महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1329, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमासप्तमं तारयते परत्र ॥ जो काँसके दुग्धपात्र और सोनेसे मढ़े हुए सींगोंवाली कपिला गौका वस्त्रसहित दान करता है, वह अपने पुत्रों, पौत्रों तथा सातवीं पीढ़ीतकके समस्त कुलका परलोकमें उद्धार कर देता है ॥ अन्तर्जाताः क्रीतका द्यूतलब्धाः प्राणक्रीताः सोदकाश्चौजसा वा । कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणार्थंगताश्च द्वारैरेतैस्ताः प्रलब्धाः प्रदद्यात् ॥ जो अपने ही यहाँ पैदा हुई हों, खरीदकर लायी गयी हों, जुएमें जीत ली गयी हों, बदलेमें दूसरा कोई प्राणी देकर खरीदी गयी हों, जल हाथमें लेकर संकल्पपूर्वक दी गयी हों, अथवा युद्धमें बलपूर्वक जीती गयी हों, संकटसे छुड़ाकर लायी गयी हों, या पालन-पोषणके लिये आयी हों—इन द्वारोंसे प्राप्त हुई गौओंका दान करना चाहिये ॥ कृशाय बहुपुत्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये । प्रदाय नीरुजां धेनुं लोकान् प्राप्नोत्यनुत्तमान् ॥ जीविकाके बिना दुर्बल, अनेक पुत्रवाले, अग्निहोत्री, श्रोत्रिय ब्राह्मणको दूध देनेवाली नीरोग गायका दान करके दाता सर्वोत्तम लोकोंको प्राप्त होता है ॥ नृशंसस्य कृतघ्नस्य लुब्धस्यानृतवादिनः । हव्यकव्यव्यपेतस्य न दद्याद् गाः कथंचन ॥ जो क्रूर, कृतघ्न, लोभी, असत्यवादी और हव्य-कव्यसे दूर रहनेवाला हो, ऐसे मनुष्यको किसी तरह गौएँ नहीं देनी चाहिये ॥ समानवत्सां यो दद्याद् धेनुं विप्रे पयस्विनीम् । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां सोमलोके महीयते ॥ जो मनुष्य समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी एवं दूध देनेवाली गायको वस्त्र ओढ़ाकर ब्राह्मणको दान करता है, वह सोमलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ समानवत्सां यो दद्यात् कृष्णां धेनुं पयस्विनीम् । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां लोकान् प्राप्नोत्यपाम्पतेः ॥ जो समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी एवं दूध देनेवाली काली गौको वस्त्र ओढ़ाकर उसका ब्राह्मणको दान करता है, वह जलके स्वामी वरुणके लोकोंमें जाता है ॥ हिरण्यवर्णां पिङ्गाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंछन्नां यान्ति कौबेर सद्मनः ॥ जिसके शरीरका रंग सुनहरा, आँखें भूरी, साथमें बछड़ा और काँसकी दुहानी हो, उस गौको वस्त्र ओढ़ाकर दान करनेसे मनुष्य कुबेरके धाममें जाते हैं ॥ वायुरेणुसवर्णां च सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।