महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1330, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रदाय वस्त्रसंछन्नां वायुलोके महीयते ॥
वायुसे उड़ी हुई धूलिके समान रंगवाली, बछड़े-सहित, दूध देनेवाली गायको कपड़ा ओढ़ाकर काँसके दुहानीके साथ दान देकर दाता वायुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
समानवत्सां यो धेनुं दत्त्वा गौरीं पयस्विनीम् ।
सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नामग्निलोके महीयते ॥
जो समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी, धौरी एवं दूध देनेवाली धेनुको वस्त्रसे आच्छादित करके उसका दान करता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
युवानं बलिनं श्यामं शतेन सह यूथपम् ।
गवेन्द्रं ब्राह्मणेन्द्राय भूरिशृङ्गमलंकृतम् ॥
ऋषभं ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियाणां महात्मनाम् ।
ऐश्वर्यमभिजायन्ते जायमानाः पुनः पुनः ॥
जो लोग महामनस्वी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको नौजवान, बड़े सींगवाले, बलवान्, श्यामवर्ण, एक सौ गौओंसहित यूथपति गवेन्द्र (साँड़) को पूर्णतः अलंकृत करके उसे श्रेष्ठ ब्राह्मणके हाथमें दे देते हैं, वे बारंबार जन्म लेनेपर ऐश्वर्यके साथ ही जन्म लेते हैं ॥
गवां मूत्रपुरीषाणि नोद्विजेत कदाचन ।
न चासां मांसमश्रीयाद् गोषु भक्तः सदा भवेत् ॥
गौओंके मल-मूत्रसे कभी उद्विग्न नहीं होना चाहिये और उनका मांस कभी नहीं खाना चाहिये। सदा गौओंका भक्त होना चाहिये ॥
ग्रासमुष्टिं परगवे दद्याद् संवत्सरं शुचिः ।
अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम् ॥
जो पवित्र भावसे रहकर एक वर्षतक दूसरेकी गायको एक मुट्ठी ग्रास खिलाता है और स्वयं आहार नहीं करता, उसका वह व्रत सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला होता है ॥
गवामुभयतः काले नित्यं स्वस्त्ययनं वदेत् ।
न चासां चिन्तयेत् पापमिति धर्मविदो विदुः ॥
गौओंके पास प्रतिदिन दोनों समय उनके कल्याणकी बात कहनी चाहिये। कभी उनका अनिष्ट-चिन्तन नहीं करना चाहिये। ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका मत है ॥
गावः पवित्रं परमं गोषु लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
कथंचिन्नापमन्तव्या गावो लोकस्य मातरः ॥
गौएँ परम पवित्र वस्तु हैं, गौओंमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। अतः किसी तरह गौओंका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सम्पूर्ण जगत्की माताएँ हैं ॥
तस्मादेव गवां दानं विशिष्टमिति कथ्यते ।
गोषु पूजा च भक्तिश्च नरस्यायुष्यतां वहेत् ॥