भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1314, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1314

न हि प्राणैः प्रियतमं लोके किंचन विद्यते । तस्मात् प्राणिदया कार्या यथाऽऽत्मनि तथा परे ॥ संसारमें प्राणोंके समान प्रियतम दूसरी कोई वस्तु नहीं है। अतः समस्त प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। जैसे अपने ऊपर दया अभीष्ट होती है, वैसे ही दूसरोंपर भी होनी चाहिये ॥ इत्येवं मुनयः प्राहुर्मांसस्याभक्षणे गुणान् । इस प्रकार मुनियोंने मांस न खानेमें गुण बताये हैं ॥

उमोवाच

गुरुपूजा कथं देव क्रियते धर्मचारिभिः ॥ उमाने पूछा—देव! धर्मचारी मनुष्य गुरुजनोंकी पूजा कैसे करते हैं? ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

गुरुपूजां प्रवक्ष्यामि यथावत् तव शोभने । कृतज्ञानां परो धर्म इति वेदानुशासनम् ॥ श्रीमहेश्वरने कहा—शोभने! अब मैं तुम्हें यथावत् रूपसे गुरुजनोंकी पूजाकी विधि बता रहा हूँ। वेदकी यह आज्ञा है कि कृतज्ञ पुरुषोंके लिये गुरुजनोंकी पूजा परम धर्म है ॥ तस्मात् स्वगुरवः पूज्यास्ते हि पूर्वोपकारिणः । गुरूणां च गरीयांसस्त्रयो लोकेषु पूजिताः ॥ उपाध्यायः पिता माता सम्पूज्यास्ते विशेषतः । अतः सबको अपने-अपने गुरुजनोंका पूजन करना चाहिये; क्योंकि वे गुरुजन संतान और शिष्यपर पहले उपकार करनेवाले हैं। गुरुजनोंमें उपाध्याय (अध्यापक) पिता और माता—ये तीन अधिक गौरवशाली हैं। इनकी तीनों लोकोंमें पूजा होती है; अतः इन सबका विशेषरूपसे आदर-सत्कार करना चाहिये ॥ ये पितुर्भातरो ज्येष्ठा ये च तस्यानुजास्तथा ॥ पितुः पिता च सर्वे ते पूजनीयाः पिता तथा ॥ जो पिताके बड़े तथा छोटे भाई हों, वे तथा पिताके भी पिता—ये सब-के-सब पिताके ही तुल्य पूजनीय हैं ॥ मातुर्या भगिनी ज्येष्ठा मातुर्या च यवीयसी । मातामही च धात्री च सर्वास्ता मातरः स्मृताः ॥ माताकी जो जेठी बहिन तथा छोटी बहिन हैं, वे और नानी एवं धाय—इन सबको माताके ही तुल्य माना गया है ॥ उपाध्यायस्य यः पुत्रो यश्च तस्य भवेद् गुरुः । ऋत्विग् गुरुः पिता चेति गुरवः सम्प्रकीर्तिताः ॥