भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1323, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1323

तृतीयं चापरं दानं नानुरूपमिवात्मनः ॥
पात्रोंकी परीक्षा करके दाता यदि दानकी मात्रा अपनी शक्तिसे भी अधिक करे तो वह उत्तम दान है। यथाशक्ति किया हुआ दान मध्यम है और तीसरा अधम श्रेणीका दान है, जो अपनी शक्तिके अनुरूप न हो ॥
यथा सम्भावितं पूर्वं दातव्यं तत् तथैव च ।
पुण्यक्षेत्रेषु यद् दत्तं पुण्यकालेषु वा तथा ॥
तच्छोभनतरं विद्धि गौरवाद् देशकालयोः ।

पहले जैसा बताया गया है, उसी प्रकार दान देना चाहिये। पुण्य क्षेत्रोंमें तथा पुण्यके अवसरोंपर जो कुछ दिया जाता है, उसे देश और कालके गौरवसे अत्यन्त शुभकारक समझो ॥

उमोवाच
यश्च पुण्यतमो देशस्तथा कालश्च शंस मे ॥
**उमाने पूछा—**प्रभो! पवित्रतम देश और काल क्या है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच
कुरुक्षेत्रं महानद्यो यच्च देवर्षिसेवितम् ।
गिरिवरंश्च तीर्थानि देशभागेषु पूजितः ॥
ग्रहीतुमीप्सते यत्र तत्र दत्तं महाफलम् ॥

**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! कुरुक्षेत्र, गङ्गा आदि बड़ी-बड़ी नदियाँ, देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा सेवित स्थान एवं श्रेष्ठ पर्वत—ये सब-के-सब तीर्थ हैं। जहाँ देशके सभी भागोंमें पूजित श्रेष्ठ पुरुष दान ग्रहण करना चाहता हो, वहाँ दिये हुए दानका महान् फल होता है ॥
शरद्वसन्तकालश्च पुण्यमासस्तथैव च ।
शुक्लपक्षश्च पक्षाणां पौर्णमासी च पर्वसु ॥
पितृदैवतनक्षत्रनिर्मलो दिवसस्तथा ।
तच्छोभनतरं विद्धि चन्द्रसूर्यग्रहे तथा ॥

शरद् और वसन्तका समय, पवित्र मास, पक्षोंमें शुक्लपक्ष, पर्वोंमें पौर्णमासी, मघानक्षत्रयुक्त निर्मल दिवस, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण—इन सबको अत्यन्त शुभकारक काल समझो ॥
दाता देयं च पात्रं च उपक्रमयुता क्रिया ।
देशकालं तथेत्येषां सम्पच्छुद्धिः प्रकीर्तिता ॥

दाता हो, देनेकी वस्तु हो, दान लेनेवाला पात्र हो, उपक्रमयुक्त क्रिया हो और उत्तम देश-काल हो—इन सबका सम्पन्न होना शुद्धि कही गयी है ॥