महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवे जो-जो काम कराना चाहें, उनकी आज्ञाके अधीन रहकर वह सब कुछ करना चाहिये। वेदोंकी आज्ञाके समान गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन अभीष्ट माना गया है ।। कलहांश्च विवादांश्च गुरुभिः सह वर्जयेत् । कैतवं परिहासांश्च मन्युकामाश्रयांस्तथा ॥ गुरुजनोंके साथ कलह और विवाद छोड़ दे, उनके साथ छल-कपट, परिहास तथा काम-क्रोधके आधारभूत बर्ताव भी न करे ।। गुरूणां योऽनहंवादी करोत्याज्ञामतन्द्रितः । न तस्मात् सर्वमर्त्येषु विद्यते पुण्यकृत्तमः ॥ जो आलस्य और अहंकार छोड़कर गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करता है, समस्त मनुष्योंमें उससे बढ़कर पुण्यात्मा दूसरा कोई नहीं है ।। असूयामपवादं च गुरूणां परिवर्जयेत् । तेषां प्रियहितान्वेषी भूत्वा परिचरेत् सदा ॥ गुरुजनोंके दोष देखना और उनकी निन्दा करना छोड़ दे, उनके प्रिय और हितका ध्यान रखते हुए सदा उनकी परिचर्या करे ।। न तद् यज्ञफलं कुर्यात् तपो वाऽऽचरितं महत् । यत् कुर्यात् पुरुषस्येह गुरुपूजा सदा कृता ॥ यज्ञोंका फल और किया हुआ महान् तप भी इस जगत्में मनुष्यको वैसा लाभ नहीं पहुँचा सकता, जैसा सदा किया हुआ गुरुपूजन पहुँचा सकता है ।। अनुवृत्तेर्विना धर्मो नास्ति सर्वाश्रमेष्वपि । तस्मात् क्षमावृतः क्षान्तो गुरुवृत्तिं समाचरेत् ॥ सभी आश्रमोंमें अनुवृत्ति (गुरुसेवा) के बिना कोई भी धर्म सफल नहीं हो सकता। इसलिये क्षमासे युक्त और सहनशील होकर गुरुसेवा करे ।। स्वमर्थं स्वशरीरं च गुर्वर्थे संत्यजेद् बुधः । विवादं धनहेतोर्वा मोहाद् वा तैर्न रोचयेत् ॥ विद्वान् पुरुष गुरुके लिये अपने धन और शरीरको समर्पण कर दे। धनके लिये अथवा मोहवश उनके साथ विवाद न करे ।। ब्रह्मचर्यमहिंसा च दानानि विविधानि च । गुरुभिः प्रतिषिद्धस्य सर्वमेतदपार्थकम् ॥ जो गुरुजनोंसे अभिशप्त है, उसके किये हुए ब्रह्मचर्य, अहिंसा और नाना प्रकारके दान—ये सब व्यर्थ हो जाते हैं ।। उपाध्यायं पितरं मातरं च येऽभिद्रुह्युर्मनसा कर्मणा वा । तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं