महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1311, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाह्यशौचं भवेदेतत् तथैवाचमनादिना ।। सदा ही विशुद्ध आहार ग्रहण करना, शरीरको धो-पोंछकर साफ रखना तथा आचमन आदिके द्वारा भी शरीरको शुद्ध बनाये रखना, यह बाह्य शौच है ।। मृच्चैव शुद्धदेशस्था गोशकृन्मूत्रमेव च । द्रव्याणि गन्धयुक्तानि यानि पुष्टिकराणि च ।। एतैः सम्मार्जनैः कायम्भसा च पुनः पुनः । अच्छे स्थानकी मिट्टी, गोबर, गोमूत्र, सुगन्धित द्रव्य तथा पौष्टिक पदार्थ—इन सब वस्तुओंसे मिश्रित जलके द्वारा मार्जन करके शरीरको बारंबार जलसे प्रक्षालित करे ।। अक्षोभ्यं यत् प्रकीर्णं च नित्यस्रोतश्च यज्जलम् ।। प्रायशस्तादृशे मज्जेदन्यथा च विवर्जयेत् ।। जहाँका जल अक्षोभ्य (नहानेसे गँदला न होनेवाला) और फैला हुआ हो, जिसका प्रवाह कभी टूटता न हो। प्रायः ऐसे ही जलमें गोता लगाना चाहिये। अन्यथा उस जलको त्याग देना चाहिये ।। त्रिस्त्रिराचमनं श्रेष्ठं निर्मलैरुद्धृतैर्जलैः । तथा विण्मूत्रयोः शुद्धिर्द्भिर्बहुमृदा भवेत् ।। निर्मल जलको हाथमें लेकर उसके द्वारा तीन-तीन बार आचमन करना श्रेष्ठ माना गया है। मल और मूत्रके स्थानोंकी शुद्धि बहुत-सी मिट्टी लगाकर जलके द्वारा धोनेसे होती है ।। तथैव जलसंशुद्धिर्यत् संशुद्धं तु संस्पृशेत् ।। इसी प्रकार जलकी शुद्धिका भी ध्यान रखना आवश्यक है। जो शुद्ध जल हो उसीका स्पर्श करे—उसीसे हाथ-मुँह धोकर कुल्ला करे और नहाये ।। शकृता भूमिशुद्धिः स्याल्लोहानां भस्मना स्मृतम् । तक्षणं घर्षणं चैव दारूणां विशोधनम् ।। गोबरसे लीपनेपर भूमिकी शुद्धि होती है, राखसे मलनेपर धातुके पात्रोंकी शुद्धि होती है। लकड़ीके बने हुए पात्रोंकी शुद्धि छीलने, काटने और रगड़नेसे होती है ।। दहनं मृन्मयानां च मर्त्यानां कृच्छ्रधारणम् । शेषाणां देवि सर्वेषामातपेन जलेन च ।। ब्राह्मणानां च वाक्येन सदा संशोधनं भवेत् । मिट्टीके पात्रोंकी शुद्धि आगमें जलानेसे होती है, मनुष्योंकी शुद्धि कृच्छ्र सांतपन आदि व्रत धारण करनेसे होती है। देवि! शेष सब वस्तुओंकी शुद्धि सदा धूपमें तपाने, जलके द्वारा धोने और ब्राह्मणोंके वचनसे होती है ।। अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते । एवमापदि संशुद्धिरेवं शौचं विधीयते ।।