भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1293, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1293

उनके मायामय पाश हैं, जिन्हें न देवता जानते हैं, न असुर। फिर मनुष्योंमें कौन ऐसा

है, जो उन यमदेवके महान् चरित्रको जान सके ।।

एवं संवसतस्तस्य यमस्य परिचारकाः ।

गृहीत्वा संनयन्त्येव प्राणिनः क्षीणकर्मणः ॥

इस प्रकार यमलोकमें निवास करते हुए यमराजके दूत जिनके प्रारब्धकर्म क्षीण हो गये

हैं, उन प्राणियोंको पकड़कर उनके पास ले जाते हैं ।।

येन केनापदेशेन त्वपदेशस्तदुद्भवः ।

कर्मणा प्राणिनो लोके उत्तमाधममध्यमाः ॥

यथार्हं तान् समादाय नयन्ति यमसादनम् ।

जिस किसी निमित्तसे वे प्राणियोंको ले जाते हैं, वह निमित्त वे स्वयं बना लेते हैं।

जगत्में कर्मानुसार उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके प्राणी होते हैं। यथायोग्य उन

सभी प्राणियोंको लेकर वे यमलोकमें पहुँचाते हैं ।।

धार्मिकानुत्तमान् विद्धि स्वर्गिणस्ते यथामराः ॥

नृषु जन्म लभन्ते ये कर्मणा मध्यमाः स्मृताः ।

धार्मिक पुरुषोंको उत्तम समझो। वे देवताओंके समान स्वर्गके अधिकारी होते हैं। जो

अपने कर्मके अनुसार मनुष्योंमें जन्म लेते हैं, वे मध्यम माने गये हैं ।।

तिर्यङ्नरकगन्तारो ह्यधमास्ते नराधमाः ॥

पन्थानस्त्रिविधा दृष्टाः सर्वेषां गतजीविनाम् ।

रमणीयं निराबाधं दुर्दर्शमिति नामतः ॥

जो नराधम पशु-पक्षियोंकी योनि तथा नरकमें जानेवाले हैं, वे अधमकोटिके अन्तर्गत

हैं। सभी मरे हुए प्राणियोंके लिये तीन प्रकारके मार्ग देखे गये हैं—एक रमणीय, दूसरा

निराबाध और तीसरा दुर्दर्श ।।

रमणीयं तु यन्मार्ग पताकाध्वजसंकुलम् ।

धूपितं सिक्तसम्मूष्टं पुष्पमालाभिसंकुलम् ॥

मनोहरं सुखस्पर्शं गच्छतामेव तद् भवेत् ।

निराबाधं यथालोकं सुप्रशस्तं कृतं भवेत् ।।

जो रमणीय मार्ग है, वह ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित और फूलोंकी मालाओंसे

अलंकृत है। उसे झाड़-बुहारकर उसके ऊपर जलका छिड़काव किया गया होता है। वहाँ

धूपकी सुगन्ध छायी रहती है। उसका स्पर्श चलनेवालोंके लिये सुखद और मनोहर होता है।

निराबाध वह मार्ग है, जो लौकिक मार्गोंके समान सुन्दर एवं प्रशस्त बनाया गया है। वहाँ

किसी प्रकारकी बाधा नहीं होती ।।

तृतीयं यत् तु दुर्दर्श दुर्गन्धितमसावृतम् ।

परुषं शर्कराकीर्णं श्वदंष्ट्राबहुलं भृशम् ॥