महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1309, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव ।
नास्ति सत्यात् परं दानं नास्ति सत्यात् परं तपः ॥
जैसे नौका या जहाज समुद्रसे पार होनेका साधन है, उसी प्रकार सत्य स्वर्गलोकमें पहुँचनेके लिये सीढ़ीका काम देता है। सत्यसे बढ़कर दान नहीं है और सत्यसे बढ़कर तप नहीं है ॥
यथा श्रुतं यथा दृष्टमात्मना यद् यथा कृतम् ।
तथा तस्याविकारेण वचनं सत्यलक्षणम् ॥
जो जैसा सुना गया हो, जैसा देखा गया हो और अपने द्वारा जैसा किया गया हो, उसको बिना किसी परिवर्तनके वाणीद्वारा प्रकट करना सत्यका लक्षण है ॥
यच्छलेनाभिसंयुक्तं सत्यरूपं मृषैव तत् ।
सत्यमेव प्रवक्तव्यं पारावर्यं विजानता ॥
जो सत्य छलसे युक्त हो, वह मिथ्या ही है। अतः सत्यासत्यके भले-बुरे परिणामको जाननेवाले पुरुषको चाहिये कि वह सदा सत्य ही बोले ॥
दीर्घायुश्च भवेत् सत्यात् कुलसंतानपालकः ।
लोकसंस्थितिपालश्च भवेत् सत्येन मानवः ॥
सत्यके पालनसे मनुष्य दीर्घायु होता है। सत्यसे कुल-परम्पराका पालक होता है और सत्यका आश्रय लेनेसे वह लोक-मर्यादाका संरक्षक होता है ॥
उमोवाच
कथं संधारयन् मर्त्यो व्रतं शुभमवाप्नुयात् ॥
**उमाने पूछा—**भगवन्! मनुष्य किस प्रकार व्रत धारण करके शुभ फलको पाता है? ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
पूर्वमुक्तं तु यत् पापं मनोवाक्कायकर्मभिः ।
व्रतवत् तस्य संत्यागस्तपोव्रतमिति स्मृतम् ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! पहले जो मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा होनेवाले पापोंका वर्णन किया गया है, व्रतकी भाँति उनके त्यागका नियम लेना तपोव्रत कहा गया है ॥
शुद्धकायो नरो भूत्वा स्नात्वा तीर्थे यथाविधि ।
पञ्चभूतानि चन्द्रार्कौ संध्ये धर्मयमौ पितॄन् ॥
आत्मनैव तथाऽऽत्मानं निवेद्य व्रतवच्चरेत् ।
मनुष्य तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके शुद्धशरीर हो स्वयं ही अपने आपको पंच महाभूत, चन्द्रमा, सूर्य, दोनों कालकी संध्या, धर्म, यम तथा पितरोंकी सेवामें निवेदन करके व्रत लेकर धर्माचरण करे ॥