भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1300, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1300

पापोंका नाश करनेके पश्चात् वे उस कष्टसे मुक्त हो जाते हैं ।।

उमोवाच

भगवन् कति कालं ते तिष्ठन्ति नरकेषु वै ।
एतद् वेदितुमिच्छामि तन्मे ब्रूहि महेश्वर ।।
उमाने पूछा— भगवन्! महेश्वर! पापी जीव कितने समयतक नरकोंमें रहते हैं, यह मैं जानना चाहती हूँ? अतः मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

शतवर्षसहस्राणामादिं कृत्वा हि जन्तवः ।
तिष्ठन्ति नरकावासाः प्रलयान्तमिति स्थितिः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— प्राणी अपने पापोंके अनुसार एक लाख वर्षोंसे लेकर महाप्रलयकालतक नरकोंमें निवास करते हैं, ऐसा शास्त्रोंका निश्चय है ।।

उमोवाच

भगवंस्तेषु के तत्र तिष्ठन्तीति वद प्रभो ।।
उमाने पूछा— भगवन्! प्रभो! उन नरकोंमें किस-किस तरहके पापी निवास करते हैं? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

रौरवे शतसाहस्रं वर्षाणामिति संस्थितिः ।
मानुषघ्नाः कृतघ्नाश्च तथैवानृतवादिनः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— रौरव नरकमें एक लाख वर्षोंतक रहनेका नियम है। उसमें मनुष्योंकी हत्या करनेवाले, कृतघ्न तथा असत्यवादी मनुष्य जाते हैं ।।

द्वितीये द्विगुणं कालं पच्यन्ते तादृशा नराः ।
महापातकयुक्तास्तु तृतीये दुःखमाप्नुयुः ।।
दूसरे नरक (महारौरव)-में वैसे ही पापी मनुष्य दूने काल (दो लाख वर्ष) तक पकाये जाते हैं। तीसरे (कण्टकावन)-में महापातकी मनुष्य कष्ट भोगते हैं ।।

चतुर्थे परितप्यन्ते यावद् युगविपर्ययः ।।
चौथे नरकमें पापी लोग तबतक संतप्त होते हैं, जबतक कि महाप्रलय नहीं हो जाता ।।

सहन्तस्तादृशं घोरं पञ्चकष्टे तु यादृशम् ।
तत्रास्य चिरदुःखस्य ह्यधोऽन्यान् विद्धि मानुषान् ।।
पंचकष्ट नरकमें जैसा घोर दुःख होता है, उसको भी यहाँ सहन करते हैं। दीर्घकालतक दुःख देनेवाले इस घोर नरकसे नीचे मानवसम्बन्धी अन्य नरकोंकी स्थिति समझो ।।