भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1334, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1334

भविष्यमें जीवन-निर्वाहके लिये पूर्ण व्यवस्था करके उन दोनों दम्पतिको उत्तम गृहमें ठहरावे। इस प्रकार वधू-वेषमें कन्याका दान करके उस दानकी महिमासे दाता मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें सुख और सम्मानके साथ रहता है। फिर जन्म लेनेपर उसे सौभाग्य प्राप्त होता है तथा वह अपने कुलको बढ़ाता है ॥ विद्यादानं तथा देवि पात्रभूताय वै ददत् । प्रेत्यभावे लभेन्मर्त्यो मेधां वृद्धिं धृतिं स्मृतिम् ॥ देवि! सुपात्र शिष्यको विद्यादान देनेवाला मनुष्य मृत्युके पश्चात् वृद्धि, बुद्धि, धृति और स्मृति प्राप्त करता है ॥ अनुरूपाय शिष्याय यश्च विद्यां प्रयच्छति । यथोक्तस्य प्रदानस्य फलमानन्त्यमश्नुते ॥ जो सुयोग्य शिष्यको विद्या दान करता है, उसे शास्त्रोक्त दानका अक्षय फल प्राप्त होता है ॥ दापनं त्वथ विद्यानां दरिद्रेभ्योऽर्थवेदनैः । स्वयं दत्तेन तुल्यं स्यादिति विद्धि शुभानने ॥ शुभानने! निर्धन छात्रोंको धनकी सहायता देकर विद्या प्राप्त कराना भी स्वयं किये हुए विद्यादानके समान है, ऐसा समझो ॥ एवं ते कथितान्येव महादानानि मानिनि । त्वत्प्रियार्थं मया देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥ मानिनि! देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हारी प्रसन्नताके लिये ये बड़े-बड़े दान बताये हैं। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश कथं देयं तिलान्वितम् । तस्य तस्य फलं ब्रूहि दत्तस्य च कृतस्य च ॥ **उमाने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! तिलका दान कैसे करना चाहिये? और करनेका फल क्या होता है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

तिलकल्पविधिं देवि तन्मे शृणु समाहिता ॥ समृद्धैरसमृद्धैर्वा तिला देया विशेषतः । तिलाः पवित्राः पापघ्नाः सुपुण्या इति संस्मृताः ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**तुम एकाग्रचित्त होकर मुझसे तिलकल्पकी विधि सुनो। मनुष्य धनी हों या निर्धन, उन्हें विशेषरूपसे तिलोंका दान करना चाहिये; क्योंकि तिल पवित्र, पापनाशक और पुण्यमय माने गये हैं ॥