भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1297, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1297

इस प्रकार पापाचारी प्राणियोंको नाना प्रकारके दण्ड भोगने पड़ते हैं। वे बारंबार नरकोंमें विविध यातनाओंद्वारा पकाये जाते हैं॥ अपरे यातना भुक्त्वा मुच्यन्ते तत्र किल्बिषात् ।। पापदोषक्षयकरा यातना संस्मृता नृणाम् । बहु तप्तं यथा लोहममलं तत् तथा भवेत् ॥ दूसरे लोग वहाँ यातनाएँ भोगकर उस पापसे मुक्त हो जाते हैं। जैसे अधिक तपाया हुआ लोहा निर्मल एवं शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्योंको जो नरकोंमें यातनाएँ प्राप्त होती हैं, वे उनके पाप-दोषका विनाश करनेवाली मानी गयी हैं॥

उमोवाच

भगवंस्ते कथं तत्र दण्ड्यन्ते नरकेषु वै । कति ते नरका घोराः कीदृशास्ते महेश्वर ॥ उमाने पूछा— भगवन्! महेश्वर! नरकोंमें पापियोंको किस प्रकार दण्ड दिया जाता है? वे भयानक नरक कितने और कैसे हैं? ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु भामिनि तत् सर्वं पञ्चैते नरकाः स्मृताः । भूमेरधस्ताद् विहिता घोरा दुष्कृतकर्मणाम् ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— भामिनि! तुमने जो पूछा है, वह सब सुनो। पापाचारी प्राणियोंके लिये भूमिके नीचे जो भयानक नरक बनाये गये हैं, वे मुख्यतः पाँच माने गये हैं॥ प्रथमं रौरवं नाम शतयोजनमायतम् । तावत्प्रमाणविस्तीर्णं तामसं पापपीडितम् ॥ उनमें पहला रौरव नामक नरक है, जिसकी लंबाई सौ योजन है। उसकी चौड़ाई भी उतनी ही है। वह तमोमय नरक पापके कारण प्राप्त होनेवाली पीड़ाओंसे परिपूर्ण है॥ भृशं दुर्गन्धि परुषं कृमिभिर्दारुणैर्युतम् । अतिघोरमनिर्देश्यं प्रतिकूलं ततस्ततः ॥ उससे बड़ी दुर्गन्ध निकलती है, वह कठोर नरक क्रूर स्वभाववाले कीटोंसे भरा हुआ है। वह अत्यन्त घोर, अवर्णनीय और सर्वथा प्रतिकूल है॥ ते चिरं तत्र तिष्ठन्ति न तत्र शयनासने । कृमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च विष्ठागन्धसमायुताः ॥ वे पापी उस नरकमें सुदीर्घकालतक खड़े रहते हैं। वहाँ सोने और बैठनेकी सुविधा नहीं है। विष्ठाकी दुर्गन्धमें सने हुए उन पापियोंको वहाँके कीड़े खाते रहते हैं॥ एवं प्रमाणमुद्विग्ना यावत् तिष्ठन्ति तत्र ते । यातनाभ्यो दशगुणं नरके दुःखमिष्यते ॥