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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1310, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1310

व्रतमाममरणाद् वापि कालच्छेदेन वा हरेत् ।।
शाकादिषु व्रतं कुर्यात् तथा पुष्पफलादिषु ।
ब्रह्मचर्यव्रतं कुर्यादुपवासव्रतं तथा ।।
अपने व्रतको मृत्युपर्यन्त निभावे अथवा समयकी सीमा बाँधकर उतने समयतक उसका निर्वाह करे। शाक आदि तथा फल-फूल आदिका आहार करके व्रत करे। उस समय ब्रह्मचर्यका पालन तथा उपवास भी करना चाहिये ।।

एवमन्येषु बहुषु व्रतं कार्यं हितैषिणा ।
व्रतभङ्गो यथा न स्याद् रक्षितव्यं तथा बुधैः ।।
अपना हित चाहनेवाले पुरुषको दुग्ध आदि अन्य बहुत-सी वस्तुओंमेंसे किसी एकका उपयोग करके व्रतका पालन करना चाहिये। विद्वानोंको उचित है कि वे अपने व्रतको भंग न होने दें। सब प्रकारसे उसकी रक्षा करें ।।

व्रतभङ्गे महत् पापमिति विद्धि शुभेक्षणे ।।
औषधार्थं यदज्ञानाद् गुरूणां वचनादपि ।
अनुग्रहार्थं बन्धूनां व्रतभङ्गो न दुष्यते ।।
शुभेक्षणे! तुम यह जान लो कि व्रत भंग करनेसे महान् पाप होता है, परंतु ओषधिके लिये, अनजानमें, गुरुजनोंकी आज्ञासे तथा बन्धुजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये यदि व्रतभंग हो जाय तो वह दूषित नहीं होता ।।

व्रतापवर्गकाले तु दैवब्राह्मणपूजनम् ।
नरेण तु यथावद्धि कार्यसिद्धिं यथाप्नुयात् ।।
व्रतकी समाप्तिके समय मनुष्यको देवताओं और ब्राह्मणोंकी यथावत् पूजा करनी चाहिये। इससे उसे अपने कार्यमें सफलता प्राप्त होती है ।।

उमोवाच
कथं शौचविधिस्तत्र तन्मे शंसितुमर्हसि ।
उमाने पूछा— भगवन्! व्रत ग्रहण करनेके समय शौचाचारका विधान कैसा है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।

श्रीमहेश्वर उवाच
बाह्यमाभ्यन्तरं चेति द्विविधं शौचमिष्यते ।
मानसं सुकृतं यत् तच्छौचमाभ्यन्तरं स्मृतम् ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! शौच दो प्रकारका माना गया है—एक बाह्य शौच, दूसरा आभ्यन्तर शौच। जिसे पहले मानसिक सुकृत बताया गया है, उसीको यहाँ आभ्यन्तर शौच कहा गया है ।।

सदाऽऽहारविशुद्धिश्च कायप्रक्षालनं तु यत् ।

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