महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1308, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुष्कृतत्यागमात्रेण पदमूर्ध्वं हि लभ्यते ।। अहो! अल्पबुद्धि मानव कैसे क्रूर हैं कि पाप कर्म करके अपने-आपको नरककी आगमें पकाते हैं। वे संतोषपूर्वक यह नहीं समझ पाते कि वैसा पुण्यकर्म सर्वथा अपने अधीन है। दुष्कर्मोंका त्याग करनेमात्रसे ऊर्ध्वपद (स्वर्गलोक) की प्राप्ति होती है ।। पापभीरुत्वमात्रेण दोषाणां परिवर्जनात् । सुशोभनो भवेद् देवि ऋजुधर्मव्यपेक्षया ।। देवि! पापसे डरने, दोषोंको त्यागने और निष्कपट धर्मकी अपेक्षा रखनेसे मनुष्य उत्तम परिणामका भागी होता है ।। श्रुत्वा च बुद्धसंयोगादिन्द्रियाणां च निग्रहात् । संतोषाच्च धृतेश्चैव शक्यते दोषवर्जनम् ।। ज्ञानी पुरुषोंके सम्पर्कसे धर्मोपदेश सुनकर इन्द्रियोंका निग्रह करने तथा संतोष और धैर्य धारण करनेसे दोषोंका परित्याग किया जा सकता है ।। तदेव धर्ममित्याहुर्दोषसंयमनं प्रिये । यमधर्मेण धर्मोऽस्ति नान्यः शुभतरः प्रिये ।। प्रिये! दोष-संयमको धर्म कहा गया है। संयमरूप धर्मका पालन करनेसे जो धर्म होता है, वही सबसे अधिक कल्याणकारी है, दूसरा नहीं ।। यमधर्मेण यतयः प्राप्नुवन्त्युत्तमां गतिम् ।। ईश्वराणां प्रभवतां दरिद्राणां च वै नृणाम् । सफलो दोषसंत्यागो दानादपि शुभादपि ।। संयमधर्मके पालनसे यतिजन उत्तम गतिको पाते हैं। प्रभावशाली धनियोंके दान करनेसे और दरिद्र मनुष्योंके शुभकर्मोंके आचरणसे भी दोषोंका त्याग क्षणिक फल देनेवाला है ।। तपो दानं महादेवि दोषमल्पं हि निर्हरेत् । सुकृतं यामिकं चोक्तं वक्ष्ये निरुपसाधनम् ।। महादेवि! तप और दान अल्प दोषको हर लेते हैं। यहाँ संयमसम्बन्धी सुकृत बताया गया। अब सहायक साधनोंके बिना होनेवाले सुकृतका वर्णन करूँगा ।। सुखाभिसंधिर्लोकानां सत्यं शौचमथार्जवम् । व्रतोपवासः प्रीतिश्च ब्रह्मचर्यं दमः शमः ।। एवमादि शुभं कर्म सुकृतं नियमाश्रितम् । शृणु तेषां विशेषांश्च कीर्तयिष्यामि भामिनि ।। जगत्के लोगोंके सुखी होनेकी कामना, सत्य, शौच, सरलता, व्रतसम्बन्धी उपवास, प्रीति, ब्रह्मचर्य, दम और शम—इत्यादि शुभ कर्म नियमोंपर अवलम्बित सुकृत है। भामिनि! अब उनके विशेष भेदोंका वर्णन करूँगा, सुनो ।।