भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1331, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1331

इसीलिये गौओंका दान सबसे उत्कृष्ट बताया जाता है। गौओंकी पूजा तथा उनके प्रति की हुई भक्ति मनुष्यकी आयु बढ़ानेवाली होती है ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमिदानं महाफलम् । भूमिदानसमं दानं लोके नास्तीति निश्चयः ॥ इसके बाद मैं भूमिदानका महत्त्व बतलाऊँगा। भूमिदानका महान् फल है। संसारमें भूमिदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है। यही धर्मात्मा पुरुषोंका निश्चय है ॥ गृहयुक् क्षेत्रयुग् वापि भूमिभागः प्रदीयते । सुखभोगं निराक्रोशं वास्तुपूर्वं प्रकल्प्य च ॥ ग्रहीतारमलंकृत्य वस्त्रपुष्पानुलेपनैः । सभृत्यं सपरिवारं भोजयित्वा यथेष्टतः ॥ यो दद्याद् दक्षिणां काले त्रिरद्भिर्गृह्यतामिति ॥ गृह अथवा क्षेत्रसे युक्त भू-भागका दान करना चाहिये। जहाँ सुख भोगनेकी सुविधा हो, जो अनिन्दनीय स्थान हो, वहाँ वास्तुपूजनपूर्वक गृह बनाकर दान लेनेवालेको वस्त्र, पुष्पमाला तथा चन्दनसे अलंकृत करके सेवक और परिवारसहित उसे यथेष्ट भोजन करावे। तत्पश्चात् यथासमय तीन बार हाथमें जल लेकर ‘दान ग्रहण कीजिये’ ऐसा कहकर उसे उस भूमिको दान एवं दक्षिणा दे ॥ एवं भूम्यां प्रदत्तायां श्रद्धया वीतमत्सरैः । यावत् तिष्ठति सा भूमिस्तावत् तस्य फलं विदुः । इस प्रकार ईर्ष्यारहित पुरुषोंद्वारा श्रद्धापूर्वक भूदान दिये जानेपर जबतक वह भूमि रहती है, तबतक दाता उसके दानजनित फलका उपभोग करते हैं ॥ भूमिदः स्वर्गमारुह्य रमते शाश्वतीः समाः । अचला ह्यक्षया भूमिः सर्वकामान् दुधुक्षति ॥ भूमिदान देनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें जाकर सदा ही सुख भोगता है; क्योंकि यह अचल एवं अक्षय भूमि सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करती है ॥ यत् किंचित् कुरुते पापं पुरुषो वृत्तिकर्शितः । अपि गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन मुच्यते ॥ जीविकाके लिये कष्ट पानेवाला पुरुष जो कोई भी पाप करता है, गायके कान बराबर भूमिको दान करनेसे भी मुक्त हो जाता है ॥ सुवर्णं रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च । सर्वमेतन्महाभागे भूमिदाने प्रतिष्ठितम् ॥ महाभागे! भूमिदानमें सुवर्ण, रजत, वस्त्र, मणि, मोती तथा रत्न—इन सबका दान प्रतिष्ठित है ॥ भर्तुर्निःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः ।