भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1298, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1298

ऐसे विशाल नरकमें वे जबतक रहते हैं, उद्विग्न भावसे खड़े रहते हैं। साधारण यातनाओंकी अपेक्षा नरकमें दसगुना दुःख होता है ।। तत्र चात्यन्तिकं दुःखमिष्यते च शुभेक्षणे । क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च वेदनास्तत्र भुञ्जते ।। शुभेक्षणे! वहाँ आत्यन्तिक दुःखकी प्राप्ति होती है। पापी जीव चीखते-चिल्लाते और रोते हुए वहाँकी यातनाएँ भोगते हैं ।। भ्रमन्ति दुःखमोक्षार्थं ज्ञाता कश्चिन्न विद्यते । दुःखस्यान्तरमात्रं तु ज्ञानं वा न च लभ्यते ।। वे दुःखोंसे छुटकारा पानेके लिये चारों ओर चक्कर काटते हैं; परंतु कोई भी उन्हें जाननेवाला वहाँ नहीं होता। उस दुःखमें तनिक भी अन्तर नहीं होता और न उसे छुड़ानेवाला ज्ञान ही उपलब्ध होता है ।। महारौरवसंज्ञं तु द्वितीयं नरकं प्रिये । तस्माद् द्विगुणितं विद्धि माने दुःखे च रौरवात् ।। प्रिये! दूसरे नरकका नाम है महारौरव। वह लंबाई, चौड़ाई और दुःखमें रौरवसे दूना बड़ा है ।। तृतीयं नरकं तत्र कण्टकावनसंज्ञितम् । ततो द्विगुणितं तच्च पूर्वाभ्यां दुःखमानयोः ।। महापातकसंयुक्ता घोरास्तस्मिन् विशन्ति हि ।। वहाँ तीसरा नरक है कण्टकावन, जो दुःख और लंबाई-चौड़ाईमें पहलेके दोनों नरकोंसे दुगुना बड़ा है। उसमें घोर महापातकयुक्त प्राणी प्रवेश करते हैं ।। अग्निकुण्डमिति ख्यातं चतुर्थं नरकं प्रिये । एतद् द्विगुणितं तस्माद् यथानिष्टसुखं तथा ।। ततो दुःखं हि सुमहदमानुषमिति स्मृतम् । भुञ्जते तत्र तत्रैव दुःखं दुष्कृतकारिणः ।। प्रिये! चौथा नरक अग्निकुण्डके नामसे विख्यात है। यह पहलेकी अपेक्षा दूना दुःख देनेवाला है। वहाँ महान् अमानुषिक दुःख भोगने पड़ते हैं। उन सभीमें पापाचारी प्राणी दुःख भोगते हैं ।। पञ्चकष्टमिति ख्यातं नरकं पञ्चमं प्रिये । तत्र दुःखमनिर्देश्यं महाघोरं यथातथम् ।। प्रिये! पाँचवें नरकका नाम पंचकष्ट है। वहाँ जो महाघोर दुःख प्राप्त होता है, उसका यथावत् वर्णन नहीं किया जा सकता ।। पञ्चेन्द्रियैरसह्यत्वात् पञ्चकष्टमिति स्मृतम् । भुञ्जते तत्र तत्रैवं दुःखं दुष्कृतकारिणः ।।