भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1335, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1335

न्यायतस्तु तिलान् शुद्धान् संहृत्याथ स्वशक्तितः ।
तिलराशिं पुनः कुर्यात् पर्वताभं सरत्नकम् ॥
महान्तं यदि वा स्तोकं नानाद्रव्यसमन्वितम् ॥
सुवर्णरजताभ्यां च मणिमुक्ताप्रवालकैः ।
अलंकृत्य यथायोगं सपताकं सवेदिकम् ॥
सभूषणं सवस्त्रं च शयनासनसम्मितम् ।
प्रायशः कौमुदीमासे पौर्णमास्यां विशेषतः ।
भोजयित्वा च विधिवद् ब्राह्मणानर्हतो बहून् ॥
स्वयं कृतोपवासश्च वृत्तशौचसमन्वितः ।
दद्यात् प्रदक्षिणीकृत्य तिलराशिं सदक्षिणम् ॥
अपनी शक्तिके अनुसार न्यायपूर्वक शुद्ध तिलोंका संग्रह करके उनकी पर्वताकार राशि बनावे। वह राशि छोटी हो या बड़ी उसे नाना प्रकारके द्रव्यों तथा रत्नोंसे युक्त करे। फिर यथाशक्ति सोना, चाँदी, मणि, मोती और मूँगोंसे अलंकृत करके पताका, वेदी, भूषण, वस्त्र, शय्या और आसनसे सुशोभित करे। प्रायः आश्विन मासमें विशेषतः पूर्णिमा तिथिको बहुत-से सुयोग्य ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराकर स्वयं उपवास करके शौचाचार-सम्पन्न हो उन ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके दक्षिणासहित उस तिलराशिका दान करे ॥
एकस्यापि बहूनां वा दातव्यं भूतिमिच्छता ।
तस्य दानफलं देवि अग्निष्टोमेन संयुतम् ॥
कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि वह एक ही पुरुषको या अनेक व्यक्तियोंको दान दे। देवि! उनके दानका फल अग्निष्टोम यज्ञके समान होता है ॥
केवलं वा तिलैरेव भूमौ कृत्वा गवाकृतिम् ।
सवस्त्रकं सरत्नं च पुंसा गोदानकांक्षिणा ॥
तदर्हाय प्रदातव्यं तस्य गोदानतः फलम् ॥
अथवा पृथ्वीपर केवल तिलोंसे ही गौकी आकृति बनाकर गोदानके फलकी इच्छा रखनेवाला पुरुष रत्न और वस्त्रसहित उस तिल-धेनुका सुयोग्य ब्राह्मणको दान करे। इससे दाताको गोदान करनेका फल मिलता है ॥
शरावांस्तिलसम्पूर्णान् सहिरण्यान् सचम्पकान् ।
नृपो ददद् ब्राह्मणाय स पुण्यफलभाग् भवेत् ॥
जो राजा सुवर्ण और चम्पासे युक्त तथा तिलसे भरे हुए शरावों (पुरवों) का ब्राह्मणको दान करता है, वह पुण्य-फलका भागी होता है ॥
एवं तिलमयं देयं नरेण हितमिच्छता ।
नानादानफलं भूयः शृणु देवि समाहिता ॥