भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1292, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1292

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[यमलोक तथा वहाँके मार्गोंका वर्णन, पापियोंकी नरकयातनाओं तथा कर्मानुसार विभिन्न योनियोंमें उनके जन्मका उल्लेख]

उमोवाच

भगवन् सर्वलोकेश त्रिपुरार्दन शंकर ।
कीदृशा यमदण्डास्ते कीदृशाः परिचारकाः ॥
उमाने पूछा— भगवन्! सर्वलोकेश्वर! त्रिपुरनाशन! शंकर! यमदण्ड कैसे होते हैं? तथा यमराजके सेवक किस तरहके होते हैं? ।।
कथं मृतास्ते गच्छन्ति प्राणिनो यमसादनम् ।
कीदृशं भवनं तस्य कथं दण्डयति प्रजाः ॥
एतत् सर्वं महादेव श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
मृत प्राणी यमलोकको कैसे जाते हैं? यमराजका भवन कैसा है? तथा वे प्रजावर्गको किस तरह दण्ड देते हैं? प्रभो! महादेव! मैं यह सब सुनना चाहती हूँ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु कल्याणि तत् सर्वं यत् ते देवि मनःप्रियम् ।
दक्षिणस्यां दिशि शुभे यमस्य सदनं महत् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! देवि! तुम्हारे मनमें जो-जो पूछने योग्य बातें हैं, उन सबका उत्तर सुनो। शुभे! दक्षिणदिशामें यमराजका विशाल भवन है ।।
विचित्रं रमणीयं च नानाभावसमन्वितम् ।
पितृभिः प्रेतसंघैश्च यमदूतैश्च संततम् ॥
वह बहुत ही विचित्र, रमणीय एवं नाना प्रकारके भावोंसे युक्त है। पितरों, प्रेतों और यमदूतोंसे व्याप्त है ।।
प्राणिसंघैश्च बहुभिः कर्मवश्यैश्च पूरितम् ।
तत्रास्ते दण्डयन् नित्यं यमो लोकहिते रतः ॥
कर्मोंके अधीन हुए बहुत-से प्राणियोंके समुदाय उस यमलोकको भरे हुए हैं। वहाँ लोकहितमें तत्पर रहनेवाले यम पापियोंको सदा दण्ड देते हुए निवास करते हैं ।।
मायया सततं वेत्ति प्राणिनां यच्छुभाशुभम् ।
मायया संहरंस्तत्र प्राणिसङ्घान् यतस्ततः ॥
वे अपनी मायाशक्तिसे ही सदा प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मको जानते हैं और मायाद्वारा ही जहाँ-तहाँसे प्राणि-समुदायका संहार कर लाते हैं ।।
तस्य मायामयाः पाशा न वेद्यन्ते सुरासुरैः ।
को हि मानुषमात्रस्तु देवस्य चरितं महत् ॥