भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1305, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1305

अपना किया हुआ त्रिविध पाप कर्ताको पापमय योनिमें ले जाता है। पातकरूप कर्म भी यदि बुद्धि-पूर्वक किसीके प्राण बचाने आदिके उद्देश्यसे अवश्य-कर्तव्य मानकर क्रिया (शरीर) द्वारा किसी प्रकार किया गया हो तो उससे कर्ता लिप्त नहीं होता ।।

उमोवाच भगवन् पापकं कर्म यथा कृत्वा न लिप्यते ।। उमाने पूछा—भगवन्! किस तरह पापकर्म करके मनुष्य उससे लिप्त नहीं होता? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच यो नरोऽनपराधी च स्वात्मप्राणस्य रक्षणात् । शत्रुमुद्यतशस्त्रं वा पूर्वं तेन हतोऽपि वा ।। प्रतिहन्यान्नरो हिंस्यान्न स पापेन लिप्यते । श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो निरपराध मनुष्य शस्त्र उठाकर मारनेके लिये आये हुए शत्रुको पहले उसीके द्वारा आघात होनेपर अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये उसपर बदलेमें प्रहार करे और मार डाले, वह पापसे लिप्त नहीं होता ।।

चोरादधिकसंत्रस्तस्तत्प्रतीकारचेष्टया । यः प्रजघ्नन् नरो हन्यान्न स पापेन लिप्यते ।। जो चोरसे अधिक भयभीत हो उससे बदला लेनेकी चेष्टा करते हुए उसपर प्रहार करता और उसे मार डालता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता ।।

ग्रामार्थं भर्तृपिण्डार्थं दीनानुग्रहकारणात् । वधबन्धपरिक्लेशान् कुर्वन् पापात् प्रमुच्यते ।। जो ग्रामरक्षाके लिये, स्वामीके अन्नका बदला चुकानेके लिये अथवा दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करके किसी शत्रुका वध करता या उसे बन्धनमें डालकर क्लेश पहुँचाता है, वह भी पापसे मुक्त हो जाता है ।।

दुर्भिक्षे चात्मवृत्त्यर्थमेकायनगतस्तथा । अकार्यं वाप्यभक्ष्यं वा कृत्वा पापान्न लिप्यते ।। जो अकालमें अपनी जीविका चलानेके लिये तथा दूसरा कोई मार्ग न रह जानेपर अकार्य या अभक्ष्य भक्षण करता है, वह उसके पापसे लिप्त नहीं होता ।।

केचिद्धसन्ति तत् पीत्वा प्रवदन्ति तथा परे । नृत्यन्ति मुदिताः केचिद् गायन्ति च शुभाशुभान् ।। (अब मदिरा पीनेके दोष बताता हूँ) मदिरा पीने-वाले उसे पीकर नशेमें अट्टहास करते हैं, अंट-संट बातें बकते हैं, कितने ही प्रसन्न होकर नाचते हैं और भले-बुरे गीत गाते हैं ।।

कलिं ते कुर्वतेऽभीक्ष्णं प्रहरन्ति परस्परम् । क्वचिद् धावन्ति सहसा प्रस्खलन्ति पतन्ति च ।।