महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1326, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्नदानाच्च लोकांस्तान् सम्प्रवक्ष्याम्यनिन्दिते। भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम् ।। अनिन्दिते! अन्नदानसे जो लोक प्राप्त होते हैं उनका वर्णन करता हूँ। उन महामना दानी पुरुषोंको मिले हुए भवन देवलोकमें प्रकाशित होते हैं।। अनेकशतभौमानि सान्तर्जलवनानि च। वैडूर्यार्चिःप्रकाशानि हेमरूप्यनिभानि च ।। नानारूपाणि संस्थानां नानारत्नमयानि च। चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किंकिणीजालवन्ति च ।। तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च। यथेष्टभक्ष्यभोज्यानि शयनासनवन्ति च ।। सर्वकामफलाश्चात्र वृक्षा भवनसंस्थिताः । वाप्यो बह्व्यश्च कूपाश्च दीर्घिकाश्च सहस्रशः ।। उन भव्य भवनोंमें सैकड़ों तल्ले हैं। उनके भीतर जल और वन हैं। वे वैदूर्यमणिके तेजसे प्रकाशित होते हैं। उनमें सोने और चाँदी-जैसी चमक है। उन गृहोंके अनेक रूप हैं। नाना प्रकारके रत्नोंसे उनका निर्माण हुआ है। वे चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल और क्षुद्र घण्टिकाओंकी झालरोंसे सुशोभित हैं। किन्हीं-किन्हींकी कान्ति प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होती है। उन महात्माओंके वे भवन स्थावर भी हैं और जंगम भी हैं। उनमें इच्छानुसार भक्ष्य-भोज्य पदार्थ उपलब्ध होते हैं। उत्तम शय्या और आसन बिछे रहते हैं। वहाँ सम्पूर्ण मनोवांछित फल देनेवाले कल्पवृक्ष प्रत्येक घरमें विराजमान हैं। वहाँ बहुत-सी बावड़ियाँ, कुएँ और सहस्रों जलाशय हैं।। अरुजानि विशोकानि नित्यानि विविधानि च । भवनानि विचित्राणि प्राणदानां त्रिविष्टपे ।। प्राणस्वरूप अन्न-दान करनेवाले लोगोंको स्वर्गमें जो भाँति-भाँतिके विचित्र भवन प्राप्त होते हैं, वे रोग-शोकसे रहित और नित्य (चिरस्थायी) हैं।। विवस्वतश्च सोमस्य ब्रह्मणश्च प्रजापतेः । विशन्ति लोकांस्ते नित्यं जगत्यन्नोदकप्रदाः ।। जगत्में सदा अन्न और जलका दान करनेवाले मनुष्य सूर्य, चन्द्रमा तथा प्रजापति ब्रह्माजीके लोकोंमें जाते हैं ।। तत्र ते सुचिरं कालं विहृत्याप्सरसां गणैः । जायन्ते मानुषे लोके सर्वकल्याणसंयुताः ।। वे वहाँ चिरकालतक अप्सराओंके साथ विहार करके पुनः मनुष्यलोकमें जन्म लेते और समस्त कल्याणकारी गुणोंसे संयुक्त होते हैं ।। बलसंहननोपेता नीरोगाश्चिरजीविनः ।