महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1301, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवं ते नरकान् भुक्त्वा तत्र क्षपितकल्मषाः ।
नरकेभ्यो विमुक्ताश्च जायन्ते कृमिजातियु ।।
इस प्रकार नरकोंका कष्ट भोग लेनेके बाद पाप कट जानेपर मनुष्य उन नरकोंसे छूटकर कीटयोनिमें जन्म लेते हैं ।।
उद्भिदजेषु वा केचिदत्रापि क्षीणकल्मषाः ।
पुनरेव प्रजायन्ते मृगपक्षिषु शोभने ।।
मृगपक्षिषु तद् भुक्त्वा लभन्ते मानुषं पदम् ।।
शोभने! अथवा कोई-कोई उद्भिज्ज योनिमें जन्म लेते हैं। उसमें भी कुछ पापोंका क्षय होनेके बाद वे पुनः पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म पाते हैं। वहाँ कर्मफल भोग लेनेपर उन्हें मनुष्यशरीरकी प्राप्ति होती है ।।
उमोवाच
नानाजातिषु केनैव जायन्ते पापकारिणः ।।
उमाने पूछा—प्रभो! पापाचारी मनुष्य किस प्रकारसे नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेते हैं? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि यत् त्वमिच्छसि शोभने ।
सर्वदाऽऽत्मा कर्मवशो नानाजातिषु जायते ।।
श्रीमहेश्वरने कहा—शोभने! तुम जो चाहती हो, उसे बता रहा हूँ। जीवात्मा सदा कर्मके अधीन होकर नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेता है ।।
यश्च मांसप्रियो नित्यं काकगृध्रान् स संस्पृशेत् ।
सुरापः सततं मर्त्यः सूकरत्वं व्रजेद् ध्रुवम् ।।
जो प्रतिदिन मांसके लिये लालायित रहता है, वह कौओं और गीधोंकी योनिमें जन्म लेता है। सदा शराब पीनेवाला मनुष्य निश्चय ही सूअर होता है ।।
अभक्ष्यभक्षणो मर्त्यः काकजातिषु जायते ।
आत्मघ्नो यो नरः कोपात् प्रेतजातिषु तिष्ठति ।।
अभक्ष्य भक्षण करनेवाला मनुष्य कौएके कुलमें उत्पन्न होता है तथा क्रोधपूर्वक आत्महत्या करनेवाला पुरुष प्रेतयोनिमें पड़ा रहता है ।।
पैशुन्यात् परिवादाच्च कुक्कुटत्वमवाप्नुयात् ।
नास्तिकश्चैव यो मूर्खो मृगजातिं स गच्छति ।।
दूसरोंकी चुगली और निन्दा करनेसे मुर्गेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। जो मूर्ख नास्तिक होता है, वह मृगजातिमें जन्म ग्रहण करता है ।।
हिंसाविहारस्तु नरः कृमिकीटेषु जायते ।