महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1299, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचों इन्द्रियोंसे असह्य होनेके कारण उसका नाम 'पंचकष्ट' है। पापी पुरुष उन-उन नरकोंमें महान् दुःख भोगते हैं ।।
अमानुषार्हजं दुःखं महाभूतैश्च भुज्यते ।
अतिघोरं चिरं कृत्वा महाभूतानि यान्ति तम् ।।
वहाँ बड़े-बड़े जीव चिरकालतक अत्यन्त घोर अमानुषिक दुःख भोगते हैं और महान् भूतोंके समुदाय उस पापी पुरुषका अनुसरण करते हैं ।।
पञ्चकष्टेन हि समं नास्ति दुःखं तथा परम् ।
दुःखस्थानमिति प्राहुः पञ्चकष्टमिति प्रिये ।।
प्रिये! पंचकष्टके समान या उससे बढ़कर दुःख कोई नहीं है। पंचकष्टको समस्त दुःखोंका निवासस्थान बताया गया है ।।
एवं त्वेतेषु तिष्ठन्ति प्राणिनो दुःखभागिनः ।
अन्ये च नरकाः सन्त्यवीचिप्रमुखाः प्रिये ।।
इस प्रकार इन नरकोंमें दुःख भोगनेवाले प्राणी निवास करते हैं। प्रिये! इन नरकोंके सिवा और भी बहुत-से अवीचि आदि नरक हैं।
क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च वेदनार्ता भृशातुराः ।
केचिद् भ्रमन्तश्चेष्टन्ते केचिद् धावन्ति चातुराः ।।
वेदनासे पीड़ित हो अत्यन्त आतुर हुए नरकनिवासी जीव रोते-चिल्लाते रहते हैं। कोई चारों ओर चक्कर काटते हैं, कोई पृथ्वीपर पड़े-पड़े छटपटाते हैं और कोई आतुर होकर दौड़ते रहते हैं ।।
आधावन्तो निवार्यन्ते शूलहस्तैर्यतस्ततः ।
रुजार्दितास्तृषायुक्ताः प्राणिनः पापकारिणः ।।
कोई दौड़ते हुए प्राणी हाथमें त्रिशूल लिये हुए यमदूतोंद्वारा जहाँ-तहाँ रोके जाते हैं। वहाँ पापाचारी जीव रोगोंसे व्यथित और प्याससे पीड़ित रहते हैं ।।
यावत् पूर्वकृतं तावन्न मुच्यन्ते कथंचन ।
कृमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च वेदनार्तास्तृषान्विताः ।।
जबतक पूर्वकृत पापका भोग शेष है, तबतक किसी तरह उन्हें नरकोंसे छुटकारा नहीं मिलता है। उनको कीड़े काटते रहते हैं तथा वे वेदनासे पीड़ित और प्याससे व्याकुल होते हैं ।।
संस्मरन्तः स्वकं पापं कृतमात्मापराधजम् ।
शोचन्तस्तत्र तिष्ठन्ति यावत् पापक्षयं प्रिये ।।
एवं भुक्त्वा तु नरकं मुच्यन्ते पापसंक्षयात् ।।
प्रिये! जबतक सारे पापोंका क्षय नहीं हो जाता तबतक वे अपने ही किये हुए अपराधजनित पापको याद करके वहाँ शोकमग्न होते रहते हैं। इस प्रकार नरक भोगकर