महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1313, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंउमाने पूछा— प्रभो! कुछ लोग तो मांस खाते हैं और दूसरे लोग उसका त्याग कर देते हैं। महादेव! ऐसी दशामें मुझे भक्ष्य-अभक्ष्यका निर्णय करके बताइये॥
श्रीमहेश्वर उवाच
मांसस्य भक्षणे दोषो यश्चास्याभक्षणे गुणः।
तदहं कीर्तयिष्यामि तन्निबोध यथातथम्॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मांस खानेमें जो दोष है और उसे न खानेमें जो गुण है, उसका मैं यथार्थ रूपसे वर्णन करता हूँ, उसे सुनो॥
इष्टं दत्तमधीतं च क्रतवश्च सदक्षिणाः।
अमांसभक्षणस्यैव कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
यज्ञ, दान, वेदाध्ययन तथा दक्षिणासहित अनेकानेक क्रतु—ये सब मिलकर मांस-भक्षणके परित्यागकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं होते॥
आत्मार्थं यः परप्राणान् हिंस्यात् स्वादुपलेप्सया।
व्याघ्रगृध्रशृगालैश्च राक्षसैश्च समस्तु सः॥
जो स्वादकी इच्छासे अपने लिये दूसरेके प्राणोंकी हिंसा करता है, वह बाघ, गीध, सियार और राक्षसोंके समान है॥
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति।
उद्विग्नवासं लभते यत्र यत्रोपजायते॥
जो पराये मांससे अपने मांसको बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ-कहीं भी जन्म लेता है वहीं उद्वेगमें पड़ा रहता है॥
संछेदनं स्वमांसस्य यथा संजनयेद् रुजम्।
तथैव परमांसेऽपि वेदितव्यं विजानता॥
जैसे अपने मांसको काटना अपने लिये पीड़ाजनक होता है, उसी तरह दूसरेका मांस काटनेपर उसे भी पीड़ा होती है। यह प्रत्येक विज्ञ पुरुषको समझना चाहिये॥
यस्तु सर्वाणि मांसानि यावज्जीवं न भक्षयेत्।
स स्वर्गे विपुलं स्थानं लभते नात्र संशयः॥
जो जीवनभर सब प्रकारके मांस त्याग देता है—कभी मांस नहीं खाता है, वह स्वर्गमें विशाल स्थान पाता है, इसमें संशय नहीं है॥
यत् तु वर्षशतं पूर्णं तप्यते परमं तपः।
यच्चापि वर्जयेन्मांसं सममेतन्न वा समम्॥
मनुष्य जो पूरे सौ वर्षोंतक उत्कृष्ट तपस्या करता है और जो वह सदाके लिये मांसका परित्याग कर देता है—उसके ये दोनों कर्म समान हैं अथवा समान नहीं भी हो सकते हैं [मांसका त्याग तपस्यासे भी उत्कृष्ट है]॥