्देश्याः प्राणिनः पापकारिणः ।
कथंचित् पुनरुत्पद्य लभन्ते मानुषं पदम् ।।
इसी तरह विभिन्न जातियोंमें जन्म लेनेवाले पापाचारी प्राणियोंका निर्देश करना चाहिये। ये किसी तरह उन योनियोंसे छूटकर जब पुनः जन्म लेते हैं, तब मनुष्यका पद पाते हैं ।।
बहुशश्चाग्निसंक्रान्तं लोहं शुचिमयं यथा ।
बहुदुःखाभिसंतप्तस्तथाऽऽत्मा शोध्यते बलात् ।।
तस्मात् सुदुर्लभं चेति विद्धि जन्मसु मानुषम् ।।
जैसे लोहेको बार-बार आगमें तपानेसे वह शुद्ध होता है, उसी प्रकार बहुत दुःखसे संतप्त हुआ जीवात्मा बलात् शुद्ध हो जाता है। अतः सभी जन्मोंमें मानव-जन्मको अत्यन्त दुर्लभ समझो ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)