महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1317, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेभ्यो नान्यः पापकृदस्ति लोके ॥
जो लोग उपाध्याय, पिता और माताके साथ मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा द्रोह करते हैं, उन्हें भ्रूणहत्यासे भी बड़ा पाप लगता है। उनसे बढ़कर पापाचारी इस संसारमें दूसरा कोई नहीं है॥
उमोवाच
उपवासविधिं तत्र तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
**उमाने कहा—**प्रभो! अब आप मुझे उपवासकी विधि बताइये॥
श्रीमहेश्वर उवाच
शरीरमलशान्त्यर्थमिन्द्रियोच्छोषणाय च ।
एकभुक्तोपवासैस्तु धारयन्ते व्रतं नराः ॥
लभन्ते विपुलं धर्मं तथाऽऽहारपरिक्षयात् ।
**श्रीमहेश्वर बोले—**प्रिये! शारीरिक दोषकी शान्तिके लिये और इन्द्रियोंको सुखाकर वशमें करनेके लिये मनुष्य एक समय भोजन अथवा दोनों समय उपवासपूर्वक व्रत धारण करते हैं और आहार क्षीण कर देनेके कारण महान् धर्मका फल पाते हैं॥
बहूनामुपरोधं तु न कुर्यादात्मकारणात् ॥
जीवोपघातं च तथा स जीवन् धन्य इष्यते ।
जो अपने लिये बहुतसे प्राणियोंको बन्धनमें नहीं डालता और न उनका वध ही करता है, वह जीवन भर धन्य माना जाता है॥
तस्मात् पुण्यं लभेन्मर्त्यः स्वयमाहारकर्षणात् ॥
तद् गृहस्थैर्यथाशक्ति कर्तव्यमिति निश्चयः ॥
अतः यह सिद्ध होता है कि स्वयं आहारको घटा देनेसे मनुष्य अवश्य पुण्यका भागी होता है। इसलिये गृहस्थोंको यथाशक्ति आहार-संयम करना चाहिये, यह शास्त्रोंका निश्चित आदेश है॥
उपवासार्दिते काये आपदर्थं पयो जलम् ।
भुञ्जन्नप्रतिघाती स्याद् ब्राह्मणाननुमान्य च ॥
उपवाससे जब शरीरको अधिक पीड़ा होने लगे, तब उस आपत्तिकालमें ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर यदि मनुष्य दूध अथवा जल ग्रहण कर ले तो इससे उसका व्रत भंग नहीं होता॥
उमोवाच
ब्रह्मचर्यं कथं देव रक्षितव्यं विजानता ॥
**उमाने पूछा—**देव! विज्ञ पुरुषको ब्रह्मचर्यकी रक्षा कैसे करनी चाहिये? ॥