महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1307, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवं बहुविधा दोषाः पानपे सन्ति शोभने ।
केवलं नरकं यान्ति नास्ति तत्र विचारणा ॥
शोभने! इस प्रकार मदिरा पीनेवालेमें बहुत-से दोष हैं। वे केवल नरकमें जाते हैं, इस विषयमें कोई विचार करनेकी बात नहीं है ॥
तस्मात् तद् वर्जितं सद्भिः पानमात्महितैषिभिः ।
यदि पानं न वर्जेरन् सन्तश्चारित्रकारणात् ॥
भवेदेतज्जगत् सर्वममर्यादं च निष्क्रियम् ॥
इसलिये अपना हित चाहनेवाले सत्पुरुषोंने मदिरा-पानका सर्वथा त्याग किया है। यदि सदाचारकी रक्षाके लिये सत्पुरुष मदिरा पीना न छोड़ें तो यह सारा जगत् मर्यादारहित और अकर्मण्य हो जाय (यह शरीर-सम्बन्धी महापाप है) ॥
तस्माद् बुद्धेर्हि रक्षार्थं सद्भिः पानं विवर्जितम् ।
अतः श्रेष्ठ पुरुषोंने बुद्धिकी रक्षाके लिये मद्यपानको त्याग दिया है ॥
विधानं सुकृतस्यापि भूयः शृणु शुचिस्मिते ।
प्रोच्यते तत् त्रिधा देवि सुकृतं च समासतः ॥
शुचिस्मिते! अब पुण्यका भी विधान सुनो। देवि! थोड़ेमें तीन प्रकारका पुण्य भी बताया गया है ॥
त्रैविध्यदोषोपरमे यस्तु दोषव्यपेक्षया ।
स हि प्राप्नोति सकलं सर्वदुष्कृतवर्जनात् ॥
मानसिक, वाचिक और कायिक तीनों दोषोंकी निवृत्ति हो जानेपर जो दोषकी उपेक्षा करके सम्पूर्ण दुष्कर्मोंका त्याग कर देता है, वही समस्त शुभ कर्मोंका फल पाता है ॥
प्रथमं वर्जयेद् दोषान् युगपत् पृथगेव वा ।
तथा धर्ममवाप्नोति दोषत्यागो हि दुष्करः ॥
पहले सब दोषोंको एक साथ या बारी-बारीसे त्याग देना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यको धर्माचरणका फल प्राप्त होता है; क्योंकि दोषोंका परित्याग करना बहुत ही कठिन है ॥
दोषसाकल्यसंत्यागान्मुनिर्भवति मानवः ।।
सौकर्यं पश्य धर्मस्य कार्यारम्भादृतेऽपि च ।
आत्मोपलब्धोपरमाल्लभन्ते सुकृतं परम् ।।
समस्त दोषोंका त्याग कर देनेसे मनुष्य मुनि हो जाता है। देखो, धर्म करनेमें कितनी सुविधा या सुगमता है कि कोई कार्य किये बिना ही अपनेको प्राप्त हुए दोषोंका त्याग कर देनेमात्रसे मनुष्य परम पुण्य प्राप्त कर लेते हैं ॥
अहो नृशंसाः पच्यन्ते मानुषाः स्वल्पबुद्धयः ।
ये तादृशं न बुध्यन्ते आत्माधीनं च निर्वृताः ॥