महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1336, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवि! अपना हित चाहनेवाले मनुष्यको इसी प्रकार तिलमयी धेनुका दान करना चाहिये। अब पुनः एकाग्रचित्त होकर नाना प्रकारके दानोंका फल सुनो ॥
बलमायुष्यमारोग्यमन्नदानाल्लभेत्ररः ।
पानीयदस्तु सौभाग्यं रसज्ञानं लभेत्ररः ॥
अन्नदान करनेसे मनुष्यको बल, आयु और आरोग्यकी प्राप्ति होती है। जलदान करनेवाला पुरुष सौभाग्य तथा रसका ज्ञान प्राप्त करता है ॥
वस्त्रदानाद् वपुःशोभामलंकारं लभेत्ररः ।
दीपदो बुद्धिवैशद्यं द्युतिशोभां लभेत्ररः ॥
वस्त्रदान करनेसे मनुष्य शारीरिक शोभा और आभूषण लाभ करता है। दीपदान करनेवालेकी बुद्धि निर्मल होती है तथा उसे द्युति एवं शोभाकी प्राप्ति होती है ॥
राजबीजाविमोक्षं तु छत्रदो लभते फलम् ।
दासीदासप्रदानात् तु भवेत् कर्मान्तभाङ्नरः ॥
दासीदासं च विविधं लभेत् प्रेत्य गुणान्वितम् ॥
छत्रदान करनेवाला पुरुष किसी भी जन्ममें राजवंशसे अलग नहीं होता। दासी और दासोंका दान करनेसे मनुष्य कर्मोंका अन्त कर देता है और मृत्युके पश्चात् उत्तम गुणोंसे युक्त भाँति-भाँतिके दासों और दासियोंको प्राप्त करता है ॥
यानानि वाहनं चैव तदर्हाय ददन्नरः ।
पादरोगपरिक्लेशान्मुक्तः श्वसनवाहवान् ।
विचित्रं रमणीयं च लभते यानवाहनम् ॥
जो मनुष्य सुयोग्य ब्राह्मणको रथ आदि यानों और वाहनोंका दान करता है, वह पैरसम्बन्धी रोगों और क्लेशोंसे मुक्त हो जाता है। उसकी सवारीमें वायुके समान वेगशाली घोड़े मिलते हैं। वह विचित्र एवं रमणीय यान और वाहन पाता है ॥
सेतुकूपतटाकानां कर्ता तु लभते नरः ।
दीर्घायुष्यं च सौभाग्यं तथा प्रेत्य गतिं शुभाम् ॥
पुल, कुआँ और पोखरा बनवानेवाला मानव दीर्घायु, सौभाग्य तथा मृत्युके पश्चात् शुभ गति प्राप्त कर लेता है ॥
वृक्षसंरोपको यस्तु छायापुष्पफलप्रदः ।
प्रेत्यभावे लभेत् पुण्यमभिगम्यो भवेन्नरः ॥
जो वृक्ष लगानेवाला तथा छाया, फूल और फल प्रदान करनेवाला है, वह मृत्युके पश्चात् पुण्यलोक पाता है और सबके लिये मिलनेके योग्य हो जाता है ॥
यस्तु संक्रमकृल्लोके नदीषु जलहारिणाम् ।
लभेत् पुण्यफलं प्रेत्य व्यसनेभ्यो विमोक्षणम् ॥