भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1333, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1333

दीर्घायुष्यं वराङ्गत्वं स्फीतां च श्रियमुत्तमाम् । परत्र लभते मर्त्यः सम्प्रदाय वसुंधराम् ॥ भूमिदान करके मनुष्य परलोकमें दीर्घायु, सुन्दर शरीर और बढ़ी-चढ़ी उत्तम सम्पत्ति पाता है ॥

एतत् सर्वं मयोद्दिष्टं भूमिदानस्य यत् फलम् । श्रद्दधानैर्नरैर्नित्यं श्राव्यमेतत् सनातनम् । यह सब मैंने भूमिदानका फल बताया है। श्रद्धालु पुरुषोंको प्रतिदिन यह सनातन दानमाहात्म्य सुनना चाहिये ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि कन्यादानं यथाविधि । कन्या देया महादेवि परेषामात्मनोऽपि वा ॥ अब मैं विधिपूर्वक कन्यादानका माहात्म्य बताऊँगा। महादेवि! दूसरोंकी और अपनी भी कन्याका दान करना चाहिये ॥

कन्यां शुद्धव्रताचारां कुलरूपसमन्विताम् । यस्मै दित्सति पात्राय तेनापि भृशकामिताम् ॥ जो शुद्ध व्रत एवं आचारवाली, कुलीन एवं सुन्दर रूपवाली कन्याका किसी सुपात्र पुरुषको दान करना चाहता है, उसे इस बातपर भी ध्यान रखना चाहिये कि वह सुपात्र व्यक्ति उस कन्याको बहुत चाहता है या नहीं (वह पुरुष उसे चाहता हो तभी उसके साथ उस कन्याका विवाह करना चाहिये) ॥

प्रथमं तां समाकल्प्य बन्धुभिः कृतनिश्चयाम् । कारयित्वा गृहं पूर्वं दासीदासपरिच्छदैः ॥ गृहोपकरणैश्चैव पशुधान्येन संयुताम् । तदर्थिने तदर्हाय कन्यां तां समलङ्कृताम् ॥ सविवाहं यथान्यायं प्रयच्छेदग्निसाक्षिकम् ॥ पहले बन्धुओंके साथ सलाह करके कन्याके विवाहका निश्चय करे, तत्पश्चात् उसे वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित करे। फिर उसके लिये मण्डप बनाकर दास-दासी, अन्यान्य सामग्री, घरके आवश्यक उपकरण, पशु और धान्यसे सम्पन्न एवं वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हुई उस कन्याका उसे चाहनेवाले योग्य वरको अग्निदेवकी साक्षितामें यथोचित रीतिसे विवाहपूर्वक दान करे ॥

वृत्त्यायतीं यथा कृत्वा सद्गृहे तौ निवेशयेत् ॥ एवं कृत्वा वधूदानं तस्य दानस्य गौरवात् । प्रेत्यभावे महीयेत स्वर्गलोके यथासुखम् ॥ पुनर्जातश्च सौभाग्यं कुलवृद्धिं तथाऽऽप्नुयात् ॥

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