भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1325, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1325

भगवन् कानि देयानि धर्ममुद्दिश्य मानवैः । तान्यहं श्रोतुमिच्छामि तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने पूछा—**भगवन्! मनुष्योंको धर्मके उद्देश्यसे किन-किन वस्तुओंका दान करना चाहिये? यह मैं सुनना चाहती हूँ। आप मुझे बतानेकी कृपा करें॥

श्रीमहेश्वर उवाच

अजस्रं धर्मकार्यं च तथा नैमित्तिकं प्रिये । अन्नं प्रतिश्रयो दीपः पानीयं तृणमिन्धनम् ॥ स्नेहो गन्धश्च भेषज्यं तिलाश्च लवणं तथा । एवमादि तथान्यच्च दानमाजस्रमुच्यते ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! निरन्तर धर्मकार्य तथा नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। अन्न, निवासस्थान, दीप, जल, तृण, ईंधन, तेल, गन्ध, ओषधि, तिल और नमक—ये तथा और भी बहुत-सी वस्तुएँ निरन्तर दान करनेकी वस्तुएँ बतायी गयी हैं॥

अन्नं प्राणो मनुष्याणामन्नदः प्राणदो भवेत् । तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छति मानवः ॥ अन्न मनुष्योंका प्राण है। जो अन्न दान करता है, वह प्राणदान करनेवाला होता है। अतः मनुष्य विशेषरूपसे अन्नका दान करना चाहता है॥

ब्राह्मणायाभिरूपाय यो दद्यादन्नमीप्सितम् । निदधाति निधिंश्रेष्ठं सोऽनन्तं पारलौकिकम् ॥ अनुरूप ब्राह्मणको जो अभीष्ट अन्न प्रदान करता है, वह परलोकमें अपने लिये अनन्त एवं उत्तम निधिकी स्थापना करता है॥

श्रान्तमध्वपरिश्रान्तमतिथिं गृहमागतम् । अर्चयीत प्रयत्नेन स हि यज्ञो वरप्रदः ॥ रास्तेका थका-माँदा अतिथि यदि घरपर आ जाय तो यत्नपूर्वक उसका आदर-सत्कार करे; क्योंकि वह अतिथि-सत्कार मनोवांछित फल देनेवाला यज्ञ है॥

पितरस्तस्य नन्दन्ति सुवृष्ट्या कर्षका इव । पुत्रो यस्य तु पौत्रो वा श्रोत्रियं भोजयिष्यति ॥ जिसका पुत्र अथवा पौत्र किसी श्रोत्रिय ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसके पितर उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं, जैसे अच्छी वर्षा होनेसे किसान॥

अपि चाण्डालशूद्राणामन्नदानं न गर्ह्यते । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन दद्यादन्नममत्सरः ॥ चाण्डाल और शूद्रोंको भी दिया हुआ अन्नदान निन्दित नहीं होता। अतः ईर्ष्या छोड़कर सब प्रकारके प्रयत्नद्वारा अन्नदान करना चाहिये॥