महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1302, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअतिमानयुतो नित्यं प्रेत्य गर्दभतां व्रजेत् ।।
हिंसा या शिकारके लिये भ्रमण करनेवाला मानव कीड़ोंकी योनिमें जन्म लेता है। अत्यन्त अभिमानयुक्त पुरुष सदा मृत्युके पश्चात् गदहेकी योनिमें जन्म पाता है ।।
अगम्यागमनाच्चैव परदारनिषेवणात् ।
मूषिकत्वं व्रजेन्मर्त्यो नास्ति तत्र विचारणा ।।
अगम्या-गमन और परस्त्रीसेवन करनेसे मनुष्य चूहा होता है, इसमें शंका करनेकी आवश्यकता नहीं है ।।
कृतघ्नो मित्रघाती च शृगालवृकजातिषु ।
कृतघ्नः पुत्रघाती च स्थावरेष्वथ तिष्ठति ।।
कृतघ्न और मित्रघाती मनुष्य सियार और भेड़ियोंकी योनिमें जन्म लेता है। दूसरोंके किये हुए उपकारको न माननेवाला और पुत्रघाती मनुष्य स्थावरयोनिमें जन्म लेता है ।।
एवमाद्यशुभं कृत्वा नरा निरयगामिनः ।
तां तां योनिं प्रपद्यन्ते स्वकृतस्यैव कारणात् ।।
इत्यादि प्रकारके अशुभ कर्म करके मनुष्य नरकगामी होते हैं और अपनी ही करनीके कारण पूर्वोक्त भिन्न-भिन्न योनिमें जन्म ग्रहण करते हैं ।।
एवं जातिषु निर्देश्याः प्राणिनः पापकारिणः ।
कथंचित् पुनरुत्पद्य लभन्ते मानुषं पदम् ।।
इसी तरह विभिन्न जातियोंमें जन्म लेनेवाले पापाचारी प्राणियोंका निर्देश करना चाहिये। ये किसी तरह उन योनियोंसे छूटकर जब पुनः जन्म लेते हैं, तब मनुष्यका पद पाते हैं ।।
बहुशश्चाग्निसंक्रान्तं लोहं शुचिमयं यथा ।
बहुदुःखाभिसंतप्तस्तथाऽऽत्मा शोध्यते बलात् ।।
तस्मात् सुदुर्लभं चेति विद्धि जन्मसु मानुषम् ।।
जैसे लोहेको बार-बार आगमें तपानेसे वह शुद्ध होता है, उसी प्रकार बहुत दुःखसे संतप्त हुआ जीवात्मा बलात् शुद्ध हो जाता है। अतः सभी जन्मोंमें मानव-जन्मको अत्यन्त दुर्लभ समझो ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)