भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1324, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1324

यदैव युगपत् सम्पत् तत्र दानं महत् भवेत् ।।
अत्यल्पमपि यद् दानमेभिः षड्भिर्गुणैर्युतम् ।
भूत्वानन्तं नयेत् स्वर्गं दातारं दोषवर्जितम् ।।
जब कभी एक समय इन सबका संयोग जुट जाय तभी दान देना महान् फलदायक होता है। इन छः गुणोंसे युक्त जो दान है, वह अत्यन्त अल्प होनेपर भी अनन्त होकर निर्दोष दाताको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है ।।

उमोवाच
एवंगुणयुतं दानं दत्तं चाफलतां व्रजेत् ।
**उमाने पूछा—**प्रभो! इन गुणोंसे युक्त दान दिया गया हो तो क्या वह भी निष्फल हो सकता है? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच
तदप्यस्ति महाभागे नराणां भावदोषतः ।।
कृत्वा धर्मं तु विधिवत् पश्चात्तापं करोति चेत् ।
श्लाघया वा यदि ब्रूयाद् वृथा संसदि यत् कृतम् ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! मनुष्योंके भाव-दोषसे ऐसा भी होता है। यदि कोई विधिपूर्वक धर्मका सम्पादन करके फिर उसके लिये पश्चात्ताप करने लगता है अथवा भरी सभामें उसकी प्रशंसा करते हुए बड़ी-बड़ी बातें बनाने लगता है, उसका वह धर्म व्यर्थ हो जाता है ।।
एते दोषा विवर्ज्याश्च दातृभिः पुण्यकांक्षिभिः ।।
सनातनमिदं वृत्तं सद्भिराचरितं तथा ।
पुण्यकी अभिलाषा रखनेवाले दाताओंको चाहिये कि वे इन दोषोंको त्याग दें। यह दानसम्बन्धी आचार सनातन है। सत्पुरुषोंने सदा इसका आचरण किया है ।।
अनुग्रहात् परेषां तु गृहस्थानामृणं हि तत् ।।
इत्येवं मन आविश्य दातव्यं सततं बुधैः ।।
दूसरोंपर अनुग्रह करनेके लिये दान किया जाता है। गृहस्थोंपर तो दूसरे प्राणियोंका ऋण होता है, जो दान करनेसे उतरता है, ऐसा मनमें समझकर विद्वान् पुरुष सदा दान करता रहे ।।
एवमेव कृतं नित्यं सुकृतं तद् भवेन्महत् ।
सर्वसाधारणं द्रव्यमेवं दत्त्वा महत् फलम् ।।
इस तरह दिया हुआ सुकृत सदा महान् होता है। सर्वसाधारण द्रव्यका भी इसी तरह दान करनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है ।।

उमोवाच