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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1312, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1312

जिसका दोष देखा न गया हो ऐसी वस्तुको जलसे धो दिया जाय तो वह शुद्ध हो जाता

है। जिसकी वाणीद्वारा प्रशंसा की जाती है, वह भी शुद्ध ही समझना चाहिये। इसी प्रकार

आपत्तिकालमें शुद्धिकी व्यवस्था है और इसी तरह शौचका विधान है ।।

उमोवाच

आहारशुद्धिस्तु कथं देवदेव महेश्वर ।।

उमाने पूछा—देवदेव! महेश्वर! आहारकी शुद्धि कैसे होती है? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

अमांसमद्यमक्लेद्यमपर्युषितमेव च ।

अतिकट्वम्ललवणहीनं च शुभगन्धि च ।।

कृमिकेशमलैर्हीनं संवृतं शुद्धदर्शनम् ।

एवंविधं सदाऽऽहार्यं देवब्राह्मणसत्कृतम् ।।

श्रेष्ठमित्येव तज्ज्ञेयमन्यथा मन्यतेऽशुभम् ।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जिसमें मांस और मद्य न हो, जो सड़ा हुआ या पसीजा न

हो, बासी न हो, अधिक कड़वा, अधिक खट्टा और अधिक नमकीन न हो, जिससे उत्तम

गन्ध आती हो, जिसमें कीड़े या केश न पड़े हों, जो निर्मल हो, ढका हुआ हो और देखनेमें

भी शुद्ध हो, जिसका देवताओं और ब्राह्मणोंद्वारा सत्कार किया गया हो, ऐसे अन्नको सदा

भोजन करना चाहिये। उसे श्रेष्ठ ही जानना चाहिये। इसके विपरीत जो अन्न है, उसे अशुभ

माना गया है ।।

ग्राम्यादारण्यकैः सिद्धं श्रेष्ठमित्यवधारय ।।

अतिमात्रगृहीतात् तु अल्पदत्तं भवेच्छुचि ।

ग्राम्य अन्नकी अपेक्षा वनमें उत्पन्न होनेवाले पदार्थोंसे बना हुआ अन्न श्रेष्ठ होता है। इस

बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। अधिक-से-अधिक ग्रहण किये हुए अन्नकी अपेक्षा

थोड़ा-सा दिया हुआ अन्न पवित्र होता है ।।

यज्ञशेषं हविःशेषं पितृशेषं च निर्मलम् ।।

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।

यज्ञशेष (देवताओंको अर्पण करनेसे बचा हुआ), हविःशेष (अग्निमें आहुति देनेसे बचा

हुआ) तथा पितृशेष (श्राद्धसे अवशिष्ट) अन्न निर्मल माना गया है। देवि! यह विषय तुम्हें

बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भक्षयन्त्यपरे मांसं वर्जयन्त्यपरे विभो ।

तन्मे वद महादेव भक्ष्याभक्ष्यविनिर्णयम् ।।