भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1303, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1303

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[शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं

मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ,

जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा,

सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका

माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध

प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]

उमोवाच

श्रोतुं भूयोऽहमिच्छामि प्रजानां हितकारणात् ।

शुभाशुभमिति प्रोक्तं कर्म स्वं स्वं समासतः ।।

उमाने पूछा— भगवन्! अब मैं पुनः प्रजावर्गके हितके लिये शुभ और अशुभ कहे

जानेवाले अपने-अपने कर्मका संक्षेपसे वर्णन सुनना चाहती हूँ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि तत् सर्वं शृणु शोभने ।

सुकृतं दुष्कृतं चेति द्विविधं कर्मविस्तरम् ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—शोभने! वह सब मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो। जहाँतक कर्मोंका

विस्तार है, उसे दो भागोंमें बाँटा जा सकता है। पहला भाग सुकृत (पुण्य) और दूसरा

दुष्कृत (पाप) ।।

तयोर्यद् दुष्कृतं कर्म तच्च संजायते त्रिधा ।

मनसा कर्मणा वाचा बुद्धिमोहसमुद्भवत् ।।

उन दोनोंमें जो दुष्कृत कर्म है, वह तीन प्रकारका होता है। एक मनसे, दूसरा क्रियासे

और तीसरा वाणीसे होनेवाला दुष्कर्म है। बुद्धिमें मोहका प्रादुर्भाव होनेसे ही ये पाप बनते

हैं ।।

मनःपूर्वं तु वा कर्म वर्तते वाङ्मयं ततः ।

जायते वै क्रियायोगमनु चेष्टाक्रमः प्रिये ।।

प्रिये! पहले मनके द्वारा कर्मका चिन्तन होता है, फिर वाणीद्वारा उसे प्रकाशमें लाया

जाता है। तदनन्तर क्रियाद्वारा उसे सम्पन्न किया जाता है। इसके साथ चेष्टाका क्रम चलता

रहता है ।।

अभिद्रोहोऽभ्यसूया च परार्थेषु च स्पृहा ।

धर्मकार्ये यदाश्रद्धा पापकर्माणि हर्षणम् ।।

एवमाद्यशुभं कर्म मनसा पापमुच्यते ।

अभिद्रोह, असूया, पराये अर्थकी अभिलाषा—ये मानसिक अशुभ कर्म हैं। जब धर्म-

कार्यमें अश्रद्धा हो, पाप-कर्ममें हर्ष और उत्साह बढ़े तो इस तरहके अशुभ कर्म मानसिक