महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपाध्यायका जो पुत्र है वह गुरु है, उसका जो गुरु है वह भी अपना गुरु है, ऋत्विक् गुरु है और पिता भी गुरु है—ये सब-के-सब गुरु कहे गये हैं।। ज्येष्ठो भ्राता नरेन्द्रश्च मातुलः श्वशुरस्तथा । भयत्राता च भर्ता च गुरवस्ते प्रकीर्तिताः ।। बड़ा भाई, राजा, मामा, श्वशुर, भयसे रक्षा करनेवाला तथा भर्ता (स्वामी)—ये सब गुरु कहे गये हैं ।। इत्येष कथितः साध्वि गुरूणां सर्वसंग्रहः । अनुवृत्तिं च पूजां च तेषामपि निबोध मे ।। पतिव्रते! यह गुरु-कोटिमें जिनकी गणना है, उन सबका संग्रह करके यहाँ बताया गया है। अब उनकी अनुवृत्ति और पूजाकी भी बात सुनो ।। आराध्या मातापितरावुपाध्यायस्तथैव च । कथंचिन्नावमन्तव्या नरेण हितमिच्छता ।। अपना हित चाहनेवाले पुरुषको माता, पिता और उपाध्याय—इन तीनोंकी आराधना करनी चाहिये। किसी तरह भी इनका अपमान नहीं करना चाहिये ।। तेन प्रीणन्ति पितरस्तेन प्रीतः प्रजापतिः । येन प्रीणाति चेन्माता प्रीताः स्युर्देवमातरः ।। येन प्रीणात्युपाध्यायो ब्रह्मा तेनाभिपूजितः । अप्रीतेषु पुनस्तेषु नरो नरकमेति हि ।। इससे पितर प्रसन्न होते हैं। प्रजापतिको प्रसन्नता होती है। जिस आराधनाके द्वारा वह माताको प्रसन्न करता है, उससे देवमाताएँ प्रसन्न होती हैं। जिससे वह उपाध्यायको संतुष्ट करता है, उससे ब्रह्माजी पूजित होते हैं। यदि मनुष्य आराधना-द्वारा इन सबको संतुष्ट न करे तो वह नरकमें जाता है ।। गुरूणां वैरनिर्वन्धो न कर्तव्यः कथंचन । नरकं स्वगुरुप्रीत्या मनसापि न गच्छति ।। गुरुजनोंके साथ कभी वैर नहीं बाँधना चाहिये। अपने गुरुजनके प्रसन्न होनेपर मनुष्य कभी मनसे भी नरकमें नहीं पड़ता ।। न ब्रूयाद् विप्रियं तेषामनिष्ठं न प्रवर्तयेत् । विगृह्य न वदेत् तेषां समीपे स्पर्धया क्वचित् ।। उन्हें जो अप्रिय लगे, ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिये, जिससे उनका अनिष्ट हो, ऐसा काम भी नहीं करना चाहिये। उनसे झगड़कर नहीं बोलना चाहिये और उनके समीप कभी किसी बातके लिये होड़ नहीं लगानी चाहिये ।। यद् यदिच्छन्ति ते कर्तुमस्वतन्त्रस्तदाचरेत् । वेदानुशासनसमं गुरुशासनमिष्यते ।।