महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1304, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाप कहलाते हैं ।। अनृतं यच्च परुषमबद्धं यच्च शंकरि । असत्यं परिवादश्च पापमेतत् तु वाङ्मयम् ।। कल्याण करनेवाली देवि! जो झूठ, कठोर तथा असम्बद्ध वचन बोला जाता है, असत्य भाषण तथा दूसरोंकी निन्दा की जाती है—यह सब वाणीसे होनेवाला पाप है ।। अगम्यागमनं चैव परदारनिषेवणम् । वधबन्धपरिक्लेशैः परप्राणोपतापनम् ।। चौर्यं परेषां द्रव्याणां हरणं नाशनं तथा । अभक्ष्यभक्षणं चैव व्यसनेष्वभिषङ्गता ।। दर्पात् स्तम्भाभिमानाच्च परेषामुपतापनम् । अकार्याणां च करणमशौचं पानसेवनम् ।। दौःशील्यं पापसम्पर्के साहाय्यं पापकर्मणि । अधर्म्यमयशस्यं च कार्यं तस्य निषेवणम् ।। एवमाद्यशुभं चान्यच्छारीरं पापमुच्यते ।। अगम्या स्त्रीके साथ समागम, परायी स्त्रीका सेवन, प्राणियोंका वध, बन्धन तथा नाना प्रकारके क्लेशोंद्वारा दूसरे प्राणियोंको सताना, पराये धनकी चोरी, अपहरण तथा नाश करना, अभक्ष्य पदार्थोंका भक्षण, दुर्व्यसनोंमें आसक्ति, दर्प, उद्दण्डता और अभिमानसे दूसरोंको सताना, न करनेयोग्य काम करना, अपवित्र वस्तुको पीना अथवा उसका सेवन करना, पापियोंके सम्पर्कमें रहकर दुराचारी होना, पापकर्ममें सहायता करना, अधर्म और अपयश बढ़ानेवाले कार्योंको अपनाना इत्यादि जो दूसरे-दूसरे अशुभ कर्म हैं, वे शारीरिक पाप कहलाते हैं ।। मानसाद् वाङ्मयं पापं विशिष्टमिति लक्ष्यते । वाङ्मयादपि वै पापाच्छारीरं गण्यते बहु ।। मानस पापसे वाणीका पाप बढ़कर समझा जाता है। वाचिक पापसे शारीरिक पापको अधिक गिना जाता है ।। एवं पापयुतं कर्म त्रिविधं पातयेन्नरम् । परोपतापजननमत्यन्तं पातकं स्मृतम् ।। इस प्रकार जो तीन तरहका पापकर्म है, वह मनुष्यको नीचे गिराता है। दूसरोंको संताप देना अत्यन्त पातक माना गया है ।। त्रिविधं तत् कृतं पापं कर्तारं पापकं नयेत् । पातकं चापि यत् कर्म कर्मणा बुद्धिपूर्वकम् ।। सापदेशमवश्यं तु कर्तव्यमिति तत् कृतम् । कथंचित् तत् कृतमपि कर्ता तेन न लिप्यते ।।