महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1306, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे आपसमें इच्छानुसार कलह करते और एक दूसरेको मारते-पीटते हैं। कभी सहसा दौड़ पड़ते हैं, कभी लड़खड़ाते और गिरते हैं ।।
अयुक्तं बहु भाषन्ते यत्र क्वचन शोभने ।
नग्ना विक्षिप्य गात्राणि नष्टज्ञाना इवासते ।।
शोभने! वे जहाँ कहीं भी अनुचित बातें बकने लगते हैं और कभी नंग-धड़ंग हो हाथ-पैर पटकते हुए अचेत-से हो जाते हैं ।।
एवं बहुविधान् भावान् कुर्वन्ति भ्रान्तचेतनाः ।
ये पिबन्ति महामोहं पानं पापयुता नराः ।।
इस प्रकार भ्रान्तचित्त होकर वे नाना प्रकारके भाव प्रकट करते हैं। जो महामोहमें डालनेवाली मदिरा पीते हैं, वे मनुष्य पापी होते हैं ।।
धृतिं लज्जां च बुद्धिं च पानं पीतं प्रणाशयेत् ।
तस्मान्नराः सम्भवन्ति निर्लज्जा निरपत्रपाः ।।
पी हुई मदिरा मनुष्यके धैर्य, लज्जा और बुद्धिको नष्ट कर देती है। इससे मनुष्य निर्लज्ज और बेहया हो जाते हैं ।।
पानपस्तु सुरां पीत्वा तदा बुद्धिप्रणाशनात् ।
कार्याकार्यस्य चाज्ञानाद् यथेष्टकरणात् स्वयम् ।।
विदुषामविधेयत्वात् पापमेवाधिपद्यते ।।
शराब पीनेवाला मनुष्य उसे पीकर बुद्धिका नाश हो जानेसे कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान न रह जानेसे, इच्छानुसार कार्य करनेसे तथा विद्वानोंकी आज्ञाके अधीन न रहनेसे पापको ही प्राप्त होता है ।।
परिभूतो भवेल्लोके मद्यपो मित्रभेदकः ।
सर्वकालमशुद्धश्च सर्वभक्षस्तथा भवेत् ।।
मदिरा पीनेवाला पुरुष जगत्में अपमानित होता है। मित्रोंमें फूट डालता है, सब कुछ खाता और हर समय अशुद्ध रहता है ।।
विनष्टो ज्ञानवृद्धेभ्यः सततं कलिभावगः ।
परुषं कटुकं घोरं वाक्यं वदति सर्वशः ।।
वह स्वयं हर प्रकारसे नष्ट होकर विद्वान् विवेकी पुरुषोंसे झगड़ा किया करता है। सर्वथा रूखा, कड़वा और भयंकर वचन बोलता रहता है ।।
गुरूनतिवदेन्मत्तः परदारान् प्रधर्षयेत् ।
संविदं कुरुते शौण्डैर्न शृणोति हितं क्वचित् ।।
वह मतवाला होकर गुरुजनोंसे बहकी-बहकी बातें करता है, परायी स्त्रियोंसे बलात्कार करता है, धूर्तों और जुआरियोंके साथ बैठकर सलाह करता है और कभी किसीकी कही हुई हितकर बात भी नहीं सुनता है ।।