महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1332, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मलोकाय संसिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ।। स्वामीके कल्याण-साधनमें तत्पर हो युद्धमें मारे जाकर अपने शरीरका परित्याग करनेवाले शूरवीर योद्धा उत्तम सिद्धि पाकर ब्रह्मलोककी यात्रा करते हैं; परंतु वे भी भूमिदान करनेवालेको लाँघ नहीं पाते हैं ।। हलकृष्टां महीं दद्याद् यत्सबीजफलान्विताम् । सुकूपशरणां वापि सा भवेत् सर्वकामदा ।। जहाँ सुन्दर कूँआँ और रहनेके लिये घर बना हो, जो हलसे जोती गयी हो और जिसमें बीजसहित फल लगे हों, ऐसी भूमिका दान करना चाहिये। वह सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली होती है ।। निष्पन्नसस्यां पृथिवीं यो ददाति द्विजन्मनाम् । विमुक्तः कलुषैः सर्वैः शक्रलोकं स गच्छति ।। जो उपजी हुई खेतीसे युक्त भूमिका ब्राह्मणोंके लिये दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो इन्द्रलोकमें जाता है ।। यथा जनित्री क्षीरेण स्वपुत्रमभिवर्धयेत् । एवं सर्वफलैर्भूमिर्दातारमभिवर्धयेत् ।। जैसे माता दूध पिलाकर अपने पुत्रका पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार भूमि सम्पूर्ण मनोवांछित फल देकर दाताको अभ्युदयशील बनाती है ।। ब्राह्मणं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् । ग्राहयित्वा निजां भूमिं न यान्ति यमसादनम् ।। जो लोग उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, अग्निहोत्री एवं सदाचारी ब्राह्मणको अपनी भूमि देते हैं, वे यमलोकमें कभी नहीं जाते हैं ।। यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि दृश्यते । तथा भूमेः कृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ।। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी प्रतिदिन वृद्धि होती देखी जाती है, उसी प्रकार किये हुए भूमिदानका महत्त्व प्रत्येक नयी फसल पैदा होनेपर बढ़ता जाता है ।। यथा बीजानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले । तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदानगुणार्जिताः ।। जैसे पृथ्वीपर बिखेरे हुए बीज अंकुरित हो जाते हैं, उसी प्रकार भूमिदानके गुणोंसे प्राप्त हुए सम्पूर्ण मनोवांछित भोग अंकुरित होते और बढ़ते हैं ।। पितरः पितृलोकस्था देवताश्च दिवि स्थिताः । संतर्पयन्ति भोगैस्तं यो ददाति वसुंधराम् ।। जो भूमिका दान करता है, उसे पितृलोकनिवासी पितर और स्वर्गवासी देवता अभीष्ट भोगोंद्वारा तृप्त करते हैं ।।