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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

उमाने पूछा— प्रभो! कुछ लोग तो मांस खाते हैं और दूसरे लोग उसका त्याग कर देते हैं। महादेव! ऐसी दशामें मुझे भक्ष्य-अभक्ष्यका निर्णय करके बताइये॥

श्रीमहेश्वर उवाच

मांसस्य भक्षणे दोषो यश्चास्याभक्षणे गुणः।
तदहं कीर्तयिष्यामि तन्निबोध यथातथम्॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मांस खानेमें जो दोष है और उसे न खानेमें जो गुण है, उसका मैं यथार्थ रूपसे वर्णन करता हूँ, उसे सुनो॥

इष्टं दत्तमधीतं च क्रतवश्च सदक्षिणाः।
अमांसभक्षणस्यैव कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
यज्ञ, दान, वेदाध्ययन तथा दक्षिणासहित अनेकानेक क्रतु—ये सब मिलकर मांस-भक्षणके परित्यागकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं होते॥

आत्मार्थं यः परप्राणान् हिंस्यात् स्वादुपलेप्सया।
व्याघ्रगृध्रशृगालैश्च राक्षसैश्च समस्तु सः॥
जो स्वादकी इच्छासे अपने लिये दूसरेके प्राणोंकी हिंसा करता है, वह बाघ, गीध, सियार और राक्षसोंके समान है॥

स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति।
उद्विग्नवासं लभते यत्र यत्रोपजायते॥
जो पराये मांससे अपने मांसको बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ-कहीं भी जन्म लेता है वहीं उद्वेगमें पड़ा रहता है॥

संछेदनं स्वमांसस्य यथा संजनयेद् रुजम्।
तथैव परमांसेऽपि वेदितव्यं विजानता॥
जैसे अपने मांसको काटना अपने लिये पीड़ाजनक होता है, उसी तरह दूसरेका मांस काटनेपर उसे भी पीड़ा होती है। यह प्रत्येक विज्ञ पुरुषको समझना चाहिये॥

यस्तु सर्वाणि मांसानि यावज्जीवं न भक्षयेत्।
स स्वर्गे विपुलं स्थानं लभते नात्र संशयः॥
जो जीवनभर सब प्रकारके मांस त्याग देता है—कभी मांस नहीं खाता है, वह स्वर्गमें विशाल स्थान पाता है, इसमें संशय नहीं है॥

यत् तु वर्षशतं पूर्णं तप्यते परमं तपः।
यच्चापि वर्जयेन्मांसं सममेतन्न वा समम्॥
मनुष्य जो पूरे सौ वर्षोंतक उत्कृष्ट तपस्या करता है और जो वह सदाके लिये मांसका परित्याग कर देता है—उसके ये दोनों कर्म समान हैं अथवा समान नहीं भी हो सकते हैं [मांसका त्याग तपस्यासे भी उत्कृष्ट है]॥

न हि प्राणैः प्रियतमं लोके किंचन विद्यते । तस्मात् प्राणिदया कार्या यथाऽऽत्मनि तथा परे ॥ संसारमें प्राणोंके समान प्रियतम दूसरी कोई वस्तु नहीं है। अतः समस्त प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। जैसे अपने ऊपर दया अभीष्ट होती है, वैसे ही दूसरोंपर भी होनी चाहिये ॥ इत्येवं मुनयः प्राहुर्मांसस्याभक्षणे गुणान् । इस प्रकार मुनियोंने मांस न खानेमें गुण बताये हैं ॥

उमोवाच

गुरुपूजा कथं देव क्रियते धर्मचारिभिः ॥ उमाने पूछा—देव! धर्मचारी मनुष्य गुरुजनोंकी पूजा कैसे करते हैं? ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

गुरुपूजां प्रवक्ष्यामि यथावत् तव शोभने । कृतज्ञानां परो धर्म इति वेदानुशासनम् ॥ श्रीमहेश्वरने कहा—शोभने! अब मैं तुम्हें यथावत् रूपसे गुरुजनोंकी पूजाकी विधि बता रहा हूँ। वेदकी यह आज्ञा है कि कृतज्ञ पुरुषोंके लिये गुरुजनोंकी पूजा परम धर्म है ॥ तस्मात् स्वगुरवः पूज्यास्ते हि पूर्वोपकारिणः । गुरूणां च गरीयांसस्त्रयो लोकेषु पूजिताः ॥ उपाध्यायः पिता माता सम्पूज्यास्ते विशेषतः । अतः सबको अपने-अपने गुरुजनोंका पूजन करना चाहिये; क्योंकि वे गुरुजन संतान और शिष्यपर पहले उपकार करनेवाले हैं। गुरुजनोंमें उपाध्याय (अध्यापक) पिता और माता—ये तीन अधिक गौरवशाली हैं। इनकी तीनों लोकोंमें पूजा होती है; अतः इन सबका विशेषरूपसे आदर-सत्कार करना चाहिये ॥ ये पितुर्भातरो ज्येष्ठा ये च तस्यानुजास्तथा ॥ पितुः पिता च सर्वे ते पूजनीयाः पिता तथा ॥ जो पिताके बड़े तथा छोटे भाई हों, वे तथा पिताके भी पिता—ये सब-के-सब पिताके ही तुल्य पूजनीय हैं ॥ मातुर्या भगिनी ज्येष्ठा मातुर्या च यवीयसी । मातामही च धात्री च सर्वास्ता मातरः स्मृताः ॥ माताकी जो जेठी बहिन तथा छोटी बहिन हैं, वे और नानी एवं धाय—इन सबको माताके ही तुल्य माना गया है ॥ उपाध्यायस्य यः पुत्रो यश्च तस्य भवेद् गुरुः । ऋत्विग् गुरुः पिता चेति गुरवः सम्प्रकीर्तिताः ॥

उपाध्यायका जो पुत्र है वह गुरु है, उसका जो गुरु है वह भी अपना गुरु है, ऋत्विक् गुरु है और पिता भी गुरु है—ये सब-के-सब गुरु कहे गये हैं।। ज्येष्ठो भ्राता नरेन्द्रश्च मातुलः श्वशुरस्तथा । भयत्राता च भर्ता च गुरवस्ते प्रकीर्तिताः ।। बड़ा भाई, राजा, मामा, श्वशुर, भयसे रक्षा करनेवाला तथा भर्ता (स्वामी)—ये सब गुरु कहे गये हैं ।। इत्येष कथितः साध्वि गुरूणां सर्वसंग्रहः । अनुवृत्तिं च पूजां च तेषामपि निबोध मे ।। पतिव्रते! यह गुरु-कोटिमें जिनकी गणना है, उन सबका संग्रह करके यहाँ बताया गया है। अब उनकी अनुवृत्ति और पूजाकी भी बात सुनो ।। आराध्या मातापितरावुपाध्यायस्तथैव च । कथंचिन्नावमन्तव्या नरेण हितमिच्छता ।। अपना हित चाहनेवाले पुरुषको माता, पिता और उपाध्याय—इन तीनोंकी आराधना करनी चाहिये। किसी तरह भी इनका अपमान नहीं करना चाहिये ।। तेन प्रीणन्ति पितरस्तेन प्रीतः प्रजापतिः । येन प्रीणाति चेन्माता प्रीताः स्युर्देवमातरः ।। येन प्रीणात्युपाध्यायो ब्रह्मा तेनाभिपूजितः । अप्रीतेषु पुनस्तेषु नरो नरकमेति हि ।। इससे पितर प्रसन्न होते हैं। प्रजापतिको प्रसन्नता होती है। जिस आराधनाके द्वारा वह माताको प्रसन्न करता है, उससे देवमाताएँ प्रसन्न होती हैं। जिससे वह उपाध्यायको संतुष्ट करता है, उससे ब्रह्माजी पूजित होते हैं। यदि मनुष्य आराधना-द्वारा इन सबको संतुष्ट न करे तो वह नरकमें जाता है ।। गुरूणां वैरनिर्वन्धो न कर्तव्यः कथंचन । नरकं स्वगुरुप्रीत्या मनसापि न गच्छति ।। गुरुजनोंके साथ कभी वैर नहीं बाँधना चाहिये। अपने गुरुजनके प्रसन्न होनेपर मनुष्य कभी मनसे भी नरकमें नहीं पड़ता ।। न ब्रूयाद् विप्रियं तेषामनिष्ठं न प्रवर्तयेत् । विगृह्य न वदेत् तेषां समीपे स्पर्धया क्वचित् ।। उन्हें जो अप्रिय लगे, ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिये, जिससे उनका अनिष्ट हो, ऐसा काम भी नहीं करना चाहिये। उनसे झगड़कर नहीं बोलना चाहिये और उनके समीप कभी किसी बातके लिये होड़ नहीं लगानी चाहिये ।। यद् यदिच्छन्ति ते कर्तुमस्वतन्त्रस्तदाचरेत् । वेदानुशासनसमं गुरुशासनमिष्यते ।।

वे जो-जो काम कराना चाहें, उनकी आज्ञाके अधीन रहकर वह सब कुछ करना चाहिये। वेदोंकी आज्ञाके समान गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन अभीष्ट माना गया है ।। कलहांश्च विवादांश्च गुरुभिः सह वर्जयेत् । कैतवं परिहासांश्च मन्युकामाश्रयांस्तथा ॥ गुरुजनोंके साथ कलह और विवाद छोड़ दे, उनके साथ छल-कपट, परिहास तथा काम-क्रोधके आधारभूत बर्ताव भी न करे ।। गुरूणां योऽनहंवादी करोत्याज्ञामतन्द्रितः । न तस्मात् सर्वमर्त्येषु विद्यते पुण्यकृत्तमः ॥ जो आलस्य और अहंकार छोड़कर गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करता है, समस्त मनुष्योंमें उससे बढ़कर पुण्यात्मा दूसरा कोई नहीं है ।। असूयामपवादं च गुरूणां परिवर्जयेत् । तेषां प्रियहितान्वेषी भूत्वा परिचरेत् सदा ॥ गुरुजनोंके दोष देखना और उनकी निन्दा करना छोड़ दे, उनके प्रिय और हितका ध्यान रखते हुए सदा उनकी परिचर्या करे ।। न तद् यज्ञफलं कुर्यात् तपो वाऽऽचरितं महत् । यत् कुर्यात् पुरुषस्येह गुरुपूजा सदा कृता ॥ यज्ञोंका फल और किया हुआ महान् तप भी इस जगत्में मनुष्यको वैसा लाभ नहीं पहुँचा सकता, जैसा सदा किया हुआ गुरुपूजन पहुँचा सकता है ।। अनुवृत्तेर्विना धर्मो नास्ति सर्वाश्रमेष्वपि । तस्मात् क्षमावृतः क्षान्तो गुरुवृत्तिं समाचरेत् ॥ सभी आश्रमोंमें अनुवृत्ति (गुरुसेवा) के बिना कोई भी धर्म सफल नहीं हो सकता। इसलिये क्षमासे युक्त और सहनशील होकर गुरुसेवा करे ।। स्वमर्थं स्वशरीरं च गुर्वर्थे संत्यजेद् बुधः । विवादं धनहेतोर्वा मोहाद् वा तैर्न रोचयेत् ॥ विद्वान् पुरुष गुरुके लिये अपने धन और शरीरको समर्पण कर दे। धनके लिये अथवा मोहवश उनके साथ विवाद न करे ।। ब्रह्मचर्यमहिंसा च दानानि विविधानि च । गुरुभिः प्रतिषिद्धस्य सर्वमेतदपार्थकम् ॥ जो गुरुजनोंसे अभिशप्त है, उसके किये हुए ब्रह्मचर्य, अहिंसा और नाना प्रकारके दान—ये सब व्यर्थ हो जाते हैं ।। उपाध्यायं पितरं मातरं च येऽभिद्रुह्युर्मनसा कर्मणा वा । तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं

तेभ्यो नान्यः पापकृदस्ति लोके ॥
जो लोग उपाध्याय, पिता और माताके साथ मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा द्रोह करते हैं, उन्हें भ्रूणहत्यासे भी बड़ा पाप लगता है। उनसे बढ़कर पापाचारी इस संसारमें दूसरा कोई नहीं है॥

उमोवाच
उपवासविधिं तत्र तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
**उमाने कहा—**प्रभो! अब आप मुझे उपवासकी विधि बताइये॥

श्रीमहेश्वर उवाच
शरीरमलशान्त्यर्थमिन्द्रियोच्छोषणाय च ।
एकभुक्तोपवासैस्तु धारयन्ते व्रतं नराः ॥
लभन्ते विपुलं धर्मं तथाऽऽहारपरिक्षयात् ।
**श्रीमहेश्वर बोले—**प्रिये! शारीरिक दोषकी शान्तिके लिये और इन्द्रियोंको सुखाकर वशमें करनेके लिये मनुष्य एक समय भोजन अथवा दोनों समय उपवासपूर्वक व्रत धारण करते हैं और आहार क्षीण कर देनेके कारण महान् धर्मका फल पाते हैं॥

बहूनामुपरोधं तु न कुर्यादात्मकारणात् ॥
जीवोपघातं च तथा स जीवन् धन्य इष्यते ।
जो अपने लिये बहुतसे प्राणियोंको बन्धनमें नहीं डालता और न उनका वध ही करता है, वह जीवन भर धन्य माना जाता है॥

तस्मात् पुण्यं लभेन्मर्त्यः स्वयमाहारकर्षणात् ॥
तद् गृहस्थैर्यथाशक्ति कर्तव्यमिति निश्चयः ॥
अतः यह सिद्ध होता है कि स्वयं आहारको घटा देनेसे मनुष्य अवश्य पुण्यका भागी होता है। इसलिये गृहस्थोंको यथाशक्ति आहार-संयम करना चाहिये, यह शास्त्रोंका निश्चित आदेश है॥

उपवासार्दिते काये आपदर्थं पयो जलम् ।
भुञ्जन्नप्रतिघाती स्याद् ब्राह्मणाननुमान्य च ॥
उपवाससे जब शरीरको अधिक पीड़ा होने लगे, तब उस आपत्तिकालमें ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर यदि मनुष्य दूध अथवा जल ग्रहण कर ले तो इससे उसका व्रत भंग नहीं होता॥

उमोवाच
ब्रह्मचर्यं कथं देव रक्षितव्यं विजानता ॥
**उमाने पूछा—**देव! विज्ञ पुरुषको ब्रह्मचर्यकी रक्षा कैसे करनी चाहिये? ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता ।।
ब्रह्मचर्यं परं शौचं ब्रह्मचर्यं परं तपः ।
केवलं ब्रह्मचर्येण प्राप्यते परमं पदम् ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! यह विषय मैं तुम्हें बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम शौचाचार है, ब्रह्मचर्य उत्कृष्ट तपस्या है तथा केवल ब्रह्मचर्यसे भी परमपदकी प्राप्ति होती है ।।

संकल्पाद् दर्शनाच्चैव तद्युक्तवचनादपि ।
संस्पर्शादथ संयोगात् पञ्चधा रक्षितं व्रतम् ।।
संकल्पसे, दृष्टिसे, न्यायोचित वचनसे, स्पर्शसे और संयोगसे—इन पाँच प्रकारोंसे व्रतकी रक्षा होती है ।।

व्रतवद्धारितं चैव ब्रह्मचर्यमकल्मषम् ।
नित्यं संरक्षितं तस्य नैष्ठिकानां विधीयते ।।
व्रतपूर्वक धारण किया हुआ निष्कलंक ब्रह्मचर्य सदा सुरक्षित रहे, ऐसा नैष्ठिक ब्रह्मचारियोंके लिये विधान है ।।

तदिष्यते गृहस्थानां कालमुद्दिश्य कारणम् ।।
जन्मनक्षत्रयोगेषु पुण्यवासेषु पर्वसु ।
देवताधर्मकार्येषु ब्रह्मचर्यव्रतं चरेत् ।।
वही ब्रह्मचर्य गृहस्थोंके लिये भी अभीष्ट है, इसमें काल ही कारण है। जन्म-नक्षत्रका योग आनेपर पवित्र स्थानोंमें पर्वोंके दिन तथा देवतासम्बन्धी धर्म-कृत्योंमें गृहस्थोंको ब्रह्मचर्य व्रतका पालन अवश्य करना चाहिये ।।

ब्रह्मचर्यव्रतफलं लभेद दारव्रती सदा ।
शौचमायुस्तथाऽऽरोग्यं लभ्यते ब्रह्मचारिभिः ।।
जो सदा एकपत्नीव्रती रहता है, वह ब्रह्मचर्य व्रतके पालनका फल पाता है। ब्रह्मचारियोंको पवित्रता, आयु तथा आरोग्यकी प्राप्ति होती है ।।

उमोवाच

तीर्थचर्याव्रतं देव क्रियते धर्मकांक्षिभिः ।
कानि तीर्थानि लोकेषु तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
**उमाने पूछा—**देव! बहुत-से धर्माभिलाषी पुरुष तीर्थयात्राका व्रत धारण करते हैं; अतः लोकोंमें कौन-कौनसे तीर्थ हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि तीर्थस्नानविधिं प्रिये ।

पावनार्थं च शौचार्थं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ।। **श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें तीर्थस्नानकी विधि बताता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने दूसरोंको पवित्र करने तथा स्वयं भी पवित्र होनेके लिये इस विधिका निर्माण किया था ।। यास्तु लोके महानद्यस्ताः सर्वास्तीर्थसंज्ञिकाः । तासां प्राक्स्रोतसः श्रेष्ठाः सङ्गमश्च परस्परम् ।। लोकमें जो बड़ी-बड़ी नदियाँ हैं, उन सबका नाम तीर्थ है। उनमें भी जिनका प्रवाह पूरबकी ओर है, वे श्रेष्ठ हैं और जहाँ दो नदियाँ परस्पर मिलती हैं, वह स्थान भी उत्तम तीर्थ कहा गया है ।। तासां सागरसंयोगो वरिष्ठश्चेति विद्यते ।। तासामुभयतः कूलं तत्र तत्र मनीषिभिः । देवैर्वा सेवितं देवि तत् तीर्थं परमं स्मृतम् ।। और उन नदियोंका जहाँ समुद्रके साथ संयोग हुआ है, वह स्थान सबसे श्रेष्ठ तीर्थ बताया गया है। देवि! उन नदियोंके दोनों तटोंपर मनीषी पुरुषोंने जिस स्थानका सेवन किया है, वह उत्कृष्ट तीर्थ माना गया है ।। समुद्रश्च महातीर्थं पावनं परमं शुभम् । तस्य कूलगतास्तीर्था महद्भिश्च समाप्लुताः ।। समुद्र भी परम पावन एवं शुभ महातीर्थ है। उसके तटपर जो तीर्थ हैं, उनमें महात्मा पुरुषोंने गोता लगाया है ।। स्रोतसां पर्वतानां च जोषितानां महर्षिभिः । अपि कूलं तटाकं वा सेवितं मुनिभिः प्रिये ।। प्रिये! महर्षियोंद्वारा सेवित जो जलस्रोत और पर्वत हैं, उनके तटों और तड़ागोंपर भी बहुतसे मुनि निवास करते हैं ।। तत् तु तीर्थमिति ज्ञेयं प्रभावात् तु तपस्विनाम् ।। तदाप्रभृति तीर्थत्वं लभेल्लोकहिताय वै । एवं तीर्थं भवेद् देवि तस्य स्नानविधिं शृणु ।। उन तपस्वी मुनियोंके प्रभावसे उस स्थानको तीर्थ समझना चाहिये। ऋषियोंके निवासकालसे ही वह स्थान जगत्के हितके लिये तीर्थत्व प्राप्त कर लेता है। देवि! इस प्रकार स्थानविशेष तीर्थ बन जाता है। अब उसकी स्नानविधि सुनो ।। जन्मना व्रतभूयिष्ठो गत्वा तीर्थानि कांक्षया । उपवासत्रयं कुर्यादेकं वा नियमान्वितः ।। जो जन्मकालसे ही बहुत-से व्रत करता आया हो, वह पुरुष तीर्थोंके सेवनकी इच्छासे यदि वहाँ जाय तो नियमसे रहकर तीन या एक उपवास करे ।।

पुण्यमासयुते काले पौर्णमास्यां यथाविधि । बहिरेव शुचिर्भूत्वा तत् तीर्थं मन्मना विशेत् ॥ पवित्र माससे युक्त समयमें पूर्णिमाको विधिपूर्वक बाहर ही पवित्र हो मुझमें मन लगाकर उस तीर्थके भीतर प्रवेश करे ॥ त्रिराप्लुत्स जलाभ्याशे दत्त्वा ब्राह्मणदक्षिणाम् । अभ्यर्च्य देवायतनं ततः प्रायाद् यथागतम् ॥ उसमें तीन बार गोता लगाकर जलके निकट ही ब्राह्मणको दक्षिणा दे, फिर देवालयमें देवताकी पूजा करके जहाँ इच्छा हो, वहाँ जाय ॥ एतद् विधानं सर्वेषां तीर्थं तीर्थमिति प्रिये । समीपतीर्थस्नानात् तु दूरतीर्थं सुपूजितम् ॥ प्रिये! प्रत्येक तीर्थमें सबके लिये स्नानका यही विधान है। निकटवर्ती तीर्थमें स्नान करनेकी अपेक्षा दूरवर्ती तीर्थमें स्नान आदि करना अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है ॥ आदिप्रभृति शुद्धस्य तीर्थस्नानं शुभं भवेत् । तपोऽर्थं पापनाशार्थं शौचार्थं तीर्थगाहनम् ॥ जो पहलेसे ही शुद्ध हो, उसके लिये तीर्थस्थान शुभकारक माना जाता है। तपस्या, पापनाश और बाहर-भीतरकी पवित्रताके लिये तीर्थोंमें स्नान किया जाता है ॥ एवं पुण्येषु तीर्थेषु तीर्थस्नानं शुभं भवेत् । एतन्नैयमिकं सर्वं सुकृतं कथितं तव ॥ इस प्रकार पुण्यतीर्थोंमें स्नान करना कल्याणकारी होता है। यह सब नियमपूर्वक सम्पादित होनेवाले पुण्यका तुम्हारे सामने वर्णन किया गया है ॥

उमोवाच

लोकसिद्धं तु यद् द्रव्यं सर्वसाधारणं भवेत् । तद् ददत् सर्वसामान्यं कथं धर्मं लभेन्नरः ॥ उमाने पूछा—भगवन्! जो द्रव्य लोकमें सबको प्राप्त है, जो सर्वसाधारणकी वस्तु है, उस सर्वसामान्य वस्तुका दान करनेवाला मनुष्य कैसे धर्मका भागी होता है? ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

लोके भूतमयं द्रव्यं सर्वसाधारणं तथा । तथैव तद् ददन्मर्त्यो लभेत् पुण्यं स तच्छृणु ॥ श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! लोकमें जो भौतिक द्रव्य हैं, वे सबके लिये साधारण हैं; उन वस्तुओंका दान करनेवाला मनुष्य किस तरह पुण्यका भागी होता है, यह बताता हूँ, सुनो ॥ दाता प्रतिग्रहीता च देयं सोपक्रमं तथा । देशकालौ च यत् त्वेतद् दानं षड्गुणमुच्यते ॥

दान देनेवाला, उसे ग्रहण करनेवाला, देय वस्तु, उपक्रम (उसे देनेका प्रयत्न), देश और काल—इन छः वस्तुओंके गुणोंसे युक्त दान उत्तम बताया जाता है ॥ तेषां सम्पद्विशेषांश्च कीर्त्यमानान् निबोध मे । आदिप्रभृति यः शुद्धो मनोवाक्कायकर्मभिः । सत्यवादी जितक्रोधस्त्वलुब्धो नाभ्यसूयकः ॥ श्रद्धावानास्तिकश्चैव एवं दाता प्रशस्यते ॥ अब मैं इन छहोंके विशेष गुणोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। जो आदिकालसे ही मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा शुद्ध हो, सत्यवादी, क्रोधविजयी, लोभहीन, अदोषदर्शी, श्रद्धालु और आस्तिक हो, ऐसा दाता उत्तम बताया गया है ॥ शुद्धो दान्तो जितक्रोधस्तथादीनकुलोद्भवः । श्रुतचारित्रसम्पन्नस्तथा बहुकलत्रवान् ॥ पञ्चयज्ञपरो नित्यं निर्विकारशरीरवान् । एतान् पात्रगुणान् विद्धि तादृक् पात्रं प्रशस्यते ॥ जो शुद्ध, जितेन्द्रिय, क्रोधको जीतनेवाला, उदार एवं उच्च कुलमें उत्पन्न, शास्त्रज्ञान एवं सदाचारसे सम्पन्न, बहुतसे स्त्री-पुत्रोंसे संयुक्त, पंचयज्ञपरायण तथा सदा नीरोग शरीरसे युक्त हो, वही दान लेनेका उत्तम पात्र है। उपर्युक्त गुणोंको ही दानपात्रके उत्तम गुण समझो। ऐसे पात्रकी ही प्रशंसा की जाती है ॥ पितृदेवाग्निकार्येषु तस्य दत्तं महत् फलम् । यद् यदर्हति यो लोके पात्रं तस्य भवेच्च सः ॥ देवता, पितर और अग्निहोत्रसम्बन्धी कार्योंमें उसको दिये हुए दानका महान् फल होता है। लोकमें जो जिस वस्तुके योग्य हो, वही उस वस्तुको पानेका पात्र होता है ॥ मुच्येदापदमापन्नो येन पात्रं तदस्य तु । अन्नस्य क्षुधितं पात्रं तृषितं तु जलस्य वै ॥ एवं पात्रेषु नानात्वमिष्यते पुरुषं प्रति । जिस वस्तुके पानेसे आपत्तिमें पड़ा हुआ मनुष्य आपत्तिसे छूट जाय, उस वस्तुका वही पात्र है। भूखा मनुष्य अन्नका और प्यासा जलका पात्र है। इस प्रकार प्रत्येक पुरुषके लिये दानके भिन्न-भिन्न पात्र होते हैं ॥ जारश्चोरश्च षण्ढश्च हिंस्रः समयभेदकः । लोकविघ्नकराश्चान्ये वर्जिताः सर्वशः प्रिये ॥ प्रिये! चोर, व्यभिचारी, नपुंसक, हिंसक, मर्यादा-भेदक और लोगोंके कार्यमें विघ्न डालनेवाले अन्यान्य पुरुष सब प्रकारसे दानमें वर्जित हैं अर्थात् उन्हें दान नहीं देना चाहिये ॥ परोपघाताद् यद् द्रव्यं चौर्याद् वा लभ्यते नृभिः ।

निर्दयाल्लभ्यते यच्च धूर्तभावेन वै तथा ।।
अधर्मादर्थमोहाद् वा बहूनामुपरोधनात् ।
लभ्यते यद् धनं देवि तदत्यन्तविगर्हितम् ।।
देवि! दूसरोंका वध या चोरी करनेसे मनुष्योंको जो धन मिलता है, निर्दयता तथा धूर्तता करनेसे जो प्राप्त होता है, अधर्मसे, धनविषयक मोहसे तथा बहुत-से प्राणियोंकी जीविकाका अवरोध करनेसे जो धन प्राप्त होता है, वह अत्यन्त निन्दित है ।।
तादृशेन कृतं धर्मं निष्फलं विद्धि भामिनि ।
तस्मान्न्यायागतेनैव दातव्यं शुभमिच्छता ।।
भामिनि! ऐसे धनसे किये हुए धर्मको निष्फल समझो। अतः शुभकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको न्यायतः प्राप्त हुए धनके द्वारा ही दान करना चाहिये ।।
यद् यदात्मप्रियं नित्यं तत् तद् देयमिति स्थितिः ।
उपक्रममिमं विद्धि दातॄणां परमं हितम् ।।
जो-जो अपनेको प्रिय लगे, उसी-उसी वस्तुका सदा दान करना चाहिये; यही मर्यादा है। इस प्रयत्न या चेष्टाको ही उपक्रम समझो। यह दाताओंके लिये परम हितकारक है ।।
पात्रभूतं तु दूरस्थमभिगम्य प्रसाद्य च ।
दाता दानं तथा दद्याद् यथा तुष्येत तेन सः ।।
दानका सुयोग्य पात्र ब्राह्मण यदि दूरका निवासी हो तो उसके पास जाकर उसे प्रसन्न करके दाता इस प्रकार दान दे, जिससे वह संतुष्ट हो जाय ।।
एष दानविधिः श्रेष्ठः समाहूय तु मध्यमः ।।
पूर्वं च पात्रतां ज्ञात्वा समाहूय निवेद्य च ।
शौचाचमनसंयुक्तं दातव्यं श्रद्धया प्रिये ।।
यह दानकी श्रेष्ठ विधि है। दानपात्रको जो अपने घर बुलाकर दान दिया जाता है, वह मध्यम श्रेणीका दान है। प्रिये! पहले पात्रताका ज्ञान प्राप्त करके फिर उस सुपात्र ब्राह्मणको घर बुलावे। उसके सामने अपना दानविषयक विचार प्रस्तुत करे। पश्चात् स्वयं ही स्नान आदिसे पवित्र हो आचमन करके श्रद्धापूर्वक अभीष्ट वस्तुका दान करे ।।
याचितॄणां तु परममाभिमुख्यं पुरस्कृतम् ।
सम्मानपूर्वं संग्राह्यं दातव्यं देशकालयोः ।।
अपात्रेभ्योऽपि चान्येभ्यो दातव्यं भूतिमिच्छता ।।
याचकोंको सामने पाकर उन्हें सम्मानपूर्वक अपनाना और देश-कालके अनुसार दान देना चाहिये। ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे दूसरे अपात्र पुरुषोंको भी आवश्यकता होनेपर अन्न-वस्त्र आदिका दान करें ।।
पात्राणि सम्परीक्ष्यैव दात्रा वै दानमात्रया ।
अतिशक्त्या परं दानं यथाशक्त्या तु मध्यमम् ।।

तृतीयं चापरं दानं नानुरूपमिवात्मनः ॥
पात्रोंकी परीक्षा करके दाता यदि दानकी मात्रा अपनी शक्तिसे भी अधिक करे तो वह उत्तम दान है। यथाशक्ति किया हुआ दान मध्यम है और तीसरा अधम श्रेणीका दान है, जो अपनी शक्तिके अनुरूप न हो ॥
यथा सम्भावितं पूर्वं दातव्यं तत् तथैव च ।
पुण्यक्षेत्रेषु यद् दत्तं पुण्यकालेषु वा तथा ॥
तच्छोभनतरं विद्धि गौरवाद् देशकालयोः ।

पहले जैसा बताया गया है, उसी प्रकार दान देना चाहिये। पुण्य क्षेत्रोंमें तथा पुण्यके अवसरोंपर जो कुछ दिया जाता है, उसे देश और कालके गौरवसे अत्यन्त शुभकारक समझो ॥

उमोवाच
यश्च पुण्यतमो देशस्तथा कालश्च शंस मे ॥
**उमाने पूछा—**प्रभो! पवित्रतम देश और काल क्या है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच
कुरुक्षेत्रं महानद्यो यच्च देवर्षिसेवितम् ।
गिरिवरंश्च तीर्थानि देशभागेषु पूजितः ॥
ग्रहीतुमीप्सते यत्र तत्र दत्तं महाफलम् ॥

**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! कुरुक्षेत्र, गङ्गा आदि बड़ी-बड़ी नदियाँ, देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा सेवित स्थान एवं श्रेष्ठ पर्वत—ये सब-के-सब तीर्थ हैं। जहाँ देशके सभी भागोंमें पूजित श्रेष्ठ पुरुष दान ग्रहण करना चाहता हो, वहाँ दिये हुए दानका महान् फल होता है ॥
शरद्वसन्तकालश्च पुण्यमासस्तथैव च ।
शुक्लपक्षश्च पक्षाणां पौर्णमासी च पर्वसु ॥
पितृदैवतनक्षत्रनिर्मलो दिवसस्तथा ।
तच्छोभनतरं विद्धि चन्द्रसूर्यग्रहे तथा ॥

शरद् और वसन्तका समय, पवित्र मास, पक्षोंमें शुक्लपक्ष, पर्वोंमें पौर्णमासी, मघानक्षत्रयुक्त निर्मल दिवस, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण—इन सबको अत्यन्त शुभकारक काल समझो ॥
दाता देयं च पात्रं च उपक्रमयुता क्रिया ।
देशकालं तथेत्येषां सम्पच्छुद्धिः प्रकीर्तिता ॥

दाता हो, देनेकी वस्तु हो, दान लेनेवाला पात्र हो, उपक्रमयुक्त क्रिया हो और उत्तम देश-काल हो—इन सबका सम्पन्न होना शुद्धि कही गयी है ॥

यदैव युगपत् सम्पत् तत्र दानं महत् भवेत् ।।
अत्यल्पमपि यद् दानमेभिः षड्भिर्गुणैर्युतम् ।
भूत्वानन्तं नयेत् स्वर्गं दातारं दोषवर्जितम् ।।
जब कभी एक समय इन सबका संयोग जुट जाय तभी दान देना महान् फलदायक होता है। इन छः गुणोंसे युक्त जो दान है, वह अत्यन्त अल्प होनेपर भी अनन्त होकर निर्दोष दाताको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है ।।

उमोवाच
एवंगुणयुतं दानं दत्तं चाफलतां व्रजेत् ।
**उमाने पूछा—**प्रभो! इन गुणोंसे युक्त दान दिया गया हो तो क्या वह भी निष्फल हो सकता है? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच
तदप्यस्ति महाभागे नराणां भावदोषतः ।।
कृत्वा धर्मं तु विधिवत् पश्चात्तापं करोति चेत् ।
श्लाघया वा यदि ब्रूयाद् वृथा संसदि यत् कृतम् ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! मनुष्योंके भाव-दोषसे ऐसा भी होता है। यदि कोई विधिपूर्वक धर्मका सम्पादन करके फिर उसके लिये पश्चात्ताप करने लगता है अथवा भरी सभामें उसकी प्रशंसा करते हुए बड़ी-बड़ी बातें बनाने लगता है, उसका वह धर्म व्यर्थ हो जाता है ।।
एते दोषा विवर्ज्याश्च दातृभिः पुण्यकांक्षिभिः ।।
सनातनमिदं वृत्तं सद्भिराचरितं तथा ।
पुण्यकी अभिलाषा रखनेवाले दाताओंको चाहिये कि वे इन दोषोंको त्याग दें। यह दानसम्बन्धी आचार सनातन है। सत्पुरुषोंने सदा इसका आचरण किया है ।।
अनुग्रहात् परेषां तु गृहस्थानामृणं हि तत् ।।
इत्येवं मन आविश्य दातव्यं सततं बुधैः ।।
दूसरोंपर अनुग्रह करनेके लिये दान किया जाता है। गृहस्थोंपर तो दूसरे प्राणियोंका ऋण होता है, जो दान करनेसे उतरता है, ऐसा मनमें समझकर विद्वान् पुरुष सदा दान करता रहे ।।
एवमेव कृतं नित्यं सुकृतं तद् भवेन्महत् ।
सर्वसाधारणं द्रव्यमेवं दत्त्वा महत् फलम् ।।
इस तरह दिया हुआ सुकृत सदा महान् होता है। सर्वसाधारण द्रव्यका भी इसी तरह दान करनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है ।।

उमोवाच

भगवन् कानि देयानि धर्ममुद्दिश्य मानवैः । तान्यहं श्रोतुमिच्छामि तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने पूछा—**भगवन्! मनुष्योंको धर्मके उद्देश्यसे किन-किन वस्तुओंका दान करना चाहिये? यह मैं सुनना चाहती हूँ। आप मुझे बतानेकी कृपा करें॥

श्रीमहेश्वर उवाच

अजस्रं धर्मकार्यं च तथा नैमित्तिकं प्रिये । अन्नं प्रतिश्रयो दीपः पानीयं तृणमिन्धनम् ॥ स्नेहो गन्धश्च भेषज्यं तिलाश्च लवणं तथा । एवमादि तथान्यच्च दानमाजस्रमुच्यते ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! निरन्तर धर्मकार्य तथा नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। अन्न, निवासस्थान, दीप, जल, तृण, ईंधन, तेल, गन्ध, ओषधि, तिल और नमक—ये तथा और भी बहुत-सी वस्तुएँ निरन्तर दान करनेकी वस्तुएँ बतायी गयी हैं॥

अन्नं प्राणो मनुष्याणामन्नदः प्राणदो भवेत् । तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छति मानवः ॥ अन्न मनुष्योंका प्राण है। जो अन्न दान करता है, वह प्राणदान करनेवाला होता है। अतः मनुष्य विशेषरूपसे अन्नका दान करना चाहता है॥

ब्राह्मणायाभिरूपाय यो दद्यादन्नमीप्सितम् । निदधाति निधिंश्रेष्ठं सोऽनन्तं पारलौकिकम् ॥ अनुरूप ब्राह्मणको जो अभीष्ट अन्न प्रदान करता है, वह परलोकमें अपने लिये अनन्त एवं उत्तम निधिकी स्थापना करता है॥

श्रान्तमध्वपरिश्रान्तमतिथिं गृहमागतम् । अर्चयीत प्रयत्नेन स हि यज्ञो वरप्रदः ॥ रास्तेका थका-माँदा अतिथि यदि घरपर आ जाय तो यत्नपूर्वक उसका आदर-सत्कार करे; क्योंकि वह अतिथि-सत्कार मनोवांछित फल देनेवाला यज्ञ है॥

पितरस्तस्य नन्दन्ति सुवृष्ट्या कर्षका इव । पुत्रो यस्य तु पौत्रो वा श्रोत्रियं भोजयिष्यति ॥ जिसका पुत्र अथवा पौत्र किसी श्रोत्रिय ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसके पितर उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं, जैसे अच्छी वर्षा होनेसे किसान॥

अपि चाण्डालशूद्राणामन्नदानं न गर्ह्यते । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन दद्यादन्नममत्सरः ॥ चाण्डाल और शूद्रोंको भी दिया हुआ अन्नदान निन्दित नहीं होता। अतः ईर्ष्या छोड़कर सब प्रकारके प्रयत्नद्वारा अन्नदान करना चाहिये॥

अन्नदानाच्च लोकांस्तान् सम्प्रवक्ष्याम्यनिन्दिते। भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम् ।। अनिन्दिते! अन्नदानसे जो लोक प्राप्त होते हैं उनका वर्णन करता हूँ। उन महामना दानी पुरुषोंको मिले हुए भवन देवलोकमें प्रकाशित होते हैं।। अनेकशतभौमानि सान्तर्जलवनानि च। वैडूर्यार्चिःप्रकाशानि हेमरूप्यनिभानि च ।। नानारूपाणि संस्थानां नानारत्नमयानि च। चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किंकिणीजालवन्ति च ।। तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च। यथेष्टभक्ष्यभोज्यानि शयनासनवन्ति च ।। सर्वकामफलाश्चात्र वृक्षा भवनसंस्थिताः । वाप्यो बह्व्यश्च कूपाश्च दीर्घिकाश्च सहस्रशः ।। उन भव्य भवनोंमें सैकड़ों तल्ले हैं। उनके भीतर जल और वन हैं। वे वैदूर्यमणिके तेजसे प्रकाशित होते हैं। उनमें सोने और चाँदी-जैसी चमक है। उन गृहोंके अनेक रूप हैं। नाना प्रकारके रत्नोंसे उनका निर्माण हुआ है। वे चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल और क्षुद्र घण्टिकाओंकी झालरोंसे सुशोभित हैं। किन्हीं-किन्हींकी कान्ति प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होती है। उन महात्माओंके वे भवन स्थावर भी हैं और जंगम भी हैं। उनमें इच्छानुसार भक्ष्य-भोज्य पदार्थ उपलब्ध होते हैं। उत्तम शय्या और आसन बिछे रहते हैं। वहाँ सम्पूर्ण मनोवांछित फल देनेवाले कल्पवृक्ष प्रत्येक घरमें विराजमान हैं। वहाँ बहुत-सी बावड़ियाँ, कुएँ और सहस्रों जलाशय हैं।। अरुजानि विशोकानि नित्यानि विविधानि च । भवनानि विचित्राणि प्राणदानां त्रिविष्टपे ।। प्राणस्वरूप अन्न-दान करनेवाले लोगोंको स्वर्गमें जो भाँति-भाँतिके विचित्र भवन प्राप्त होते हैं, वे रोग-शोकसे रहित और नित्य (चिरस्थायी) हैं।। विवस्वतश्च सोमस्य ब्रह्मणश्च प्रजापतेः । विशन्ति लोकांस्ते नित्यं जगत्यन्नोदकप्रदाः ।। जगत्में सदा अन्न और जलका दान करनेवाले मनुष्य सूर्य, चन्द्रमा तथा प्रजापति ब्रह्माजीके लोकोंमें जाते हैं ।। तत्र ते सुचिरं कालं विहृत्याप्सरसां गणैः । जायन्ते मानुषे लोके सर्वकल्याणसंयुताः ।। वे वहाँ चिरकालतक अप्सराओंके साथ विहार करके पुनः मनुष्यलोकमें जन्म लेते और समस्त कल्याणकारी गुणोंसे संयुक्त होते हैं ।। बलसंहननोपेता नीरोगाश्चिरजीविनः ।

कुलीना मतिमन्तश्च भवन्त्यन्नप्रदा नराः ।। वे सबल शरीरसे सम्पन्न, नीरोग, चिरजीवी, कुलीन, बुद्धिमान् तथा अन्नदाता होते हैं ।। तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता । सर्वकालं च सर्वस्य सर्वत्र च सदैव च ।। अतः अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा, सर्वत्र, सबके लिये, सब समय विशेषरूपसे अन्नदान करना चाहिये ।। सुवर्णदानं परमं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् । तस्मात् ते वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ।। अपि पापकृतं क्रूरं दत्तं रुक्मं प्रकाशयेत् ।। सुवर्णदान परम उत्तम, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला और महान् कल्याणकारी है। इसलिये तुमसे क्रमशः उसीका यथावत्रूपसे वर्णन करूँगा। दिया हुआ सुवर्णका दान क्रूर और पापाचारीको भी प्रकाशित कर देता है ।। सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियेभ्यः सुचेतसः । देवतास्ते तर्पयन्ति समस्ता इति वैदिकम् ।। जो शुद्ध हृदयवाले मनुष्य श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान करते हैं, वे समस्त देवताओंको तृप्त कर देते हैं। यह वेदका मत है ।। अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं चाग्निरुच्यते । तस्मात् सुवर्णदानेन तृप्ताः स्युः सर्वदेवताः ।। अग्नि सम्पूर्ण देवताओंके स्वरूप हैं और सुवर्णको भी अग्निरूप ही बताया जाता है। इसलिये सुवर्णके दानसे समस्त देवता तृप्त होते हैं ।। अग्न्यभावे तु कुर्वन्ति वह्निस्थानेषु काञ्चनम् । तस्मात् सुवर्णदातारः सर्वान् कामानवाप्नुयुः ।। अग्निके अभावमें उसकी जगह सुवर्णको स्थापित करते हैं। अतः सुवर्णका दान करनेवाले पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं ।। आदित्यस्य हुताशस्य लोकान् नानाविधान् शुभान् । काञ्चनं सम्प्रदायाशु प्रविशन्ति न संशयः ।। सुवर्णका दान करके मनुष्य शीघ्र ही सूर्य एवं अग्निके नाना प्रकारके मङ्गलकारी लोकोंमें प्रवेश करते हैं, इसमें संशय नहीं है ।। अलंकारं कृतं चापि केवलात् प्रविशिष्यते । सौवर्णैर्ब्राह्मणं काले तैरलंकृत्य भोजयेत् ।। य एतत् परमं दानं दत्त्वा सौवर्णमद्भुतम् । द्युतिं मेधां वपुः कीर्तिं पुनर्जाते लभेद ध्रुवम् ।।

केवल सुवर्णकी अपेक्षा उसका आभूषण बनवाकर दान देना श्रेष्ठ माना गया है। अतः दानकालमें ब्राह्मणको सोनेके आभूषणोंसे विभूषित करके भोजन करावे। जो यह अद्भुत एवं उत्कृष्ट सुवर्ण-दान करता है, वह पुनर्जन्म लेनेपर निश्चय ही सुन्दर शरीर, कान्ति, बुद्धि और कीर्ति पाता है ।।

तस्मात् स्वशक्त्या दातव्यं काञ्चनं भुवि मानवैः ।
न ह्येतस्मात् परं लोकेष्वन्यत् पापात् प्रमुच्यते ।।
अतः मनुष्योंको अपनी शक्तिके अनुसार पृथ्वीपर सुवर्णदान अवश्य करना चाहिये। संसारमें इससे बढ़कर कोई दान नहीं है। सुवर्णदान करके मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है ।।

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि गवां दानमनिन्दिते ।
न हि गोभ्यः परं दानं विद्यते जगति प्रिये ।।
अनिन्दिते! इसके बाद मैं गोदानका वर्णन करूँगा। प्रिये! इस संसारमें गौओंके दानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है ।।

लोकान् सिसृक्षुणा पूर्वं गावः सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
वृत्त्यर्थं सर्वभूतानां तस्मात् ता मातरः स्मृताः ।।
पूर्वकालमें लोकसृष्टिकी इच्छावाले स्वयम्भू ब्रह्माजीने समस्त प्राणियोंकी जीवन-वृत्तिके लिये गौओंकी सृष्टि की थी। इसलिये वे सबकी माताएँ मानी गयी हैं ।।

लोकज्येष्ठा लोकवृत्त्यां प्रवृत्ता
मय्यायत्ताः सोमनिष्यन्दभूताः ।
सौम्याः पुण्याः कामदाः प्राणदाश्च
तस्मात् पूज्याः पुण्यकामैर्मनुष्यैः ।।
गौएँ सम्पूर्ण जगत्में ज्येष्ठ हैं। वे लोगोंको जीविका देनेके कार्यमें प्रवृत्त हुई हैं। मेरे अधीन हैं और चन्द्रमाके अमृतमय द्रवसे प्रकट हुई हैं। वे सौम्य, पुण्यमयी, कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली तथा प्राणदायिनी हैं। इसलिये पुण्याभिलाषी मनुष्योंके लिये पूजनीय हैं ।।

धेनुं दत्त्वा निभृतां सुशीलां
कल्याणवत्सां च पयस्विनीं च ।
यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या-
स्तावत्समाः स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ।।
जो हृष्ट-पुष्ट, अच्छे स्वभाववाली, उत्तम बछड़ेसे युक्त एवं दूध देनेवाली गायका दान करता है, वह उस गायके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक स्वर्गीय फल भोगता है ।।

प्रयच्छते यः कपिलां सचैलां
सकांस्यदोहां कनकाग्रशृङ्गीम् ।
पुत्रांश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्व-

मासप्तमं तारयते परत्र ॥ जो काँसके दुग्धपात्र और सोनेसे मढ़े हुए सींगोंवाली कपिला गौका वस्त्रसहित दान करता है, वह अपने पुत्रों, पौत्रों तथा सातवीं पीढ़ीतकके समस्त कुलका परलोकमें उद्धार कर देता है ॥ अन्तर्जाताः क्रीतका द्यूतलब्धाः प्राणक्रीताः सोदकाश्चौजसा वा । कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणार्थंगताश्च द्वारैरेतैस्ताः प्रलब्धाः प्रदद्यात् ॥ जो अपने ही यहाँ पैदा हुई हों, खरीदकर लायी गयी हों, जुएमें जीत ली गयी हों, बदलेमें दूसरा कोई प्राणी देकर खरीदी गयी हों, जल हाथमें लेकर संकल्पपूर्वक दी गयी हों, अथवा युद्धमें बलपूर्वक जीती गयी हों, संकटसे छुड़ाकर लायी गयी हों, या पालन-पोषणके लिये आयी हों—इन द्वारोंसे प्राप्त हुई गौओंका दान करना चाहिये ॥ कृशाय बहुपुत्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये । प्रदाय नीरुजां धेनुं लोकान् प्राप्नोत्यनुत्तमान् ॥ जीविकाके बिना दुर्बल, अनेक पुत्रवाले, अग्निहोत्री, श्रोत्रिय ब्राह्मणको दूध देनेवाली नीरोग गायका दान करके दाता सर्वोत्तम लोकोंको प्राप्त होता है ॥ नृशंसस्य कृतघ्नस्य लुब्धस्यानृतवादिनः । हव्यकव्यव्यपेतस्य न दद्याद् गाः कथंचन ॥ जो क्रूर, कृतघ्न, लोभी, असत्यवादी और हव्य-कव्यसे दूर रहनेवाला हो, ऐसे मनुष्यको किसी तरह गौएँ नहीं देनी चाहिये ॥ समानवत्सां यो दद्याद् धेनुं विप्रे पयस्विनीम् । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां सोमलोके महीयते ॥ जो मनुष्य समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी एवं दूध देनेवाली गायको वस्त्र ओढ़ाकर ब्राह्मणको दान करता है, वह सोमलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ समानवत्सां यो दद्यात् कृष्णां धेनुं पयस्विनीम् । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां लोकान् प्राप्नोत्यपाम्पतेः ॥ जो समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी एवं दूध देनेवाली काली गौको वस्त्र ओढ़ाकर उसका ब्राह्मणको दान करता है, वह जलके स्वामी वरुणके लोकोंमें जाता है ॥ हिरण्यवर्णां पिङ्गाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंछन्नां यान्ति कौबेर सद्मनः ॥ जिसके शरीरका रंग सुनहरा, आँखें भूरी, साथमें बछड़ा और काँसकी दुहानी हो, उस गौको वस्त्र ओढ़ाकर दान करनेसे मनुष्य कुबेरके धाममें जाते हैं ॥ वायुरेणुसवर्णां च सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।

प्रदाय वस्त्रसंछन्नां वायुलोके महीयते ॥
वायुसे उड़ी हुई धूलिके समान रंगवाली, बछड़े-सहित, दूध देनेवाली गायको कपड़ा ओढ़ाकर काँसके दुहानीके साथ दान देकर दाता वायुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
समानवत्सां यो धेनुं दत्त्वा गौरीं पयस्विनीम् ।
सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नामग्निलोके महीयते ॥
जो समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी, धौरी एवं दूध देनेवाली धेनुको वस्त्रसे आच्छादित करके उसका दान करता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
युवानं बलिनं श्यामं शतेन सह यूथपम् ।
गवेन्द्रं ब्राह्मणेन्द्राय भूरिशृङ्गमलंकृतम् ॥
ऋषभं ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियाणां महात्मनाम् ।
ऐश्वर्यमभिजायन्ते जायमानाः पुनः पुनः ॥
जो लोग महामनस्वी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको नौजवान, बड़े सींगवाले, बलवान्, श्यामवर्ण, एक सौ गौओंसहित यूथपति गवेन्द्र (साँड़) को पूर्णतः अलंकृत करके उसे श्रेष्ठ ब्राह्मणके हाथमें दे देते हैं, वे बारंबार जन्म लेनेपर ऐश्वर्यके साथ ही जन्म लेते हैं ॥
गवां मूत्रपुरीषाणि नोद्विजेत कदाचन ।
न चासां मांसमश्रीयाद् गोषु भक्तः सदा भवेत् ॥
गौओंके मल-मूत्रसे कभी उद्विग्न नहीं होना चाहिये और उनका मांस कभी नहीं खाना चाहिये। सदा गौओंका भक्त होना चाहिये ॥
ग्रासमुष्टिं परगवे दद्याद् संवत्सरं शुचिः ।
अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम् ॥
जो पवित्र भावसे रहकर एक वर्षतक दूसरेकी गायको एक मुट्ठी ग्रास खिलाता है और स्वयं आहार नहीं करता, उसका वह व्रत सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला होता है ॥
गवामुभयतः काले नित्यं स्वस्त्ययनं वदेत् ।
न चासां चिन्तयेत् पापमिति धर्मविदो विदुः ॥
गौओंके पास प्रतिदिन दोनों समय उनके कल्याणकी बात कहनी चाहिये। कभी उनका अनिष्ट-चिन्तन नहीं करना चाहिये। ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका मत है ॥
गावः पवित्रं परमं गोषु लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
कथंचिन्नापमन्तव्या गावो लोकस्य मातरः ॥
गौएँ परम पवित्र वस्तु हैं, गौओंमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। अतः किसी तरह गौओंका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सम्पूर्ण जगत्‌की माताएँ हैं ॥
तस्मादेव गवां दानं विशिष्टमिति कथ्यते ।
गोषु पूजा च भक्तिश्च नरस्यायुष्यतां वहेत् ॥

इसीलिये गौओंका दान सबसे उत्कृष्ट बताया जाता है। गौओंकी पूजा तथा उनके प्रति की हुई भक्ति मनुष्यकी आयु बढ़ानेवाली होती है ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमिदानं महाफलम् । भूमिदानसमं दानं लोके नास्तीति निश्चयः ॥ इसके बाद मैं भूमिदानका महत्त्व बतलाऊँगा। भूमिदानका महान् फल है। संसारमें भूमिदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है। यही धर्मात्मा पुरुषोंका निश्चय है ॥ गृहयुक् क्षेत्रयुग् वापि भूमिभागः प्रदीयते । सुखभोगं निराक्रोशं वास्तुपूर्वं प्रकल्प्य च ॥ ग्रहीतारमलंकृत्य वस्त्रपुष्पानुलेपनैः । सभृत्यं सपरिवारं भोजयित्वा यथेष्टतः ॥ यो दद्याद् दक्षिणां काले त्रिरद्भिर्गृह्यतामिति ॥ गृह अथवा क्षेत्रसे युक्त भू-भागका दान करना चाहिये। जहाँ सुख भोगनेकी सुविधा हो, जो अनिन्दनीय स्थान हो, वहाँ वास्तुपूजनपूर्वक गृह बनाकर दान लेनेवालेको वस्त्र, पुष्पमाला तथा चन्दनसे अलंकृत करके सेवक और परिवारसहित उसे यथेष्ट भोजन करावे। तत्पश्चात् यथासमय तीन बार हाथमें जल लेकर ‘दान ग्रहण कीजिये’ ऐसा कहकर उसे उस भूमिको दान एवं दक्षिणा दे ॥ एवं भूम्यां प्रदत्तायां श्रद्धया वीतमत्सरैः । यावत् तिष्ठति सा भूमिस्तावत् तस्य फलं विदुः । इस प्रकार ईर्ष्यारहित पुरुषोंद्वारा श्रद्धापूर्वक भूदान दिये जानेपर जबतक वह भूमि रहती है, तबतक दाता उसके दानजनित फलका उपभोग करते हैं ॥ भूमिदः स्वर्गमारुह्य रमते शाश्वतीः समाः । अचला ह्यक्षया भूमिः सर्वकामान् दुधुक्षति ॥ भूमिदान देनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें जाकर सदा ही सुख भोगता है; क्योंकि यह अचल एवं अक्षय भूमि सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करती है ॥ यत् किंचित् कुरुते पापं पुरुषो वृत्तिकर्शितः । अपि गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन मुच्यते ॥ जीविकाके लिये कष्ट पानेवाला पुरुष जो कोई भी पाप करता है, गायके कान बराबर भूमिको दान करनेसे भी मुक्त हो जाता है ॥ सुवर्णं रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च । सर्वमेतन्महाभागे भूमिदाने प्रतिष्ठितम् ॥ महाभागे! भूमिदानमें सुवर्ण, रजत, वस्त्र, मणि, मोती तथा रत्न—इन सबका दान प्रतिष्ठित है ॥ भर्तुर्निःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः ।

ब्रह्मलोकाय संसिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ।। स्वामीके कल्याण-साधनमें तत्पर हो युद्धमें मारे जाकर अपने शरीरका परित्याग करनेवाले शूरवीर योद्धा उत्तम सिद्धि पाकर ब्रह्मलोककी यात्रा करते हैं; परंतु वे भी भूमिदान करनेवालेको लाँघ नहीं पाते हैं ।। हलकृष्टां महीं दद्याद् यत्सबीजफलान्विताम् । सुकूपशरणां वापि सा भवेत् सर्वकामदा ।। जहाँ सुन्दर कूँआँ और रहनेके लिये घर बना हो, जो हलसे जोती गयी हो और जिसमें बीजसहित फल लगे हों, ऐसी भूमिका दान करना चाहिये। वह सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली होती है ।। निष्पन्नसस्यां पृथिवीं यो ददाति द्विजन्मनाम् । विमुक्तः कलुषैः सर्वैः शक्रलोकं स गच्छति ।। जो उपजी हुई खेतीसे युक्त भूमिका ब्राह्मणोंके लिये दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो इन्द्रलोकमें जाता है ।। यथा जनित्री क्षीरेण स्वपुत्रमभिवर्धयेत् । एवं सर्वफलैर्भूमिर्दातारमभिवर्धयेत् ।। जैसे माता दूध पिलाकर अपने पुत्रका पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार भूमि सम्पूर्ण मनोवांछित फल देकर दाताको अभ्युदयशील बनाती है ।। ब्राह्मणं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् । ग्राहयित्वा निजां भूमिं न यान्ति यमसादनम् ।। जो लोग उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, अग्निहोत्री एवं सदाचारी ब्राह्मणको अपनी भूमि देते हैं, वे यमलोकमें कभी नहीं जाते हैं ।। यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि दृश्यते । तथा भूमेः कृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ।। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी प्रतिदिन वृद्धि होती देखी जाती है, उसी प्रकार किये हुए भूमिदानका महत्त्व प्रत्येक नयी फसल पैदा होनेपर बढ़ता जाता है ।। यथा बीजानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले । तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदानगुणार्जिताः ।। जैसे पृथ्वीपर बिखेरे हुए बीज अंकुरित हो जाते हैं, उसी प्रकार भूमिदानके गुणोंसे प्राप्त हुए सम्पूर्ण मनोवांछित भोग अंकुरित होते और बढ़ते हैं ।। पितरः पितृलोकस्था देवताश्च दिवि स्थिताः । संतर्पयन्ति भोगैस्तं यो ददाति वसुंधराम् ।। जो भूमिका दान करता है, उसे पितृलोकनिवासी पितर और स्वर्गवासी देवता अभीष्ट भोगोंद्वारा तृप्त करते हैं ।।