भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

उनके मायामय पाश हैं, जिन्हें न देवता जानते हैं, न असुर। फिर मनुष्योंमें कौन ऐसा

है, जो उन यमदेवके महान् चरित्रको जान सके ।।

एवं संवसतस्तस्य यमस्य परिचारकाः ।

गृहीत्वा संनयन्त्येव प्राणिनः क्षीणकर्मणः ॥

इस प्रकार यमलोकमें निवास करते हुए यमराजके दूत जिनके प्रारब्धकर्म क्षीण हो गये

हैं, उन प्राणियोंको पकड़कर उनके पास ले जाते हैं ।।

येन केनापदेशेन त्वपदेशस्तदुद्भवः ।

कर्मणा प्राणिनो लोके उत्तमाधममध्यमाः ॥

यथार्हं तान् समादाय नयन्ति यमसादनम् ।

जिस किसी निमित्तसे वे प्राणियोंको ले जाते हैं, वह निमित्त वे स्वयं बना लेते हैं।

जगत्में कर्मानुसार उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके प्राणी होते हैं। यथायोग्य उन

सभी प्राणियोंको लेकर वे यमलोकमें पहुँचाते हैं ।।

धार्मिकानुत्तमान् विद्धि स्वर्गिणस्ते यथामराः ॥

नृषु जन्म लभन्ते ये कर्मणा मध्यमाः स्मृताः ।

धार्मिक पुरुषोंको उत्तम समझो। वे देवताओंके समान स्वर्गके अधिकारी होते हैं। जो

अपने कर्मके अनुसार मनुष्योंमें जन्म लेते हैं, वे मध्यम माने गये हैं ।।

तिर्यङ्नरकगन्तारो ह्यधमास्ते नराधमाः ॥

पन्थानस्त्रिविधा दृष्टाः सर्वेषां गतजीविनाम् ।

रमणीयं निराबाधं दुर्दर्शमिति नामतः ॥

जो नराधम पशु-पक्षियोंकी योनि तथा नरकमें जानेवाले हैं, वे अधमकोटिके अन्तर्गत

हैं। सभी मरे हुए प्राणियोंके लिये तीन प्रकारके मार्ग देखे गये हैं—एक रमणीय, दूसरा

निराबाध और तीसरा दुर्दर्श ।।

रमणीयं तु यन्मार्ग पताकाध्वजसंकुलम् ।

धूपितं सिक्तसम्मूष्टं पुष्पमालाभिसंकुलम् ॥

मनोहरं सुखस्पर्शं गच्छतामेव तद् भवेत् ।

निराबाधं यथालोकं सुप्रशस्तं कृतं भवेत् ।।

जो रमणीय मार्ग है, वह ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित और फूलोंकी मालाओंसे

अलंकृत है। उसे झाड़-बुहारकर उसके ऊपर जलका छिड़काव किया गया होता है। वहाँ

धूपकी सुगन्ध छायी रहती है। उसका स्पर्श चलनेवालोंके लिये सुखद और मनोहर होता है।

निराबाध वह मार्ग है, जो लौकिक मार्गोंके समान सुन्दर एवं प्रशस्त बनाया गया है। वहाँ

किसी प्रकारकी बाधा नहीं होती ।।

तृतीयं यत् तु दुर्दर्श दुर्गन्धितमसावृतम् ।

परुषं शर्कराकीर्णं श्वदंष्ट्राबहुलं भृशम् ॥

कृमिकीटसमाकीर्णं भजतामतिदुर्गमम् । जो तीसरा मार्ग है, वह देखनेमें भी दुःखद होनेके कारण दुर्दर्श कहलाता है। वह दुर्गन्धयुक्त एवं अन्धकार-से आच्छन्न है। कंकड़-पत्थरोंसे व्याप्त और कठोर जान पड़ता है। वहाँ कुत्ते और दाढ़ोंवाले हिंसक जन्तु अधिक रहते हैं। कृमि और कीट सब ओर छाये रहते हैं। उस मार्गसे चलनेवालोंको वह अत्यन्त दुर्गम प्रतीत होता है ।।

मागैंरैवं त्रिभिर्नित्यमुत्तमाधममध्यमान् ।। संनयन्ति यथा काले तन्मे शृणु शुचिस्मिते । शुचिस्मिते! इस प्रकार तीन मार्गोंद्वारा वे सदा यथासमय उत्तम, मध्यम और अधम पुरुषोंको जिस प्रकार ले जाते हैं, वह मुझसे सुनो ।।

उत्तमानन्तकाले तु यमदूताः सुसंवृताः । नयन्ति सुखमादाय रमणीयपथेन वै ।। उत्तम पुरुषोंको अन्तके समय ले जानेके लिये जो यमदूत आते हैं, वे सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित होते हैं और उन पुरुषोंको साथ ले रमणीय मार्गद्वारा सुखपूर्वक ले जाते हैं ।।

मध्यमान् योधवेषेण मध्यमेन पथा तथा ।। चण्डालवेषास्त्वधमान् गृहीत्वा भर्त्संतर्जनैः । आकर्षन्तस्तथा पाशैर्दुर्दर्शेन नयन्ति तान् ।। त्रिविधानेवमादाय नयन्ति यमसादनम् ।। मध्यमकोटिके प्राणियोंको मध्यम मार्गके द्वारा योद्धाका वेष धारण किये हुए यमदूत अपने साथ ले जाते हैं तथा चाण्डालका वेष धारण करके अधमकोटिके प्राणियोंको पकड़कर उन्हें डाँटते-फटकारते तथा पाशोंद्वारा बाँधकर घसीटते हुए दुर्दर्श नामक मार्गसे ले जाते हैं। इस प्रकार त्रिविध प्राणियोंको लेकर वे उन्हें यमलोकमें पहुँचाते हैं ।।

धर्मासनगतं दक्षं भ्राजमानं स्वतेजसा । लोकपालं सभाध्यक्षं तथैव परिषदगतम् ।। दर्शयन्ति महाभागे यामिकास्तं निवेद्य ते । महाभागे! वहाँ धर्मके आसनपर अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए अपनी सभाके सभापतिके रूपमें चतुर लोकपाल यम बैठे होते हैं। यमदूत उन्हें सूचना देकर अपने साथ लाये हुए प्राणीको दिखाते हैं ।।

पूजयन् दण्डयन् कांश्चित् तेषां शृण्वन् शुभाशुभम् । व्यावृतो बहुसाहस्रैस्तत्रास्ते सततं यमः ।। यमराज कई सहस्र सदस्योंसे घिरे हुए अपनी सभामें विराजमान होते हैं। वे वहाँ आये हुए प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मोंका ब्यौरेवार वर्णन सुनकर उनमेंसे किन्हींका आदर करते हैं और किन्हींको दण्ड देते हैं ।।

गतानां तु यमस्तेषामुत्तमानभिपूजयेत् । अभिसंगृह्य विधिवत् पृष्ट्वा स्वागतकौशलम् ॥ यमलोकमें गये हुए प्राणियोंमेंसे जो उत्तम होते हैं, उन्हें विधिपूर्वक अपनाकर स्वागतपूर्वक उनका कुशल-समाचार पूछकर यमराज उनकी पूजा करते हैं ॥ प्रस्तुत्य तत् कृतं तेषां लोकं संदिशते यमः । यमेनैवमनुज्ञाता यान्ति पश्चात् त्रिविष्टपम् ॥ उनके सत्कर्मोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके यमराज उन्हें यह संदेश देते हैं कि ‘आपको अमुक पुण्य लोकमें जाना है।’ यमराजकी ऐसी आज्ञा पानेके पश्चात् वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ मध्यमानां यमस्तेषां श्रुत्वा कर्म यथातथम् । जायन्तां मानुषेष्वेव इति संदिशते च तान् ॥ मध्यम कोटिके पुरुषोंके कर्मोंका यथावत् वर्णन सुनकर यमराज उनके लिये यह आज्ञा देते हैं कि ‘ये लोग फिर मनुष्योंमें ही जन्म लें’ ॥ अधमान् पाशसंयुक्तान् यमो नावेक्षते गतान् । यमस्य पुरुषा घोराश्चण्डालसमदर्शनाः ॥ यातनाः प्रापयन्त्येताँल्लोकपालस्य शासनात् ॥ पाशोंमें बँधे हुए जो अधम कोटिके प्राणी आते हैं, यमराज उनकी ओर आँख उठाकर देखते तक नहीं हैं। चाण्डालके समान दिखायी देनेवाले भयंकर यमदूत ही लोकपाल यमकी आज्ञासे उन पापियोंको यातनाके स्थानोंमें ले जाते हैं ॥ भिन्दन्तश्च तुदन्तश्च प्रकर्षन्तो यतस्ततः । क्रोशन्तः पातयन्त्येतान् मिथो गर्तेष्ववाङ्मुखान् ॥ वे उन्हें विदीर्ण किये डालते हैं, भाँति-भाँतिकी पीड़ाएँ देते हैं, जहाँ-तहाँ घसीटकर ले जाते हैं तथा उन्हें कोसते हुए नीचे मुँह करके नरकके गड्ढोंमें गिरा देते हैं ॥ संयामिनयः शिलाश्चैषां पतन्ति शिरसि प्रिये । अयोमुखाः कङ्कबला भक्षयन्ति सुदारुणाः ॥ प्रिये! फिर उनके सिरपर ऊपरसे संयामिनी शिलाएँ गिरायी जाती हैं तथा लोहेकी-सी चोंचवाले अत्यन्त भयंकर कौए और बगुले उन्हें नोच खाते हैं ॥ असिपत्रवने घोरे चारयन्ति तथा परान् । तीक्ष्णदंष्ट्रास्तथा श्वानः कांश्चित् तत्र ह्यदन्ति वै ॥ दूसरे पापियोंको यमदूत घोर असिपत्रवनमें घुमाते हैं। वहाँ तीखी दाढ़ोंवाले कुत्ते कुछ पापियोंको काट खाते हैं ॥ तत्र वैतरणी नाम नदी ग्राहसमाकुला । दुष्प्रवेशा च घोरा च मूत्रशोणितवाहिनी ॥

यमलोकमें वैतरणी नामवाली एक नदी है, जो पानीकी जगह मूत और रक्त बहाती है। ग्राहोंसे भरी होनेके कारण वह बड़ी भयंकर जान पड़ती है। उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है ।।

तस्यां सम्मज्जयन्त्येते तृषितान् पाययन्ति तान् ।
आरोपयन्ति वै कांश्चित् तत्र कण्टकशाल्मलीम् ।।
यमदूत इन पापियोंको उसी नदीमें डुबो देते हैं। प्यासे प्राणियोंको उस वैतरणीका ही जल पिलाते हैं। वहाँ कितने ही काँटेदार सेमलके वृक्ष हैं। यमदूत कुछ पापियोंको उन्हीं वृक्षोंपर चढ़ाते हैं ।।

यन्त्रचक्रेषु तिलवत् पीड्यन्ते तत्र केचन ।
अङ्गारेषु च दह्यन्ते तथा दुष्कृतकारिणः ।।
जैसे कोल्हूमें तिल पेरे जाते हैं, उसी प्रकार कितने ही पापी मशीनके चक्कोंमें पेरे जाते हैं। कितने ही अंगारोंमें डालकर जलाये जाते हैं ।।

कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते पच्यन्ते सिकतासु वै ।
पाट्यन्ते तरुवच्छस्त्रैः पापिनः क्रकचादिभिः ।।
कुछ कुम्भीपाकोंमें पकाये जाते हैं, कुछ तपी हुई बालुकाओंमें भूने जाते हैं और कितने ही पापी आरे आदि शस्त्रोंद्वारा वृक्षकी भाँति चीरे जाते हैं ।।

भिद्यन्ते भागशः शूलैस्तुद्यन्ते सूक्ष्मसूचिभिः ।।
एवं त्वया कृतो दोषस्तदर्थं दण्डनं त्विति ।
वाचैवं घोषयन्ति स्म दण्डमानाः समन्ततः ।।
कितनोंके शूलोंद्वारा टुकड़े-टुकड़े कर दिये जाते हैं। कुछ पापियोंके शरीरोंमें महीन सूइयाँ चुभोयी जाती हैं। दण्ड देनेवाले यमदूत अपनी वाणीद्वारा सब ओर यह घोषित करते रहते हैं कि तूने अमुक पाप किया है, जिसके लिये यह दण्ड तुझे मिल रहा है ।।

एवं ते यातनां प्राप्य शरीरैर्यातनाशयैः ।
प्रसहन्तश्च तद् दुःखं स्मरन्तः स्वापराधजम् ।।
क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च न मुच्यन्ते कथंचन ।
स्मरन्तस्तत्र तप्यन्ते पापमात्मकृतं भृशम् ।।
इस प्रकार यातनाधीन शरीरोंद्वारा यातना पाकर नारकी जीव उसके दुःखको सहते और अपने पापको स्मरण करते हुए चीखते-चिल्लाते एवं रोते रहते हैं, किंतु किसी तरह उस यातनासे छुटकारा नहीं पाते हैं। अपने किये हुए पापको याद करके वे अत्यन्त संतप्त हो उठते हैं ।।

एवं बहुविधा दण्डा भुज्यन्ते पापकारिभिः ।
यातनाभिश्च पच्यन्ते नरकेषु पुनः पुनः ।।

इस प्रकार पापाचारी प्राणियोंको नाना प्रकारके दण्ड भोगने पड़ते हैं। वे बारंबार नरकोंमें विविध यातनाओंद्वारा पकाये जाते हैं॥ अपरे यातना भुक्त्वा मुच्यन्ते तत्र किल्बिषात् ।। पापदोषक्षयकरा यातना संस्मृता नृणाम् । बहु तप्तं यथा लोहममलं तत् तथा भवेत् ॥ दूसरे लोग वहाँ यातनाएँ भोगकर उस पापसे मुक्त हो जाते हैं। जैसे अधिक तपाया हुआ लोहा निर्मल एवं शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्योंको जो नरकोंमें यातनाएँ प्राप्त होती हैं, वे उनके पाप-दोषका विनाश करनेवाली मानी गयी हैं॥

उमोवाच

भगवंस्ते कथं तत्र दण्ड्यन्ते नरकेषु वै । कति ते नरका घोराः कीदृशास्ते महेश्वर ॥ उमाने पूछा— भगवन्! महेश्वर! नरकोंमें पापियोंको किस प्रकार दण्ड दिया जाता है? वे भयानक नरक कितने और कैसे हैं? ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु भामिनि तत् सर्वं पञ्चैते नरकाः स्मृताः । भूमेरधस्ताद् विहिता घोरा दुष्कृतकर्मणाम् ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— भामिनि! तुमने जो पूछा है, वह सब सुनो। पापाचारी प्राणियोंके लिये भूमिके नीचे जो भयानक नरक बनाये गये हैं, वे मुख्यतः पाँच माने गये हैं॥ प्रथमं रौरवं नाम शतयोजनमायतम् । तावत्प्रमाणविस्तीर्णं तामसं पापपीडितम् ॥ उनमें पहला रौरव नामक नरक है, जिसकी लंबाई सौ योजन है। उसकी चौड़ाई भी उतनी ही है। वह तमोमय नरक पापके कारण प्राप्त होनेवाली पीड़ाओंसे परिपूर्ण है॥ भृशं दुर्गन्धि परुषं कृमिभिर्दारुणैर्युतम् । अतिघोरमनिर्देश्यं प्रतिकूलं ततस्ततः ॥ उससे बड़ी दुर्गन्ध निकलती है, वह कठोर नरक क्रूर स्वभाववाले कीटोंसे भरा हुआ है। वह अत्यन्त घोर, अवर्णनीय और सर्वथा प्रतिकूल है॥ ते चिरं तत्र तिष्ठन्ति न तत्र शयनासने । कृमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च विष्ठागन्धसमायुताः ॥ वे पापी उस नरकमें सुदीर्घकालतक खड़े रहते हैं। वहाँ सोने और बैठनेकी सुविधा नहीं है। विष्ठाकी दुर्गन्धमें सने हुए उन पापियोंको वहाँके कीड़े खाते रहते हैं॥ एवं प्रमाणमुद्विग्ना यावत् तिष्ठन्ति तत्र ते । यातनाभ्यो दशगुणं नरके दुःखमिष्यते ॥

ऐसे विशाल नरकमें वे जबतक रहते हैं, उद्विग्न भावसे खड़े रहते हैं। साधारण यातनाओंकी अपेक्षा नरकमें दसगुना दुःख होता है ।। तत्र चात्यन्तिकं दुःखमिष्यते च शुभेक्षणे । क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च वेदनास्तत्र भुञ्जते ।। शुभेक्षणे! वहाँ आत्यन्तिक दुःखकी प्राप्ति होती है। पापी जीव चीखते-चिल्लाते और रोते हुए वहाँकी यातनाएँ भोगते हैं ।। भ्रमन्ति दुःखमोक्षार्थं ज्ञाता कश्चिन्न विद्यते । दुःखस्यान्तरमात्रं तु ज्ञानं वा न च लभ्यते ।। वे दुःखोंसे छुटकारा पानेके लिये चारों ओर चक्कर काटते हैं; परंतु कोई भी उन्हें जाननेवाला वहाँ नहीं होता। उस दुःखमें तनिक भी अन्तर नहीं होता और न उसे छुड़ानेवाला ज्ञान ही उपलब्ध होता है ।। महारौरवसंज्ञं तु द्वितीयं नरकं प्रिये । तस्माद् द्विगुणितं विद्धि माने दुःखे च रौरवात् ।। प्रिये! दूसरे नरकका नाम है महारौरव। वह लंबाई, चौड़ाई और दुःखमें रौरवसे दूना बड़ा है ।। तृतीयं नरकं तत्र कण्टकावनसंज्ञितम् । ततो द्विगुणितं तच्च पूर्वाभ्यां दुःखमानयोः ।। महापातकसंयुक्ता घोरास्तस्मिन् विशन्ति हि ।। वहाँ तीसरा नरक है कण्टकावन, जो दुःख और लंबाई-चौड़ाईमें पहलेके दोनों नरकोंसे दुगुना बड़ा है। उसमें घोर महापातकयुक्त प्राणी प्रवेश करते हैं ।। अग्निकुण्डमिति ख्यातं चतुर्थं नरकं प्रिये । एतद् द्विगुणितं तस्माद् यथानिष्टसुखं तथा ।। ततो दुःखं हि सुमहदमानुषमिति स्मृतम् । भुञ्जते तत्र तत्रैव दुःखं दुष्कृतकारिणः ।। प्रिये! चौथा नरक अग्निकुण्डके नामसे विख्यात है। यह पहलेकी अपेक्षा दूना दुःख देनेवाला है। वहाँ महान् अमानुषिक दुःख भोगने पड़ते हैं। उन सभीमें पापाचारी प्राणी दुःख भोगते हैं ।। पञ्चकष्टमिति ख्यातं नरकं पञ्चमं प्रिये । तत्र दुःखमनिर्देश्यं महाघोरं यथातथम् ।। प्रिये! पाँचवें नरकका नाम पंचकष्ट है। वहाँ जो महाघोर दुःख प्राप्त होता है, उसका यथावत् वर्णन नहीं किया जा सकता ।। पञ्चेन्द्रियैरसह्यत्वात् पञ्चकष्टमिति स्मृतम् । भुञ्जते तत्र तत्रैवं दुःखं दुष्कृतकारिणः ।।

पाँचों इन्द्रियोंसे असह्य होनेके कारण उसका नाम 'पंचकष्ट' है। पापी पुरुष उन-उन नरकोंमें महान् दुःख भोगते हैं ।।
अमानुषार्हजं दुःखं महाभूतैश्च भुज्यते ।
अतिघोरं चिरं कृत्वा महाभूतानि यान्ति तम् ।।
वहाँ बड़े-बड़े जीव चिरकालतक अत्यन्त घोर अमानुषिक दुःख भोगते हैं और महान् भूतोंके समुदाय उस पापी पुरुषका अनुसरण करते हैं ।।
पञ्चकष्टेन हि समं नास्ति दुःखं तथा परम् ।
दुःखस्थानमिति प्राहुः पञ्चकष्टमिति प्रिये ।।
प्रिये! पंचकष्टके समान या उससे बढ़कर दुःख कोई नहीं है। पंचकष्टको समस्त दुःखोंका निवासस्थान बताया गया है ।।
एवं त्वेतेषु तिष्ठन्ति प्राणिनो दुःखभागिनः ।
अन्ये च नरकाः सन्त्यवीचिप्रमुखाः प्रिये ।।
इस प्रकार इन नरकोंमें दुःख भोगनेवाले प्राणी निवास करते हैं। प्रिये! इन नरकोंके सिवा और भी बहुत-से अवीचि आदि नरक हैं।
क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च वेदनार्ता भृशातुराः ।
केचिद् भ्रमन्तश्चेष्टन्ते केचिद् धावन्ति चातुराः ।।
वेदनासे पीड़ित हो अत्यन्त आतुर हुए नरकनिवासी जीव रोते-चिल्लाते रहते हैं। कोई चारों ओर चक्कर काटते हैं, कोई पृथ्वीपर पड़े-पड़े छटपटाते हैं और कोई आतुर होकर दौड़ते रहते हैं ।।
आधावन्तो निवार्यन्ते शूलहस्तैर्यतस्ततः ।
रुजार्दितास्तृषायुक्ताः प्राणिनः पापकारिणः ।।
कोई दौड़ते हुए प्राणी हाथमें त्रिशूल लिये हुए यमदूतोंद्वारा जहाँ-तहाँ रोके जाते हैं। वहाँ पापाचारी जीव रोगोंसे व्यथित और प्याससे पीड़ित रहते हैं ।।
यावत् पूर्वकृतं तावन्न मुच्यन्ते कथंचन ।
कृमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च वेदनार्तास्तृषान्विताः ।।
जबतक पूर्वकृत पापका भोग शेष है, तबतक किसी तरह उन्हें नरकोंसे छुटकारा नहीं मिलता है। उनको कीड़े काटते रहते हैं तथा वे वेदनासे पीड़ित और प्याससे व्याकुल होते हैं ।।
संस्मरन्तः स्वकं पापं कृतमात्मापराधजम् ।
शोचन्तस्तत्र तिष्ठन्ति यावत् पापक्षयं प्रिये ।।
एवं भुक्त्वा तु नरकं मुच्यन्ते पापसंक्षयात् ।।
प्रिये! जबतक सारे पापोंका क्षय नहीं हो जाता तबतक वे अपने ही किये हुए अपराधजनित पापको याद करके वहाँ शोकमग्न होते रहते हैं। इस प्रकार नरक भोगकर

पापोंका नाश करनेके पश्चात् वे उस कष्टसे मुक्त हो जाते हैं ।।

उमोवाच

भगवन् कति कालं ते तिष्ठन्ति नरकेषु वै ।
एतद् वेदितुमिच्छामि तन्मे ब्रूहि महेश्वर ।।
उमाने पूछा— भगवन्! महेश्वर! पापी जीव कितने समयतक नरकोंमें रहते हैं, यह मैं जानना चाहती हूँ? अतः मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

शतवर्षसहस्राणामादिं कृत्वा हि जन्तवः ।
तिष्ठन्ति नरकावासाः प्रलयान्तमिति स्थितिः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— प्राणी अपने पापोंके अनुसार एक लाख वर्षोंसे लेकर महाप्रलयकालतक नरकोंमें निवास करते हैं, ऐसा शास्त्रोंका निश्चय है ।।

उमोवाच

भगवंस्तेषु के तत्र तिष्ठन्तीति वद प्रभो ।।
उमाने पूछा— भगवन्! प्रभो! उन नरकोंमें किस-किस तरहके पापी निवास करते हैं? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

रौरवे शतसाहस्रं वर्षाणामिति संस्थितिः ।
मानुषघ्नाः कृतघ्नाश्च तथैवानृतवादिनः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— रौरव नरकमें एक लाख वर्षोंतक रहनेका नियम है। उसमें मनुष्योंकी हत्या करनेवाले, कृतघ्न तथा असत्यवादी मनुष्य जाते हैं ।।

द्वितीये द्विगुणं कालं पच्यन्ते तादृशा नराः ।
महापातकयुक्तास्तु तृतीये दुःखमाप्नुयुः ।।
दूसरे नरक (महारौरव)-में वैसे ही पापी मनुष्य दूने काल (दो लाख वर्ष) तक पकाये जाते हैं। तीसरे (कण्टकावन)-में महापातकी मनुष्य कष्ट भोगते हैं ।।

चतुर्थे परितप्यन्ते यावद् युगविपर्ययः ।।
चौथे नरकमें पापी लोग तबतक संतप्त होते हैं, जबतक कि महाप्रलय नहीं हो जाता ।।

सहन्तस्तादृशं घोरं पञ्चकष्टे तु यादृशम् ।
तत्रास्य चिरदुःखस्य ह्यधोऽन्यान् विद्धि मानुषान् ।।
पंचकष्ट नरकमें जैसा घोर दुःख होता है, उसको भी यहाँ सहन करते हैं। दीर्घकालतक दुःख देनेवाले इस घोर नरकसे नीचे मानवसम्बन्धी अन्य नरकोंकी स्थिति समझो ।।

एवं ते नरकान् भुक्त्वा तत्र क्षपितकल्मषाः ।
नरकेभ्यो विमुक्ताश्च जायन्ते कृमिजातियु ।।
इस प्रकार नरकोंका कष्ट भोग लेनेके बाद पाप कट जानेपर मनुष्य उन नरकोंसे छूटकर कीटयोनिमें जन्म लेते हैं ।।

उद्भिदजेषु वा केचिदत्रापि क्षीणकल्मषाः ।
पुनरेव प्रजायन्ते मृगपक्षिषु शोभने ।।
मृगपक्षिषु तद् भुक्त्वा लभन्ते मानुषं पदम् ।।
शोभने! अथवा कोई-कोई उद्भिज्ज योनिमें जन्म लेते हैं। उसमें भी कुछ पापोंका क्षय होनेके बाद वे पुनः पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म पाते हैं। वहाँ कर्मफल भोग लेनेपर उन्हें मनुष्यशरीरकी प्राप्ति होती है ।।

उमोवाच

नानाजातिषु केनैव जायन्ते पापकारिणः ।।
उमाने पूछा—प्रभो! पापाचारी मनुष्य किस प्रकारसे नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेते हैं? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि यत् त्वमिच्छसि शोभने ।
सर्वदाऽऽत्मा कर्मवशो नानाजातिषु जायते ।।
श्रीमहेश्वरने कहा—शोभने! तुम जो चाहती हो, उसे बता रहा हूँ। जीवात्मा सदा कर्मके अधीन होकर नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेता है ।।

यश्च मांसप्रियो नित्यं काकगृध्रान् स संस्पृशेत् ।
सुरापः सततं मर्त्यः सूकरत्वं व्रजेद् ध्रुवम् ।।
जो प्रतिदिन मांसके लिये लालायित रहता है, वह कौओं और गीधोंकी योनिमें जन्म लेता है। सदा शराब पीनेवाला मनुष्य निश्चय ही सूअर होता है ।।

अभक्ष्यभक्षणो मर्त्यः काकजातिषु जायते ।
आत्मघ्नो यो नरः कोपात् प्रेतजातिषु तिष्ठति ।।
अभक्ष्य भक्षण करनेवाला मनुष्य कौएके कुलमें उत्पन्न होता है तथा क्रोधपूर्वक आत्महत्या करनेवाला पुरुष प्रेतयोनिमें पड़ा रहता है ।।

पैशुन्यात् परिवादाच्च कुक्कुटत्वमवाप्नुयात् ।
नास्तिकश्चैव यो मूर्खो मृगजातिं स गच्छति ।।
दूसरोंकी चुगली और निन्दा करनेसे मुर्गेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। जो मूर्ख नास्तिक होता है, वह मृगजातिमें जन्म ग्रहण करता है ।।

हिंसाविहारस्तु नरः कृमिकीटेषु जायते ।

अतिमानयुतो नित्यं प्रेत्य गर्दभतां व्रजेत् ।।
हिंसा या शिकारके लिये भ्रमण करनेवाला मानव कीड़ोंकी योनिमें जन्म लेता है। अत्यन्त अभिमानयुक्त पुरुष सदा मृत्युके पश्चात् गदहेकी योनिमें जन्म पाता है ।।
अगम्यागमनाच्चैव परदारनिषेवणात् ।
मूषिकत्वं व्रजेन्मर्त्यो नास्ति तत्र विचारणा ।।
अगम्या-गमन और परस्त्रीसेवन करनेसे मनुष्य चूहा होता है, इसमें शंका करनेकी आवश्यकता नहीं है ।।
कृतघ्नो मित्रघाती च शृगालवृकजातिषु ।
कृतघ्नः पुत्रघाती च स्थावरेष्वथ तिष्ठति ।।
कृतघ्न और मित्रघाती मनुष्य सियार और भेड़ियोंकी योनिमें जन्म लेता है। दूसरोंके किये हुए उपकारको न माननेवाला और पुत्रघाती मनुष्य स्थावरयोनिमें जन्म लेता है ।।
एवमाद्यशुभं कृत्वा नरा निरयगामिनः ।
तां तां योनिं प्रपद्यन्ते स्वकृतस्यैव कारणात् ।।
इत्यादि प्रकारके अशुभ कर्म करके मनुष्य नरकगामी होते हैं और अपनी ही करनीके कारण पूर्वोक्त भिन्न-भिन्न योनिमें जन्म ग्रहण करते हैं ।।
एवं जातिषु निर्देश्याः प्राणिनः पापकारिणः ।
कथंचित् पुनरुत्पद्य लभन्ते मानुषं पदम् ।।
इसी तरह विभिन्न जातियोंमें जन्म लेनेवाले पापाचारी प्राणियोंका निर्देश करना चाहिये। ये किसी तरह उन योनियोंसे छूटकर जब पुनः जन्म लेते हैं, तब मनुष्यका पद पाते हैं ।।
बहुशश्चाग्निसंक्रान्तं लोहं शुचिमयं यथा ।
बहुदुःखाभिसंतप्तस्तथाऽऽत्मा शोध्यते बलात् ।।
तस्मात् सुदुर्लभं चेति विद्धि जन्मसु मानुषम् ।।
जैसे लोहेको बार-बार आगमें तपानेसे वह शुद्ध होता है, उसी प्रकार बहुत दुःखसे संतप्त हुआ जीवात्मा बलात् शुद्ध हो जाता है। अतः सभी जन्मोंमें मानव-जन्मको अत्यन्त दुर्लभ समझो ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ,

⬅ विषय-सूची (TOC)

[शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं

मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ,

जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा,

सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका

माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध

प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]

उमोवाच

श्रोतुं भूयोऽहमिच्छामि प्रजानां हितकारणात् ।

शुभाशुभमिति प्रोक्तं कर्म स्वं स्वं समासतः ।।

उमाने पूछा— भगवन्! अब मैं पुनः प्रजावर्गके हितके लिये शुभ और अशुभ कहे

जानेवाले अपने-अपने कर्मका संक्षेपसे वर्णन सुनना चाहती हूँ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि तत् सर्वं शृणु शोभने ।

सुकृतं दुष्कृतं चेति द्विविधं कर्मविस्तरम् ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—शोभने! वह सब मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो। जहाँतक कर्मोंका

विस्तार है, उसे दो भागोंमें बाँटा जा सकता है। पहला भाग सुकृत (पुण्य) और दूसरा

दुष्कृत (पाप) ।।

तयोर्यद् दुष्कृतं कर्म तच्च संजायते त्रिधा ।

मनसा कर्मणा वाचा बुद्धिमोहसमुद्भवत् ।।

उन दोनोंमें जो दुष्कृत कर्म है, वह तीन प्रकारका होता है। एक मनसे, दूसरा क्रियासे

और तीसरा वाणीसे होनेवाला दुष्कर्म है। बुद्धिमें मोहका प्रादुर्भाव होनेसे ही ये पाप बनते

हैं ।।

मनःपूर्वं तु वा कर्म वर्तते वाङ्मयं ततः ।

जायते वै क्रियायोगमनु चेष्टाक्रमः प्रिये ।।

प्रिये! पहले मनके द्वारा कर्मका चिन्तन होता है, फिर वाणीद्वारा उसे प्रकाशमें लाया

जाता है। तदनन्तर क्रियाद्वारा उसे सम्पन्न किया जाता है। इसके साथ चेष्टाका क्रम चलता

रहता है ।।

अभिद्रोहोऽभ्यसूया च परार्थेषु च स्पृहा ।

धर्मकार्ये यदाश्रद्धा पापकर्माणि हर्षणम् ।।

एवमाद्यशुभं कर्म मनसा पापमुच्यते ।

अभिद्रोह, असूया, पराये अर्थकी अभिलाषा—ये मानसिक अशुभ कर्म हैं। जब धर्म-

कार्यमें अश्रद्धा हो, पाप-कर्ममें हर्ष और उत्साह बढ़े तो इस तरहके अशुभ कर्म मानसिक

पाप कहलाते हैं ।। अनृतं यच्च परुषमबद्धं यच्च शंकरि । असत्यं परिवादश्च पापमेतत् तु वाङ्मयम् ।। कल्याण करनेवाली देवि! जो झूठ, कठोर तथा असम्बद्ध वचन बोला जाता है, असत्य भाषण तथा दूसरोंकी निन्दा की जाती है—यह सब वाणीसे होनेवाला पाप है ।। अगम्यागमनं चैव परदारनिषेवणम् । वधबन्धपरिक्लेशैः परप्राणोपतापनम् ।। चौर्यं परेषां द्रव्याणां हरणं नाशनं तथा । अभक्ष्यभक्षणं चैव व्यसनेष्वभिषङ्गता ।। दर्पात् स्तम्भाभिमानाच्च परेषामुपतापनम् । अकार्याणां च करणमशौचं पानसेवनम् ।। दौःशील्यं पापसम्पर्के साहाय्यं पापकर्मणि । अधर्म्यमयशस्यं च कार्यं तस्य निषेवणम् ।। एवमाद्यशुभं चान्यच्छारीरं पापमुच्यते ।। अगम्या स्त्रीके साथ समागम, परायी स्त्रीका सेवन, प्राणियोंका वध, बन्धन तथा नाना प्रकारके क्लेशोंद्वारा दूसरे प्राणियोंको सताना, पराये धनकी चोरी, अपहरण तथा नाश करना, अभक्ष्य पदार्थोंका भक्षण, दुर्व्यसनोंमें आसक्ति, दर्प, उद्दण्डता और अभिमानसे दूसरोंको सताना, न करनेयोग्य काम करना, अपवित्र वस्तुको पीना अथवा उसका सेवन करना, पापियोंके सम्पर्कमें रहकर दुराचारी होना, पापकर्ममें सहायता करना, अधर्म और अपयश बढ़ानेवाले कार्योंको अपनाना इत्यादि जो दूसरे-दूसरे अशुभ कर्म हैं, वे शारीरिक पाप कहलाते हैं ।। मानसाद् वाङ्मयं पापं विशिष्टमिति लक्ष्यते । वाङ्मयादपि वै पापाच्छारीरं गण्यते बहु ।। मानस पापसे वाणीका पाप बढ़कर समझा जाता है। वाचिक पापसे शारीरिक पापको अधिक गिना जाता है ।। एवं पापयुतं कर्म त्रिविधं पातयेन्नरम् । परोपतापजननमत्यन्तं पातकं स्मृतम् ।। इस प्रकार जो तीन तरहका पापकर्म है, वह मनुष्यको नीचे गिराता है। दूसरोंको संताप देना अत्यन्त पातक माना गया है ।। त्रिविधं तत् कृतं पापं कर्तारं पापकं नयेत् । पातकं चापि यत् कर्म कर्मणा बुद्धिपूर्वकम् ।। सापदेशमवश्यं तु कर्तव्यमिति तत् कृतम् । कथंचित् तत् कृतमपि कर्ता तेन न लिप्यते ।।

अपना किया हुआ त्रिविध पाप कर्ताको पापमय योनिमें ले जाता है। पातकरूप कर्म भी यदि बुद्धि-पूर्वक किसीके प्राण बचाने आदिके उद्देश्यसे अवश्य-कर्तव्य मानकर क्रिया (शरीर) द्वारा किसी प्रकार किया गया हो तो उससे कर्ता लिप्त नहीं होता ।।

उमोवाच भगवन् पापकं कर्म यथा कृत्वा न लिप्यते ।। उमाने पूछा—भगवन्! किस तरह पापकर्म करके मनुष्य उससे लिप्त नहीं होता? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच यो नरोऽनपराधी च स्वात्मप्राणस्य रक्षणात् । शत्रुमुद्यतशस्त्रं वा पूर्वं तेन हतोऽपि वा ।। प्रतिहन्यान्नरो हिंस्यान्न स पापेन लिप्यते । श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो निरपराध मनुष्य शस्त्र उठाकर मारनेके लिये आये हुए शत्रुको पहले उसीके द्वारा आघात होनेपर अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये उसपर बदलेमें प्रहार करे और मार डाले, वह पापसे लिप्त नहीं होता ।।

चोरादधिकसंत्रस्तस्तत्प्रतीकारचेष्टया । यः प्रजघ्नन् नरो हन्यान्न स पापेन लिप्यते ।। जो चोरसे अधिक भयभीत हो उससे बदला लेनेकी चेष्टा करते हुए उसपर प्रहार करता और उसे मार डालता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता ।।

ग्रामार्थं भर्तृपिण्डार्थं दीनानुग्रहकारणात् । वधबन्धपरिक्लेशान् कुर्वन् पापात् प्रमुच्यते ।। जो ग्रामरक्षाके लिये, स्वामीके अन्नका बदला चुकानेके लिये अथवा दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करके किसी शत्रुका वध करता या उसे बन्धनमें डालकर क्लेश पहुँचाता है, वह भी पापसे मुक्त हो जाता है ।।

दुर्भिक्षे चात्मवृत्त्यर्थमेकायनगतस्तथा । अकार्यं वाप्यभक्ष्यं वा कृत्वा पापान्न लिप्यते ।। जो अकालमें अपनी जीविका चलानेके लिये तथा दूसरा कोई मार्ग न रह जानेपर अकार्य या अभक्ष्य भक्षण करता है, वह उसके पापसे लिप्त नहीं होता ।।

केचिद्धसन्ति तत् पीत्वा प्रवदन्ति तथा परे । नृत्यन्ति मुदिताः केचिद् गायन्ति च शुभाशुभान् ।। (अब मदिरा पीनेके दोष बताता हूँ) मदिरा पीने-वाले उसे पीकर नशेमें अट्टहास करते हैं, अंट-संट बातें बकते हैं, कितने ही प्रसन्न होकर नाचते हैं और भले-बुरे गीत गाते हैं ।।

कलिं ते कुर्वतेऽभीक्ष्णं प्रहरन्ति परस्परम् । क्वचिद् धावन्ति सहसा प्रस्खलन्ति पतन्ति च ।।

वे आपसमें इच्छानुसार कलह करते और एक दूसरेको मारते-पीटते हैं। कभी सहसा दौड़ पड़ते हैं, कभी लड़खड़ाते और गिरते हैं ।।

अयुक्तं बहु भाषन्ते यत्र क्वचन शोभने ।
नग्ना विक्षिप्य गात्राणि नष्टज्ञाना इवासते ।।
शोभने! वे जहाँ कहीं भी अनुचित बातें बकने लगते हैं और कभी नंग-धड़ंग हो हाथ-पैर पटकते हुए अचेत-से हो जाते हैं ।।

एवं बहुविधान् भावान् कुर्वन्ति भ्रान्तचेतनाः ।
ये पिबन्ति महामोहं पानं पापयुता नराः ।।
इस प्रकार भ्रान्तचित्त होकर वे नाना प्रकारके भाव प्रकट करते हैं। जो महामोहमें डालनेवाली मदिरा पीते हैं, वे मनुष्य पापी होते हैं ।।

धृतिं लज्जां च बुद्धिं च पानं पीतं प्रणाशयेत् ।
तस्मान्नराः सम्भवन्ति निर्लज्जा निरपत्रपाः ।।
पी हुई मदिरा मनुष्यके धैर्य, लज्जा और बुद्धिको नष्ट कर देती है। इससे मनुष्य निर्लज्ज और बेहया हो जाते हैं ।।

पानपस्तु सुरां पीत्वा तदा बुद्धिप्रणाशनात् ।
कार्याकार्यस्य चाज्ञानाद् यथेष्टकरणात् स्वयम् ।।
विदुषामविधेयत्वात् पापमेवाधिपद्यते ।।
शराब पीनेवाला मनुष्य उसे पीकर बुद्धिका नाश हो जानेसे कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान न रह जानेसे, इच्छानुसार कार्य करनेसे तथा विद्वानोंकी आज्ञाके अधीन न रहनेसे पापको ही प्राप्त होता है ।।

परिभूतो भवेल्लोके मद्यपो मित्रभेदकः ।
सर्वकालमशुद्धश्च सर्वभक्षस्तथा भवेत् ।।
मदिरा पीनेवाला पुरुष जगत्में अपमानित होता है। मित्रोंमें फूट डालता है, सब कुछ खाता और हर समय अशुद्ध रहता है ।।

विनष्टो ज्ञानवृद्धेभ्यः सततं कलिभावगः ।
परुषं कटुकं घोरं वाक्यं वदति सर्वशः ।।
वह स्वयं हर प्रकारसे नष्ट होकर विद्वान् विवेकी पुरुषोंसे झगड़ा किया करता है। सर्वथा रूखा, कड़वा और भयंकर वचन बोलता रहता है ।।

गुरूनतिवदेन्मत्तः परदारान् प्रधर्षयेत् ।
संविदं कुरुते शौण्डैर्न शृणोति हितं क्वचित् ।।
वह मतवाला होकर गुरुजनोंसे बहकी-बहकी बातें करता है, परायी स्त्रियोंसे बलात्कार करता है, धूर्तों और जुआरियोंके साथ बैठकर सलाह करता है और कभी किसीकी कही हुई हितकर बात भी नहीं सुनता है ।।

एवं बहुविधा दोषाः पानपे सन्ति शोभने ।
केवलं नरकं यान्ति नास्ति तत्र विचारणा ॥
शोभने! इस प्रकार मदिरा पीनेवालेमें बहुत-से दोष हैं। वे केवल नरकमें जाते हैं, इस विषयमें कोई विचार करनेकी बात नहीं है ॥
तस्मात् तद् वर्जितं सद्भिः पानमात्महितैषिभिः ।
यदि पानं न वर्जेरन् सन्तश्चारित्रकारणात् ॥
भवेदेतज्जगत् सर्वममर्यादं च निष्क्रियम् ॥
इसलिये अपना हित चाहनेवाले सत्पुरुषोंने मदिरा-पानका सर्वथा त्याग किया है। यदि सदाचारकी रक्षाके लिये सत्पुरुष मदिरा पीना न छोड़ें तो यह सारा जगत् मर्यादारहित और अकर्मण्य हो जाय (यह शरीर-सम्बन्धी महापाप है) ॥
तस्माद् बुद्धेर्हि रक्षार्थं सद्भिः पानं विवर्जितम् ।
अतः श्रेष्ठ पुरुषोंने बुद्धिकी रक्षाके लिये मद्यपानको त्याग दिया है ॥
विधानं सुकृतस्यापि भूयः शृणु शुचिस्मिते ।
प्रोच्यते तत् त्रिधा देवि सुकृतं च समासतः ॥
शुचिस्मिते! अब पुण्यका भी विधान सुनो। देवि! थोड़ेमें तीन प्रकारका पुण्य भी बताया गया है ॥
त्रैविध्यदोषोपरमे यस्तु दोषव्यपेक्षया ।
स हि प्राप्नोति सकलं सर्वदुष्कृतवर्जनात् ॥
मानसिक, वाचिक और कायिक तीनों दोषोंकी निवृत्ति हो जानेपर जो दोषकी उपेक्षा करके सम्पूर्ण दुष्कर्मोंका त्याग कर देता है, वही समस्त शुभ कर्मोंका फल पाता है ॥
प्रथमं वर्जयेद् दोषान् युगपत् पृथगेव वा ।
तथा धर्ममवाप्नोति दोषत्यागो हि दुष्करः ॥
पहले सब दोषोंको एक साथ या बारी-बारीसे त्याग देना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यको धर्माचरणका फल प्राप्त होता है; क्योंकि दोषोंका परित्याग करना बहुत ही कठिन है ॥
दोषसाकल्यसंत्यागान्मुनिर्भवति मानवः ।।
सौकर्यं पश्य धर्मस्य कार्यारम्भादृतेऽपि च ।
आत्मोपलब्धोपरमाल्लभन्ते सुकृतं परम् ।।
समस्त दोषोंका त्याग कर देनेसे मनुष्य मुनि हो जाता है। देखो, धर्म करनेमें कितनी सुविधा या सुगमता है कि कोई कार्य किये बिना ही अपनेको प्राप्त हुए दोषोंका त्याग कर देनेमात्रसे मनुष्य परम पुण्य प्राप्त कर लेते हैं ॥
अहो नृशंसाः पच्यन्ते मानुषाः स्वल्पबुद्धयः ।
ये तादृशं न बुध्यन्ते आत्माधीनं च निर्वृताः ॥

दुष्कृतत्यागमात्रेण पदमूर्ध्वं हि लभ्यते ।। अहो! अल्पबुद्धि मानव कैसे क्रूर हैं कि पाप कर्म करके अपने-आपको नरककी आगमें पकाते हैं। वे संतोषपूर्वक यह नहीं समझ पाते कि वैसा पुण्यकर्म सर्वथा अपने अधीन है। दुष्कर्मोंका त्याग करनेमात्रसे ऊर्ध्वपद (स्वर्गलोक) की प्राप्ति होती है ।। पापभीरुत्वमात्रेण दोषाणां परिवर्जनात् । सुशोभनो भवेद् देवि ऋजुधर्मव्यपेक्षया ।। देवि! पापसे डरने, दोषोंको त्यागने और निष्कपट धर्मकी अपेक्षा रखनेसे मनुष्य उत्तम परिणामका भागी होता है ।। श्रुत्वा च बुद्धसंयोगादिन्द्रियाणां च निग्रहात् । संतोषाच्च धृतेश्चैव शक्यते दोषवर्जनम् ।। ज्ञानी पुरुषोंके सम्पर्कसे धर्मोपदेश सुनकर इन्द्रियोंका निग्रह करने तथा संतोष और धैर्य धारण करनेसे दोषोंका परित्याग किया जा सकता है ।। तदेव धर्ममित्याहुर्दोषसंयमनं प्रिये । यमधर्मेण धर्मोऽस्ति नान्यः शुभतरः प्रिये ।। प्रिये! दोष-संयमको धर्म कहा गया है। संयमरूप धर्मका पालन करनेसे जो धर्म होता है, वही सबसे अधिक कल्याणकारी है, दूसरा नहीं ।। यमधर्मेण यतयः प्राप्नुवन्त्युत्तमां गतिम् ।। ईश्वराणां प्रभवतां दरिद्राणां च वै नृणाम् । सफलो दोषसंत्यागो दानादपि शुभादपि ।। संयमधर्मके पालनसे यतिजन उत्तम गतिको पाते हैं। प्रभावशाली धनियोंके दान करनेसे और दरिद्र मनुष्योंके शुभकर्मोंके आचरणसे भी दोषोंका त्याग क्षणिक फल देनेवाला है ।। तपो दानं महादेवि दोषमल्पं हि निर्हरेत् । सुकृतं यामिकं चोक्तं वक्ष्ये निरुपसाधनम् ।। महादेवि! तप और दान अल्प दोषको हर लेते हैं। यहाँ संयमसम्बन्धी सुकृत बताया गया। अब सहायक साधनोंके बिना होनेवाले सुकृतका वर्णन करूँगा ।। सुखाभिसंधिर्लोकानां सत्यं शौचमथार्जवम् । व्रतोपवासः प्रीतिश्च ब्रह्मचर्यं दमः शमः ।। एवमादि शुभं कर्म सुकृतं नियमाश्रितम् । शृणु तेषां विशेषांश्च कीर्तयिष्यामि भामिनि ।। जगत्के लोगोंके सुखी होनेकी कामना, सत्य, शौच, सरलता, व्रतसम्बन्धी उपवास, प्रीति, ब्रह्मचर्य, दम और शम—इत्यादि शुभ कर्म नियमोंपर अवलम्बित सुकृत है। भामिनि! अब उनके विशेष भेदोंका वर्णन करूँगा, सुनो ।।

सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव ।
नास्ति सत्यात् परं दानं नास्ति सत्यात् परं तपः ॥
जैसे नौका या जहाज समुद्रसे पार होनेका साधन है, उसी प्रकार सत्य स्वर्गलोकमें पहुँचनेके लिये सीढ़ीका काम देता है। सत्यसे बढ़कर दान नहीं है और सत्यसे बढ़कर तप नहीं है ॥

यथा श्रुतं यथा दृष्टमात्मना यद् यथा कृतम् ।
तथा तस्याविकारेण वचनं सत्यलक्षणम् ॥
जो जैसा सुना गया हो, जैसा देखा गया हो और अपने द्वारा जैसा किया गया हो, उसको बिना किसी परिवर्तनके वाणीद्वारा प्रकट करना सत्यका लक्षण है ॥

यच्छलेनाभिसंयुक्तं सत्यरूपं मृषैव तत् ।
सत्यमेव प्रवक्तव्यं पारावर्यं विजानता ॥
जो सत्य छलसे युक्त हो, वह मिथ्या ही है। अतः सत्यासत्यके भले-बुरे परिणामको जाननेवाले पुरुषको चाहिये कि वह सदा सत्य ही बोले ॥

दीर्घायुश्च भवेत् सत्यात् कुलसंतानपालकः ।
लोकसंस्थितिपालश्च भवेत् सत्येन मानवः ॥
सत्यके पालनसे मनुष्य दीर्घायु होता है। सत्यसे कुल-परम्पराका पालक होता है और सत्यका आश्रय लेनेसे वह लोक-मर्यादाका संरक्षक होता है ॥

उमोवाच

कथं संधारयन् मर्त्यो व्रतं शुभमवाप्नुयात् ॥
**उमाने पूछा—**भगवन्! मनुष्य किस प्रकार व्रत धारण करके शुभ फलको पाता है? ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

पूर्वमुक्तं तु यत् पापं मनोवाक्कायकर्मभिः ।
व्रतवत् तस्य संत्यागस्तपोव्रतमिति स्मृतम् ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! पहले जो मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा होनेवाले पापोंका वर्णन किया गया है, व्रतकी भाँति उनके त्यागका नियम लेना तपोव्रत कहा गया है ॥

शुद्धकायो नरो भूत्वा स्नात्वा तीर्थे यथाविधि ।
पञ्चभूतानि चन्द्रार्कौ संध्ये धर्मयमौ पितॄन् ॥
आत्मनैव तथाऽऽत्मानं निवेद्य व्रतवच्चरेत् ।
मनुष्य तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके शुद्धशरीर हो स्वयं ही अपने आपको पंच महाभूत, चन्द्रमा, सूर्य, दोनों कालकी संध्या, धर्म, यम तथा पितरोंकी सेवामें निवेदन करके व्रत लेकर धर्माचरण करे ॥

व्रतमाममरणाद् वापि कालच्छेदेन वा हरेत् ।।
शाकादिषु व्रतं कुर्यात् तथा पुष्पफलादिषु ।
ब्रह्मचर्यव्रतं कुर्यादुपवासव्रतं तथा ।।
अपने व्रतको मृत्युपर्यन्त निभावे अथवा समयकी सीमा बाँधकर उतने समयतक उसका निर्वाह करे। शाक आदि तथा फल-फूल आदिका आहार करके व्रत करे। उस समय ब्रह्मचर्यका पालन तथा उपवास भी करना चाहिये ।।

एवमन्येषु बहुषु व्रतं कार्यं हितैषिणा ।
व्रतभङ्गो यथा न स्याद् रक्षितव्यं तथा बुधैः ।।
अपना हित चाहनेवाले पुरुषको दुग्ध आदि अन्य बहुत-सी वस्तुओंमेंसे किसी एकका उपयोग करके व्रतका पालन करना चाहिये। विद्वानोंको उचित है कि वे अपने व्रतको भंग न होने दें। सब प्रकारसे उसकी रक्षा करें ।।

व्रतभङ्गे महत् पापमिति विद्धि शुभेक्षणे ।।
औषधार्थं यदज्ञानाद् गुरूणां वचनादपि ।
अनुग्रहार्थं बन्धूनां व्रतभङ्गो न दुष्यते ।।
शुभेक्षणे! तुम यह जान लो कि व्रत भंग करनेसे महान् पाप होता है, परंतु ओषधिके लिये, अनजानमें, गुरुजनोंकी आज्ञासे तथा बन्धुजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये यदि व्रतभंग हो जाय तो वह दूषित नहीं होता ।।

व्रतापवर्गकाले तु दैवब्राह्मणपूजनम् ।
नरेण तु यथावद्धि कार्यसिद्धिं यथाप्नुयात् ।।
व्रतकी समाप्तिके समय मनुष्यको देवताओं और ब्राह्मणोंकी यथावत् पूजा करनी चाहिये। इससे उसे अपने कार्यमें सफलता प्राप्त होती है ।।

उमोवाच
कथं शौचविधिस्तत्र तन्मे शंसितुमर्हसि ।
उमाने पूछा— भगवन्! व्रत ग्रहण करनेके समय शौचाचारका विधान कैसा है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।

श्रीमहेश्वर उवाच
बाह्यमाभ्यन्तरं चेति द्विविधं शौचमिष्यते ।
मानसं सुकृतं यत् तच्छौचमाभ्यन्तरं स्मृतम् ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! शौच दो प्रकारका माना गया है—एक बाह्य शौच, दूसरा आभ्यन्तर शौच। जिसे पहले मानसिक सुकृत बताया गया है, उसीको यहाँ आभ्यन्तर शौच कहा गया है ।।

सदाऽऽहारविशुद्धिश्च कायप्रक्षालनं तु यत् ।

बाह्यशौचं भवेदेतत् तथैवाचमनादिना ।। सदा ही विशुद्ध आहार ग्रहण करना, शरीरको धो-पोंछकर साफ रखना तथा आचमन आदिके द्वारा भी शरीरको शुद्ध बनाये रखना, यह बाह्य शौच है ।। मृच्चैव शुद्धदेशस्था गोशकृन्मूत्रमेव च । द्रव्याणि गन्धयुक्तानि यानि पुष्टिकराणि च ।। एतैः सम्मार्जनैः कायम्भसा च पुनः पुनः । अच्छे स्थानकी मिट्टी, गोबर, गोमूत्र, सुगन्धित द्रव्य तथा पौष्टिक पदार्थ—इन सब वस्तुओंसे मिश्रित जलके द्वारा मार्जन करके शरीरको बारंबार जलसे प्रक्षालित करे ।। अक्षोभ्यं यत् प्रकीर्णं च नित्यस्रोतश्च यज्जलम् ।। प्रायशस्तादृशे मज्जेदन्यथा च विवर्जयेत् ।। जहाँका जल अक्षोभ्य (नहानेसे गँदला न होनेवाला) और फैला हुआ हो, जिसका प्रवाह कभी टूटता न हो। प्रायः ऐसे ही जलमें गोता लगाना चाहिये। अन्यथा उस जलको त्याग देना चाहिये ।। त्रिस्त्रिराचमनं श्रेष्ठं निर्मलैरुद्धृतैर्जलैः । तथा विण्मूत्रयोः शुद्धिर्द्भिर्बहुमृदा भवेत् ।। निर्मल जलको हाथमें लेकर उसके द्वारा तीन-तीन बार आचमन करना श्रेष्ठ माना गया है। मल और मूत्रके स्थानोंकी शुद्धि बहुत-सी मिट्टी लगाकर जलके द्वारा धोनेसे होती है ।। तथैव जलसंशुद्धिर्यत् संशुद्धं तु संस्पृशेत् ।। इसी प्रकार जलकी शुद्धिका भी ध्यान रखना आवश्यक है। जो शुद्ध जल हो उसीका स्पर्श करे—उसीसे हाथ-मुँह धोकर कुल्ला करे और नहाये ।। शकृता भूमिशुद्धिः स्याल्लोहानां भस्मना स्मृतम् । तक्षणं घर्षणं चैव दारूणां विशोधनम् ।। गोबरसे लीपनेपर भूमिकी शुद्धि होती है, राखसे मलनेपर धातुके पात्रोंकी शुद्धि होती है। लकड़ीके बने हुए पात्रोंकी शुद्धि छीलने, काटने और रगड़नेसे होती है ।। दहनं मृन्मयानां च मर्त्यानां कृच्छ्रधारणम् । शेषाणां देवि सर्वेषामातपेन जलेन च ।। ब्राह्मणानां च वाक्येन सदा संशोधनं भवेत् । मिट्टीके पात्रोंकी शुद्धि आगमें जलानेसे होती है, मनुष्योंकी शुद्धि कृच्छ्र सांतपन आदि व्रत धारण करनेसे होती है। देवि! शेष सब वस्तुओंकी शुद्धि सदा धूपमें तपाने, जलके द्वारा धोने और ब्राह्मणोंके वचनसे होती है ।। अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते । एवमापदि संशुद्धिरेवं शौचं विधीयते ।।

जिसका दोष देखा न गया हो ऐसी वस्तुको जलसे धो दिया जाय तो वह शुद्ध हो जाता

है। जिसकी वाणीद्वारा प्रशंसा की जाती है, वह भी शुद्ध ही समझना चाहिये। इसी प्रकार

आपत्तिकालमें शुद्धिकी व्यवस्था है और इसी तरह शौचका विधान है ।।

उमोवाच

आहारशुद्धिस्तु कथं देवदेव महेश्वर ।।

उमाने पूछा—देवदेव! महेश्वर! आहारकी शुद्धि कैसे होती है? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

अमांसमद्यमक्लेद्यमपर्युषितमेव च ।

अतिकट्वम्ललवणहीनं च शुभगन्धि च ।।

कृमिकेशमलैर्हीनं संवृतं शुद्धदर्शनम् ।

एवंविधं सदाऽऽहार्यं देवब्राह्मणसत्कृतम् ।।

श्रेष्ठमित्येव तज्ज्ञेयमन्यथा मन्यतेऽशुभम् ।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जिसमें मांस और मद्य न हो, जो सड़ा हुआ या पसीजा न

हो, बासी न हो, अधिक कड़वा, अधिक खट्टा और अधिक नमकीन न हो, जिससे उत्तम

गन्ध आती हो, जिसमें कीड़े या केश न पड़े हों, जो निर्मल हो, ढका हुआ हो और देखनेमें

भी शुद्ध हो, जिसका देवताओं और ब्राह्मणोंद्वारा सत्कार किया गया हो, ऐसे अन्नको सदा

भोजन करना चाहिये। उसे श्रेष्ठ ही जानना चाहिये। इसके विपरीत जो अन्न है, उसे अशुभ

माना गया है ।।

ग्राम्यादारण्यकैः सिद्धं श्रेष्ठमित्यवधारय ।।

अतिमात्रगृहीतात् तु अल्पदत्तं भवेच्छुचि ।

ग्राम्य अन्नकी अपेक्षा वनमें उत्पन्न होनेवाले पदार्थोंसे बना हुआ अन्न श्रेष्ठ होता है। इस

बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। अधिक-से-अधिक ग्रहण किये हुए अन्नकी अपेक्षा

थोड़ा-सा दिया हुआ अन्न पवित्र होता है ।।

यज्ञशेषं हविःशेषं पितृशेषं च निर्मलम् ।।

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।

यज्ञशेष (देवताओंको अर्पण करनेसे बचा हुआ), हविःशेष (अग्निमें आहुति देनेसे बचा

हुआ) तथा पितृशेष (श्राद्धसे अवशिष्ट) अन्न निर्मल माना गया है। देवि! यह विषय तुम्हें

बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भक्षयन्त्यपरे मांसं वर्जयन्त्यपरे विभो ।

तन्मे वद महादेव भक्ष्याभक्ष्यविनिर्णयम् ।।